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ये भारत का नंबर वन शो क्यों और कैसे बन गया

बहुत से लोगों का कहना है कि उन्हें ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ फूलिश लगता है। कुछ लोग इसे बचकाना भी मानते हैं। लेकिन वास्तविकता में देखा जाए तो यही एक शो है, जिसे परिवार साथ मिलकर बैठकर देखते हैं। मनोरंजन का सशक्त माध्यम टीवी क्या परोस रहा है, ये हम सभी जानते हैं। टीवी पर आने वाले धारावाहिक परिवारों को तोड़ने में महती भूमिका निभा रहे हैं। एकता कपूर ने उस सुगन्धित बाग़ को उजाड़ कर रख दिया था, जो अस्सी के दशक में दूरदर्शन ने बड़ी मेहनत से संवारा था। फिर ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ आया और इसने एकता कपूर के पैदा किये गए कीचड़ में ‘कमल’ जैसा खिलने का काम किया।

ठीक इस समय हम टीवी पर आते सैकड़ों सीरियलों को देखें और उनमे भारतीयता खोजने का प्रयास करें तो निगाह केवल ‘गोकुलधाम सोसाइटी’ पर जाकर टिकती है। गोकुलधाम सोसाइटी वही स्थान है, जहाँ ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की शूटिंग की जाती है। इस धारावाहिक की लोकप्रियता ऐसी है कि लोग ‘कोरा’ पर जाकर पूछते हैं कि ‘गोकुलधाम सोसाइटी वास्तव में है या केवल सीरियल में दिखाई जाती है।’

लोग ये भी पता करने का प्रयास करते हैं कि क्या जेठालाल का ‘गड़ा इलेक्ट्रॉनिक्स’ वास्तव में है और लोग वहां इलेक्ट्रानिक आइटम खरीदने जाते हैं। यही है किसी भी सीरियल की लोकप्रियता का प्रमाण। जब अस्सी के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाला ‘मालगुड़ी डेज’ विश्वभर में लोकप्रिय हुआ तो कुछ लोग उसे वास्तविक मानकर भारत के नक़्शे में खोजते थे। गोकुलधाम सोसाइटी वास्तव में है और ये गोरेगांव फिल्म सिटी में है। सीरियल के आउटडोर सीन यहाँ पर फिल्माए जाते हैं।

कभी अहमदाबाद में रहने वाले तारक मेहता का दो वर्ष पूर्व 87 साल की आयु में निधन हो गया। ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ उनके गुजराती कॉलम ‘दुनिया ने उण्डा चश्मा’ पर ही आधारित है। इस गुजराती लेखक का ये कॉलम  पूरे गुजरात में पढ़ा जाता था। ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में ये दिवंगत लेखक रिफ्लेक्ट होता है। आम भारतीय जीवन उनके लेखन में झलकता था।

 भारतीय जीवन की रोजमर्रा की परेशानियां, उनके सुख-दुःख, उनके प्रेमिल नातें तारक मेहता की कलम के आभूषण थे। सम-सामयिक घटनाओं का उल्लेख भी उनके लेखन में मिलता था। उनकी लेखनी का एसेंस हम इस सीरियल में देख और महसूस कर पाते हैं। मुंबई के गोरेगांव ईस्ट की पावडर गली में बने ‘गोकुलधाम सोसाइटी’ में शूटिंग ने जो इतिहास बनाया है, उसे दोहराने में दशक लग जाने वाले हैं।

मैंने महसूस किया कि आठ से पंद्रह साल के बच्चों को ये धारावाहिक बहुत भाता है। इसके पीछे के कारण में जाए तो इस सीरियल में और धारावाहिकों की तरह ‘डार्क फ्लेवर’ नहीं होता। इसमें सास-बहू के रिश्तों का ज़हर नहीं मिलता। इसमें विवाहेतर संबंध नहीं मिलते। यही कारण हैं कि बच्चें इस सीरियल को बड़ों से अधिक देखते हैं, जबकि मेरा सुझाव है कि ये सीरियल बड़ों को देखना चाहिए।

कुछ दिन में वे पाएंगे कि न्यूज़ चैनलों का कचरा और एकता कपूर का कूड़ा उनके दिमाग से थोड़ा कम हो गया है। इस सीरियल की कथा वस्तु बहुत साधारण सी है। इसमें हमारे गली-मोहल्लों की कहानी है लेकिन वह हमें भीतर से टच करती है। ये टच और किसी धारावाहिक में नहीं मिलता। ये जादुई स्पर्श केवल गोकुलधाम सोसाइटी में ही मिलता है।

ये लोकप्रियता कम लोगों को ही नसीब होती है, वह भी टीवी इंडस्ट्री में। इसके किरदारों के निजी जीवन में भी उनके प्रशंसकों की दिलचस्पी रहती है। जैसे जेठालाल का किरदार करने वाले दिलीप जोशी गूगल पर खूब सर्च किये जाते हैं। दया का किरदार निभाने वाली दिशा वाकाणी और तारक का किरदार करने वाले शैलेष लोढ़ा भी अपने प्रशंसकों में बहुत विख्यात कलाकार हैं।

 शैलेष बहुआयामी प्रतिभा वाले व्यक्तित्व हैं। वे स्कूल-कालेजों में मोटिवेशनल स्पीकर के तौर पर बुलाए जाते हैं और उनका एक रूप राष्ट्रवादी का भी है। उनके व्याख्यानों में राष्ट्र को लेकर बहुत बातें होती हैं। सहज सरल व्यक्तित्व के शैलेष से एक संक्षिप्त भेंट उनके इंदौर प्रवास के समय हो चुकी है।

कोरोना काल में जब टीवी इंडस्ट्री शूटिंग न होने की वजह से बैठ गई तो दूरदर्शन समेत सभी चैनलों ने पुराने धारावाहिकों का प्रसारण शुरू किया। आप जानते हैं इस बार ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का पुनः प्रसारण और अधिक लोगों ने देखा। ये धारावाहिक इस समय देश में सबसे अधिक देखा जाता है। कोरोना काल में फैली मनहूसियत को जैसे ‘रामायण’ के पुनः प्रसारण ने दूर किया, वैसे ही जेठालाल का योगदान भी कम नहीं कहा जाएगा।

 कुछ कथित रूप से ‘क्लासिक’ लोग इस सीरियल को बेवकूफाना कहते हैं लेकिन वे ये नहीं जानते कि भारत में वर्तमान में ऐसा कोई सीरियल नहीं, जो इसका मुकाबला कर सके। एक सवाल हमेशा उठता है कि इस सीरियल में सबसे ज्यादा लोगों को क्या पसंद आता है। उसका ठीक-ठीक जवाब है, ‘आपसी प्रेम और सामंजस्य’। सीरियल में परिवारों के आपसी संबंधों को देखिये। वे कैसे पडोसी धर्म निभाते हैं, वे कैसे राष्ट्र के प्रति कृतज्ञ हैं, वे कैसे हर पर्व उत्साह से मनाते हैं, ये देखिये। आपको पता चल जाएगा कि ये भारत का नंबर वन शो क्यों और कैसे बन गया।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Avatar राजेश त्रिवेदी says:

    सही कहा, मैंने खुद ये महसूस किया की ये सीरीयल हम लोग क्यों नहीं देख रहे थे? इस लाक्डाउन में मौक़ा मिला और हम सभी ये सीरीयल देख रहे है।

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