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क्या संपत्ति में अधिकार के साथ मातापिता का उत्तरदायित्व भी लेंगी बेटियां?

परसों बेटियों के लिए पैतृक संपत्ति में अधिकार की परिभाषा को और परिभाषित करते हुए उच्चतम न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि “बेटियाँ ताउम्र बेटियाँ रहती हैं मगर बेटे शादी होते ही बदल जाते हैं।”  यह कहानी लगभग हर समाज की है, परन्तु बेटा शादी होते ही पराया हो जाता है, यह बेहद सामाजिक टिप्पणी है एवं उसे प्रयोग करने का अधिकार समाज से जुड़े संगठन को ही हो सकता है। न्यायालय जब न्याय देते हुए समाज में स्त्री और पुरुष के मध्य यह भेद करते हुए निर्णय देंगे तो कहीं न कहीं न्याय के प्रति वह वर्ग उदासीन हो जाएगा। परसों जब यह निर्णय आया तो स्वाभाविक है कि महिलाओं के दिल में खुशी की लहर दौड़ गयी। फैसले के पक्ष में खूब लिखा गया। एक महिला होने के नाते मेरे सामने इस फैसले को लेकर दुविधा थी।

दुविधा मेरे ऐसी कई स्त्रियों के दिल में है। भारतीय समाज को यदि आरम्भ से देखा जाए, सीता के काल से तो राजा जनक के ह्रदय में ऐसा कोई पुत्र मोह नहीं था और उन्होंने एक गोद ली हुई कन्या एवं अपनी कन्या के उपरान्त किसी पुत्र की चाह नहीं की थी।  महाभारत काल में भी यदि हम देखते हैं तो कई ऐसी घटनाएं मिलती हैं जिनमें एकमात्र संतान ही कन्या थी।  ऐसे अनेकों उदाहरण हमें प्राचीन काल से प्राप्त होते हैं जिनमें बालक और बालिका के साथ कथित भेदभाव नहीं दिखाई देता है। तो यह कहा जाना कि इस संशोधन से उन्हें उस अन्याय से छुटकारा मिला जो उनके साथ सदियों से होता चला आ रहा था, वह मिथ्या के अतिरिक्त कुछ और नहीं है। दक्षिण में कई राजवंश ऐसे हुए हैं जहाँ पर बेटियों को ही शासन सौंपा जाता था।  न तब बेटियों ने अपने पिता से विद्रोह किया और न ही संपत्ति के लालच में पुत्रों ने पिता ने विद्रोह किया।

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आज भी कई ऐसे परिवार हैं जो मातृसत्तात्मक हैं। भारत में कोई भी काल उठाकर देखा जाए, यह बात बार बार उभर कर आएगी कि स्त्रियों ने उपलब्धियों के क्षेत्र में नया परचम लहराया है। फिर ऐसा क्या हुआ कि अचानक से ही स्वतंत्रता के उपरान्त भारतीय महिलाओं को समाज में नीचा समझा जाने लगा? इसके कई कारण हो सकते हैं, उनमें से एक संयुक्त परिवार परम्परा का टूटना भी महत्वपूर्ण है। जब हम यह बात करते हैं कि हिन्दू स्त्रियों को संपत्ति में अधिकार प्राप्त होना चाहिए, तो हमें उन तमाम परम्पराओं को भी ध्यान में रखना चाहिए जो मात्र स्त्रियों को लेकर ही बनी हैं। जिनमें स्त्रीधन अर्थात दहेज़ भी है। यह बात सत्य है कि वर्तमान काल में मूल्यों का क्षरण होते समय दहेज़ ने जिस महामारी का रूप धारण किया, वह पूरे समाज के लिए ही कैंसर सा साबित हुआ, परन्तु वह स्त्रीधन था जिस पर स्त्री का ही अधिकार होता था।

अब जब उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया है कि लड़की का अधिकार पैतृक संपत्ति में पुत्र के समान ही है तो कुछ प्रश्न मेरे मस्तिष्क में है, और जो लगभग सभी के दिल में उठेंगे।  मेरे कुछ बिंदु हैं, जिनका समाधान होना अत्यंत आवश्यक है नहीं तो यह निर्णय हिन्दू युवकों को विवाह से विमुख करेगा तथा हिन्दू लड़कियों को एक ऐसे जाल में फँसाएगा जिससे वह निकल नहीं पाएंगी, क्योंकि इसमें लड़की के बच्चे को भी नाना की संपत्ति में अधिकार दिया गया है (हिन्दू इसलिए कह रही हूँ क्योंकि यह नियम केवल हिन्दू उत्तराधिकार नियम के अंतर्गत हिन्दू परिवारों के लिए हैं)

