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अफगानिस्तान में फिर से तालिबान-अमेरिका की नीतियों की नाकामी

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अफगानिस्तान में 20 वर्ष बाद फिर से तालिबान के काबिज होने के बाद दुनिया के सामने इस्लामिक कट्टरवाद का एक नया संकट पैदा हो गया है। तमाम देशों की तालिबानी सरकार को मान्यता न देने की घोषणाओं के बीच इस्लामिक कट्टरपंथी नेता वहां अपनी सरकार बनाने की तैयारी में हैं। कनाडा ने तालिबानी सरकार को मान्यता न देने का ऐलान भी कर दिया है।

अमेरिकी सेना की वापसी के बाद तालिबान ने जिस तरह से अफगानिस्तानी फौज के आत्मसमर्पण के बाद कब्जा कर लिया, उससे अमेरिका के पिछले चार राष्ट्रपतियों के अलावा पांचवे राष्ट्रपति बाइडेन की नीतियों को लेकर भी सवाल उठाएं जा रहे हैं। अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की वापसी के बाद दुनिया के सामने पैदा हुए भीषण संकट के मद्देनजर बाइडेन आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को जारी रखने की बात तो कर रहे हैं पर कोई ठोस कदम उठाने का ऐलान नहीं कर रहे हैं। एक तरह से बाइडेन की लाचारी ही सामने आई है।

बाइडेन के आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने के ऐलान के बावजूद कई अमेरिकी सीनेटर आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान को आर्थिक सहायता बंद न करने की नीति पर उनकी आलोचना कर रहे हैं। आलोचना केवल बाइडेन की नहीं पिछले राष्ट्रपतियों की भी हो रही है। आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका के दोहरी नीति अपनाने के कारण ही पाकिस्तान और अन्य देशों पर कोई लगाम नहीं लग पाई है। यह भी उजागर हो गया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडेन पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना को वापस बुलाने के फैसले से यह साबित हुआ है कि बाइडेन एक कमजोर प्रशासक हैं।

वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 20 वर्ष पूर्व आतंकवादी हमले के बाद अमेरिकी सेना ने नाटो सेना के साथ तालिबानियों को खदेड़ दिया था। उस समय से ही अमेरिकी सेना बड़ी संख्या में अफगानिस्तान में जमी हुई थी। 2000 में तालिबान सरकार के खात्मे के चार साल बाद अफगानिस्तान में चुनाव हुए और नई सरकार बनी। दस वर्ष हामिद करजई राष्ट्रपति रहे। भारत सरकार ने भी अफगानिस्तानी सरकार के साथ पूरा सहयोग किया। कुछ प्रोजेक्ट भी शुरु किए गए। नाटो सेना की वापसी के बाद अमेरिका अपनी रणनीति के अनुसार सैनिकों की संख्या बढ़ाता रहा और कम करता रहा।

2014 में अमेरिकी सेना ने अफगानी सेना को प्रशिक्षण देने का ऐलान किया था। अमेरिका प्रशिक्षित सेना ने तालिबान के सामने हथियार डाल दिए। तालिबानी सेना के मुकाबले तीन गुणा ज्यादा और आधुनिक हथियारों से लैस अफगानिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। बाइडेन भी इस बात पर हैरानी तो जता रहे हैं कि अफगानी सेना ने हथियार क्यों डाल दिए। इन सब से साबित होता है कि इस्लामिक कट्टरपंथियों से निपटने में अमेरिकी नीति पूरी तरह असफल रही। अफगानिस्तान में इन 20 वर्षों में कोई बदलाव नहीं आया।

इस दौरान तालिबान अफीम की खेती और व्यापार से हजारों करोड़ कमाते रहे। तालिबानी नेता आधुनिक हथियार भी जुटाते रहे। जिस तरह से अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अरशद गनी अपना माल समेटकर काबुल से भागे, उससे यही लगता है कि अफगानिस्तान की हुकूमत कट्टरपंथियों और भ्रष्टाचार पर कोई रोक नहीं सकी। अमेरिकी सेना की मौजूदगी के बावजूद 20 साल तक बड़े पैमाने पर खूनखराबा होता रहा है। अफगानिस्तानी सेना के हजारों सैनिकों के साथ बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए।

अमेरिका की पाकिस्तान की चालों से निपटने, आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी लड़ाई और अफगानिस्तान में दमदार सुरक्षा तंत्र विकसित न करने से अब दुनिया के सामने संकट पैदा हो गया है। यह भी हैरानी की बात है कि इतने लंबे समय तक अमेरिकी प्रशासन तालिबानियों के संपर्क अफगानी नागरिकों से नहीं काट पाए। तालिबान ने अमेरिका सेना की वापसी के तुरंत बाद सरकार बनाने और लोगों को सुरक्षा देने की गारंटी देते हुए आत्मसमर्पण करा लिया।

पाकिस्तान, रूस, टर्की और कुछ अन्य देश फिलहाल तो तालिबानी के फिर से काबिज होने पर खुश हो रहे हैं। तालिबानी नेताओं के रूख से यह भी जाहिर हो रहा है कि अफगानिस्तान की नई हुकूमत में पाकिस्तानपरस्त कई नेता भी कमान संभालेंगे। इससे साफ है कि पाकिस्तानों के हितों का अफगानिस्तानी हुकूमत में ध्यान रखा जाएगा। पाकिस्तान एक तरफ तालिबान के काबिज होने पर खुश हो रहा है और दूसरी तरफ देश में आतंकवादियों से सक्रिय होने से चिंतित भी हो रहा है।

तालिबानियों के उभार से खतरा भारत को भी है और बंगलादेश को भी। रक्षा रणनीतिकार आशंका जता रहे हैं कि बंगलादेश में जमात ए मुजाहिदीन बांग्लादेश (जेएमबी) फिर से बड़ी वारदातों का अंजाम दे सकता है। भारत सरकार अफगानिस्तान संकट को लेकर पूरी तरह सतर्क हैं। भारत का विदेश मंत्रालय हर स्थिति पर नजर रखे हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ भारत की नरेंद्र मोदी सरकार लगातार कदम उठा रही है।

हमारी सुरक्षा एंजेसियां मुस्तैद हैं। जिस तत्परता और समझदारी से अफगानिस्तान से भारत के नागरिकों को वापस लाया गया है, उसकी चारों तरफ प्रशंसा हो रही है। अफगानिस्तान के मौजूदा संकट को लेकर भारत की तरफ आशाभरी नजरों से देखा जा रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं है भारत इस संकटपूर्ण स्थिति में उचित निर्णय लेगा।

कैलाश विजयवर्गीय (लेखक भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं) 

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