भाजपा का कोर वोटर प्रधानमंत्री मोदी से नाराज क्यों?

चुनाव के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण उत्तरप्रदेश में आज मोदी सरकार के गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के समक्ष जनता ने नारा लगाना शुरू कर दिया कि ‘मंदिर नहीं तो वोट नहीं’। इसके तुरंत बाद मोदी सरकार के मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावेड़कर को प्रेस वार्ता कर भाजपा के मतदाताओं को आश्वस्त करना पड़ा कि वह सुप्रीम कोर्ट से यह गुजारिश करेंगे कि राममंदिर पर नियमित तौर पर सुनवाई हो। मप्र, राजस्थान और छत्तीगढ़ का भाजपाई किला जिस तरह से ढहा,और उसे ढहने में जिस तरह से NOTA की भूमिका स्पष्ट हुई, उससे लग रहा है कि जनता ने कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए नहीं, बल्कि केंद्र की मोदी सरकार को सबक सिखाने के लिए मतदान किया है! आखिर ऐसा क्यों है? आइए उन मुद्दों की पड़ताल करें जो भाजपा के कोर-वोटरों से जुड़ा है और जिसे इन साढ़े चार साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभी तक एड्रेस नहीं किया है।

1. धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक का विभाजन: भारतीय संविधान या किसी भी कानून में अल्पसंख्यक की परिभाषा नहीं दी गयी है इसीलिए यूपी-बिहार के 19%, बंगाल-केरल के 27%, आसाम के 34%, कश्मीर के 68% और लक्षद्वीप के 96% मुसलमान अल्पसंख्यक कहलाते हैं जबकि लक्षद्वीप-मिजोरम के 2%, नागालैंड के 8%, मेघालय के 11%, कश्मीर के 28%, अरुणाचल के 29% और मणिपुर के 30% हिंदू बहुसंख्यक कहलाते हैं! भारत इकलौता सेक्युलर देश हैं जहाँ धर्म के आधार पर राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय बना दिया गया है। राष्ट्रवादी और संघ से जुड़े लोग धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक की धारणा के खिलाफ हैं और समय–समय पर इसका खुलकर विरोध भी करते हैं। 2015 में बागपत के सांसद और वर्तमान समय में मंत्री सत्यपाल सिंह ने धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के विभाजन को समाप्त करने के लिए एक प्राइवेट मेम्बर बिल भी पेश किया था, जिस पर आजतक बहस नहीं हुयी। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने और धर्म के आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक को समाप्त के लिए 2017 में सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल किया । सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को इस पर निर्णय लेने का आदेश भी दिया, लेकिन एक साल बीत जाने के बाद भी केंद्र सरकार ने अबतक इस पर कोई निर्णय नहीं लिया। इससे राष्ट्रवादियों का निराश और नाराज होना स्वाभाविक है।

2. जनसँख्या नियंत्रण कानून: गिरिराज सिंह सहित कई अन्य मंत्रियों और संघ से जुड़े लोगों का मानना है कि भारत की 50% समस्याओं का मूल कारण जनसँख्या विस्फोट है। भाजपा के 125 सांसद लिखित रूप से जनसँख्या नियंत्रण कानून की मांग कर चुके हैं। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर चुके हैं और कोर्ट ने गेंद सरकार के पाले में डाल दिया। लेकिन मोदी सरकार ने जनसँख्या नियंत्रण कानून बनाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इससे राष्ट्रवादियों का निराश और नाराज होना स्वाभाविक है।

3. अंधविश्वास और धर्मांतरण विरोधी कानून: देश के कई राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। लक्षद्वीप और मिजोरम में हिंदू अब मात्र 2.5% तथा नागालैंड में 8.75% बचे हैं। मेघालय में हिंदू अब 11%, कश्मीर में 28%, अरुणाचल में 29% और मणिपुर में 30% बचे हैं। राष्ट्रवादियों का मानना है कि जिस प्रकार से सुनियोजित ढंग से धर्म परिवर्तन हो रहा है। यदि उसे नहीं रोका गया तो आने वाले 10 वर्षों में स्थिति अत्यधिक भयावह हो जायेगी। धर्मांतरण कराने वाले लोग झूठ पाखंड अंधविश्वास और चमत्कार के सहारे गरीब किसान मजदूर दलित शोषित और पिछड़ों का धर्म-परिवर्तन करते हैं और कानून के अभाव में पुलिस कुछ कर नहीं पाती है। राष्ट्रवादियों का मानना है कि मोदी सरकार को अंधविश्वास और धर्मांतरण विरोधी कठोर कानून बनाना चाहिए लेकिन इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया इसलिए राष्ट्रवादियों का निराश और नाराज होना स्वाभाविक है ।