  1. मेरा पहला बिंदु लड़कियों को हे संबोधित है कि यदि लड़कियों को अपने पिता की पैतृक संपत्ति से वही अधिकार चाहिए जो उनके भाई के पास है तो क्या वह अपने मातापिता के भार-पोषण का उत्तरदायित्व भी स्वीकार करेंगी? क्योंकि आज की लड़की को हर वह शिक्षा प्राप्त हो रही है जो लड़के को मिलती है। आज की लड़की अपने भाई की तुलना में कभी कभी ज्यादा ही कमाती है, तो क्या यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि माता पिता का भरण पोषण भी दोनों भाई बहन मिलकर करेंगे?
  2. मेरा दूसरा बिंदु लड़कियों और समाज दोनों से है कि क्या यह निर्णय जो यह कहता है कि लड़की की मृत्यु के बाद उसका पुत्र भी नाना की संपत्ति का वारिस होगा, लड़कियों की असमय मृत्यु का कारण नहीं बनेगा, जिन्हें बहला फुसलाकर अपने चंगुल में फंसा लिया जाता है। आज हम रोज़ ही यह कहानी पढ़ रहे हैं कि दूसरे मज़हब के लड़के अपना नाम बदल कर हिन्दू और ईसाई लड़कियों को अपने जाल में फंसा रहे हैं और जब तक लड़की को पता चलता है तब तक देर हो गयी होती है। क्या इस फैसले से वह लडकियां और भी ज्यादा सरल शिकार नहीं हो जाएँगी? और यदि विरोध किया तो उनके बच्चे तो जीवित रहेंगे मगर वह नहीं? क्या यह पूरे डेमोग्राफिक बदलाव का कारण नहीं बनेगा?
  3. तीसरा बिंदु फिर लड़कियों की तरफ ही संबोधित है कि क्या इस निर्णय के बाद वह दहेज रहित विवाह करना पसंद करेंगी? क्योंकि आप चाहे कितना भी झूठ कह लें कि दहेज़ लड़के वाले मांगते हैं, ऐसे भी कई मामले देखे गए हैं जिनमें लडकियां खुद ही अपने पिता के सामने एक सूची रख देती हैं! मैं केवल उस परिवार में विवाह करूंगी जहां पर दहेज़ नहीं लिया जाएगा, ऐसा कहने वाली लडकियां अभी भी कम हैं।
  4. यदि लड़की विवाह एक विवाह तोड़कर दूसरा विवाह करती है और दोनों विवाहों से उसकी संताने होती हैं तो किस विवाह से उत्पन्न पुत्र को नाना की संपत्ति में अधिकार प्राप्त होगा? (यदि लड़की की असमय मृत्यु हो जाती है तो!)
  5. यदि लड़की पिता की संपत्ति में बराबर की भागीदार है तो क्या वह अपने पिता के दायित्वों को साझा करने के लिए भी आगे आएगी? क्या वह अपनी माँ और पिता के लिए जो बीमारी या किसी अन्य कारण से कर्ज लिया जाएगा तो उन्हें साझा करने के लिए आएगी?
  6. चूंकि वह सपत्ति से एक एक पैसा ले चुकी है तो क्या वह उन सभी रीति रिवाजों से धन के स्थान पर कुछ टोकन तोहफा लेना आरंभ करेगी, जिनपर वह अपना अधिकार समझती है?
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ऐसे ही कई सवाल और बिंदु मेरे मन में है। परन्तु जो सबसे बड़ा प्रश्न मेरे मन में है वह यह है कि इसके कारण यदि लव जिहाद की संख्या में इजाफा होता है तो क्या होगा? क्योंकि यदि यह होता है तो वह लव जिहाद न होकर संपत्ति जिहाद भी हो जाएगा?

आप सभी मित्रों से विचार आमंत्रित हैं कि आप भी बताएं कि और कौन से बिंदु हो सकते हैं?

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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