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न्यायमूर्ति चेलामेश्वर की बगावत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा न्याय व्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है! - India Speaks Daily: Pressing stories behind the Indian Politics, Legislature, Judiciary, Political ideology, Media, History and society.

न्यायमूर्ति चेलामेश्वर की बगावत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा न्याय व्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है!



Courtesy Desk
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अनूप भटनागर । उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिये उनके नामों के चयन की प्रक्रिया को लेकर देश के पांचवें सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर की खुली बगावत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मौजूदा व्यवस्था में सब कुछ ठीक नहीं है। न्यायमूर्ति चेलामेश्वर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून को असंवैधानिक घोषित करने वाली संविधान पीठ के सदस्य थे। उन्होंने बहुमत के निर्णय से असहमति व्यक्त करते हुए अपने फैसले में कहा था कि कोलेजियम व्यवस्था में पारदर्शिता का अभाव है।

न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने एक सितंबर को कोलेजियम की प्रस्तावित बैठक में हिस्सा लेने की बजाय प्रधान न्यायाधीश तीरथ सिंह ठाकुर को एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखकर न्यायाधीशों के चयन की समूची प्रक्रिया में शामिल इस समिति की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए उसे ही कठघरे में खड़ा कर दिया। न्यायमूर्ति चेलामेश्वर का यह भी आरोप है कि मौजूदा कोलेजियम व्यवस्था में बहुमत के सदस्य एकजुट होकर चयन करते हैं। असहमति व्यक्त करने वाले सदस्य न्यायाधीश की राय भी दर्ज नहीं की जाती है। यह बहुत ही गंभीर आरोप है कि क्योंकि यह प्रक्रिया तो न्यायाधीशों के चयन और उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया के मसले पर 1999 में राष्ट्रपति को दी गयी शीर्ष अदालत की राय के विपरीत लगती है। उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्तियों का काम कार्यपालिका ही करती थी। लेकिन एसपी गुप्ता बनाम भारत सरकार प्रकरण में न्यायालय के 1982 निर्णय से स्थिति कुछ बदली और फिर अक्तूबर, 1993 में सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट ऑन रिकार्ड एसोसिएशन बनाम भारत सरकार प्रकरण में उच्चतम न्यायालय की व्यवस्था ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का काम कार्यपालिका से अपने हाथ में ले लिया था।

न्यायालय की व्यवस्था के कारण स्थिति एकदम बदल गयी थी जिसे लेकर विवाद और असमंजस की स्थिति पैदा हुई। अतः इन फैसलों से उत्पन्न स्थिति के मद्देनजर सरकार ने तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन के जरिये इस प्रकरण से जुड़े सवालों पर 23 जुलाई, 1998 को उच्चतम न्यायालय से राय मांगी। उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने 28 अक्तूबर, 1998 को अपनी राय में कार्यपालिका को एकदम किनारे लगा दिया। न्यायमूर्ति एसपी भरूचा की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने इन सवालों पर राष्ट्रपति को अपनी विस्तृत राय दी और साथ ही इस काम के लिये नौ बिन्दु प्रतिपादित किये।

संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि संविधान के अनुच्छेद 217(1) के तहत प्रधान न्यायाधीश से परामर्श का तात्पर्य प्रधान न्यायाधीश का न्यायाधीशों के साथ परामर्श से बनी राय से है। न्यायालय ने कहा था कि प्रधान न्यायाधीश की अपनी अकेले की राय इस अनुच्छेद के तहत परामर्श का रूप नहीं लेती है। संविधान पीठ ने यह भी कहा था कि न्यायाधीशों के स्थानांतरण के मामले की सिर्फ उसी स्थिति में न्यायिक समीक्षा हो सकती है कि प्रधान न्यायाधीश ने उच्चतम न्यायालय के चार अन्य वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श के बगैर ही ऐसी सिफारिश की हो या फिर संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की राय प्राप्त नहीं की गयी हो।

संविधान पीठ ने यह भी कहा था कि प्रधान न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के तबादले की सिफारिश शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करके ही करनी चाहिए। जहां तक उच्च न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्ति का सवाल है तो प्रधान न्यायाधीश को शीर्ष अदालत के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों से परामर्श करके ही सिफारिश करनी चाहिए। संविधान पीठ ने दोटूक शब्दों में कहा था कि नियुक्ति के लिये की गयी किसी सिफारिश पर अमल नहीं करने के संबंध में भारत सरकार द्वारा भेजी गयी सामग्री और सूचना पर प्रधान न्यायाधीश अन्य न्यायाधीशों से परामर्श के बगैर अकेले ही कार्यवाही नहीं करेंगे।

इसके अलावा जिन न्यायाधीशों से परामर्श किया गया उनकी राय लिखित में होनी चाहिए और उसे प्रधान न्यायाधीश को अपनी राय के साथ सरकार के पास भेजना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा था कि प्रधान न्यायाधीश के लिये सरकार के पास सिफारिश करते समय इन मानदंडों और परामर्श की प्रक्रिया के लिये इनका पालन करना अनिवार्य है। सबसे अंत में संविधान पीठ ने कहा था कि इन मानदंडों और परामर्श की प्रक्रिया के अनिवार्य बिन्दुओं के पालन बगैर ही प्रधान न्यायाधीश द्वारा की गयी सिफारिशें मानने के लिये सरकार बाध्य नहीं है। इस बीच, वकीलों के एक संगठन ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी और निष्पक्ष बनाने की व्यवस्था बनाने के अनुरोध के साथ फिर उच्चतम न्यायालय में नयी याचिका दायर की है। इसी खींचतान की वजह से उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों के पदों पर अनेक नियुक्तियों की प्रक्रिया अधर में लटकी हुई है


साभार : दैनिक ट्रिब्यून
मुखर होते असहमति के सुर

नोट: यह लेखक के निजी विचार हैं इससे India speaks daily का सहमत होना जरूरी नहीं है। ISD इन तथ्यों की पुष्टि का दावा नहीं करता है।



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