4. रोहिंग्या और बंगलादेशी घुसपैठ : 2014 के चुनावों में मोदी ने अपनी रैलियों में कहा था कि सरकार बनाने के एक साल के अन्दर भारत में रहने वाले सभी घुसपैठियों को बाहर भेज दिया जायेगा लेकिन इस दिशा में सरकार ने कोई ठोस प्रयास नहीं किया। सच्चाई तो यह है कि देश की राजधानी दिल्ली में लाखों बंगलादेशी अवैध रूप से रहते हैं और दिल्ली पुलिस भी केंद्र सरकार के अधीन है लेकिन इन्हें पकड़ने और बाहर भेजने के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया। भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने रोहिंग्या और बांग्लादेशियों को बाहर निकालने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल किया है लेकिन एक साल बीत जाने के बावजूद केंद्र सरकार ने अपना जबाब दाखिल नहीं किया। इससे राष्ट्रवादी निराश और नाराज हैं।

5. समान नागरिक संहिता : संघ से जुड़े लोग और भाजपा के मूल कार्यकर्त्ता भारत में धर्म के आधार पर लागू हिंदू मैरिज एक्ट मुस्लिम मैरिज एक्ट और क्रिस्चियन मैरिज एक्ट के स्थान पर सबके लिए एक समान नागरिक संहिता चाहते हैं और भाजपा ने अपने मैनिफेस्टो में भी समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था। संविधान का आर्टिकल 44 भी यही कहता है। सुप्रीम कोर्ट भी कई बार सरकार से इस बारे में कह चुका है। अटल जी द्वारा बनाये गए संविधान समीक्षा आयोग ने भी सभी भारतीयों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का सुझाव दिया था। 2015 में भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका भी दाखिल किया था। लेकिन कोर्ट ने बाल सरकार के पाले में डाल दिया और सरकार ने अबतक कुछ नहीं किया । इससे भाजपा का मूल वोटर मोदी से निराश और नाराज है।

6. एक देश एक नाम एक निशान एक राष्ट्रगान एक विधान एक संविधान: भाजपा का मूल कार्यकर्त्ता और संघ से जुड़े लोग भारत में ‘एक नाम एक निशान, एक राष्ट्रगान एक विधान एक संविधान’ लागू चाहते हैं लेकिन आजादी के 70 साल बाद भी “दो नाम दो निशान दो राष्ट्रगान दो विधान दो संविधान” जारी है और मोदी सरकार ने इस दिशा में कुछ किया भी नहीं इसलिए राष्ट्रवादियों का निराश और नाराज होना स्वाभाविक है। यहाँ बता दें कि भारत इकलौता देश है जिसका दो नाम है– भारत और इंडिया । देश में दो निशान है– तिरंगा और कश्मीर का झंडा, देश में दो संविधान है– भारत का संविधान और कश्मीर का संविधान । संविधान सभा के दिनांक 24.1.1950 के प्रस्ताव के अनुसार भारत में दो राष्ट्रगान है: जन-गन-मन और वंदेमातर। यह धारणा पूर्णतः गलत है कि वंदेमातरम राष्ट्रगीत है और जन-गन-मन राष्ट्रगान! संविधान या किसी कानून में राष्ट्रगीत का जिक्र नहीं है।

7. समान शिक्षा (एक देश-एक शिक्षा) : राष्ट्रवादी विचार धारा के लोगों का मानना हैं कि भारत में समान शिक्षा (एक देश-एक शिक्षा) के बिना सबको समान अवसर उपलब्ध कराना असंभव है। इसलिए बच्चा गरीब हो या अमीर, हिंदू हो या मुसलमान, सिख हो या ईसाई, कच्छ का रहने वाला हो या कामरूप का, कश्मीर का रहने वाला हो या कन्याकुमारी का, पठन-पाठन का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए और पाठ्यक्रम एक समान होना चाहिए। मूल शिक्षा अधिकार कानून उन सभी स्कूलों पर लागू था जहाँ 6-14 वर्ष के बच्चे पढ़ते थे लेकिन कांग्रेस ने 2012 में संशोधन किया और मदरसों को शिक्षा अधिकार कानून के दायरे से बाहर निकाल दिया। मदरसों सहित सभी स्कूलों को शिक्षा अधिकार कानून के दायरे में लाने के लिए भाजपा सांसद भाजपा सांसद महेश गिरी ने संसद में एक प्राइवेट मेबर बिल पेश किया और भाजपा नेता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दाखिल किया, लेकिन सरकार ने समान शिक्षा लागू करने के लिए कुछ भी नहीं किया। इसलिए राष्ट्रवादियों का नाराज होना स्वाभाविक है।

शिक्षा के मामले मे मोदी सरकार आजतक यूपीए के सिलेबस को ही लागू किए हुए है। साढ़े चार साल बाद भी कोई शिक्षा नीति नहीं आयी है, जबकि अटल सरकार और बाद की यूपीए सरकार एक साल के भीतर शिक्षा नीति ले आयी थी। ऐसे में जब मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावेड़कर जब यह कहते हैं कि हमने साढ़े चार साल मे पूर्व की सरकार द्वारा तय एक चैप्टर भी नहीं बदला है तो भाजपा समर्थकों को यह समझ नहीं आता है कि वह रोए या हंसे!

8. हिंदी और संस्कृति को प्रोत्साहन : राष्ट्रवादीयों का मानना है कि देश की एकता-अखंडता और आपसी भाईचारा मजबूत करने के लिए हिंदी और संस्कृत भाषा का प्रचार-प्रसार बहुत जरुरी है, लेकिन केंद्र सरकार ऐसा करने में नाकाम रही है । उनका मानना है कि सरकार चाहे तो शिक्षा अधिकार कानून में बदलाव कर हिंदी और संस्कृत को 14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य कर सकती है। लेकिन उसने कोई प्रयास ही नहीं किया। बता दें कि भारतीय संविधान के आर्टिकल 351 के अंतर्गत हिंदी-संस्कृत भाषा के प्रचार की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है।

9. आर्थिक आधार पर आरक्षण: राष्ट्रवादी विचार धारा के लोगों का मानना है कि जातिगत आरक्षण से अब फायदा नहीं बल्कि नुकसान हो रहा है। इसका फायदा सभी दलितों और पिछड़ों को मिलने की बजाय कुछ जातियों और परिवारों में सिमट गया है। संघ से जुड़े लोगों का कहना है कि सवर्णों में भी अत्यधिक गरीब परिवार हैं और दलितों और पिछड़ों में भी अत्यधिक संभ्रांत लोग हैं। इसलिए आरक्षण पर संसद में खुली चर्चा की जरुरत है लेकिन सरकार ने इस दिशा में कोई कार्य नहीं किया। भाजपा के एक दलित समर्थक ने कहा कि आरक्षण के सहारे जब रामबिलास पासवान एक बार सांसद बन गए तो उन्हें दूसरी बार मौका क्यों मिलना चाहिए? और यदि उन्हें मौका मिलेगा तो उसी क्षेत्र के अन्य दलितों को मौका कैसे मिलेगा? बता दें कि आरक्षण के सहारे रामबिलास पासवान अबतक आठ बार सांसद बन चुके हैं, उनके भाई और बेटे भी आरक्षण का लाभ ले रहे हैं। भाजपा के ही एक अन्य दलित कार्यकर्त्ता का कहना है कि उदित राज पति-पत्नी इनकम टैक्स विभाग में कमिश्नर थे तो उन्हें और उनके बच्चों को आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए?

10. अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण: भाजपा के कोर समर्थकों का कहना है हमने इस आशा के साथ मोदी को वोट दिया था कि प्रधानमंत्री बनने के बाद वह अयोध्या, काशी और मथुरा विवाद का समाधान करेंगे लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने कभी इस विषय पर कोई गंभीर प्रयास नहीं किया। एक नाराज समर्थक ने तो यहाँ तक कह दिया कि प्रधानमंत्री के पास विराट कोहली और प्रियंका चोपड़ा के शादी समारोह में जाने का समय है, लेकिन अयोध्या विवाद सुलझाने का समय नहीं है।

अपने इस कार्यकाल में प्रधानमंत्री एक बार भी अयोध्या नहीं गये हैं और न ही अयोध्या में मंदिर निर्माण को लेकर वह किसी तरह की पहल करते ही दिख रहे हैं। अब चुनावी सभा में एक-दो बार जयश्री राम का नारा लगा कर और एक बार राममंदिर पर कांग्रेस को कोसने के अलावा आज तक उन्होंने कुछ नहीं किया है। जनता ने नरेंद्र मोदी को सत्ता राम मंदिर बनवाने के लिए सौंपी थी न कि उसे लेकर कांग्रेस का रोना रोने के लिए। केंद्र में मोदी और उप्र में योगी के रहते यदि अयोध्या में राम मंदिर नहीं बना तो नाराज राष्ट्रवादी 2019 में भी नोट का विकल्प न चुन लें, इसे बड़ी शिद्द से समझने की जरूरत है, खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को!

भाजपा के एक कट्टर समर्थक का कहना है कि सपा का समाजवाद, भाजपा का राष्ट्रवाद, कांग्रेस का सेकुलरिज्म और बसपा का दलित प्रेम एक समान है। राहुल गाँधी जी जितने सेक्युलर हैं मोदी जी उतने ही राष्ट्रवादी हैं, अखिलेश यादव जितने समाजवादी हैं केजरीवाल उतने ही ईमानदार हैं। अर्थात जुमले अनेक हैं लेकिन लक्ष्य एक है-सत्ता। लेकिन इसके बावजूद नीचे का ट्वीट जो कह रहा है, वह भी एक बड़ी सच्चाई है!

URL : Why is the BJP core Voter Modi angry?

Keyword : BjP leader, BJP defeat, BJP voters, PM Modi, Modi Govt, PIL, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

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