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आजादी का अमृत महोत्सव और भारतीय राजनीति

प्रो. रामेश्वर मिश्र पंकज । प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने आजादी का अमृत महोत्सव मनाये जाने की राष्ट्रीय पहल की है। यद्यपि एक लेखक के रूप में मैं उसे सत्ता हस्तांतरण की हीरक जयंती ही कहता हूँ। परंतु राष्ट्र के नेता के आव्हान का सम्मान तो करना ही होगा। इस अमृत महोत्सव में भारतीय राजनीति का जो स्वरूप उद्घाटित हो रहा है, उस पर हर्ष या शोक व्यक्त करने के स्थान पर उसका विश्लेषण करना आवश्यक है।

सत्ता हस्तांतरण के बाद नेहरू जी ने बहुत सोचविचार कर ब्रिटिश ढांचे का मर्म भाग त्याग दिया और सोवियत नीति अपना ली। मर्म भाग यह है कि सभी पश्चिम यूरोपीय लोकतांत्रिक नेशन स्टेट में वहाँ के बहुसंख्यकों के रिलीजन को राज्य द्वारा सर्वोच्च संरक्षण दिया जाता है तथा शिक्षा और न्याय व्यवस्था उसके ही अनुरूप चलती है। नेहरू जी ने वह मर्म भाग त्याग दिया और उसके स्थान पर राज्यकर्ताओं के सम्पूर्ण नियंत्रण में शिक्षा, न्याय व्यवस्था और संचार माध्यम ले आये।

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फलस्वरूप ईसाई थियालॉजी के विरोध में कम्युनिस्टों ने सोवियत संघ में आइडियालॉजी की जो अवधारणा प्रस्तुत की थी, उसे उसकी पृष्ठभूमि से काटकर भारत में ‘प्लांट’ कर दिया। राज्य के द्वारा नियंत्रित शिक्षा और संचार माध्यमों के प्रचार से प्रभावित भारतीय उसे ही विचारधारा कहने लगे। इससे हुआ यह कि राजनीति की वास्तविक क्रियाशीलताओं पर से जनगण का ध्यान हटा दिया गया, दैनंदिन राजनैतिक गतिविधियों और व्यापक राष्ट्रीय राजनीति – दोनों को आइडियालॉजी के रूप में देखा-दिखाया जाने लगा।

इस तरह राजनीति की समझ दबा दी गई और विचारधारा का सम्मोहन इतना फैला दिया गया कि शेष सब बातें उस आवरण में ढंक गईं। अगर सम्पत्ति का मौलिक अधिकार समाप्त किया जा रहा है, तो यह कल्याणकारी राज्य की आवश्यक नीति है। अगर हिन्दू धर्म को न्यूनतम संरक्षण भी हिन्दू के रूप में नहीं दिया जा रहा है, केवल हिन्दू व्यक्तियों को विचार और अभिव्यक्ति तथा उपासना की स्वतंत्रता के रूप में उसका पालन करने दिया जा रहा है, तो यह महान उदार राज्य का लक्षण है और अगर अल्पसंख्यकों को विशेष संरक्षण दिया जा रहा है,

जैसा विश्व में कहीं भी नहीं दिया जाता तो यह एक महान आदर्श है। इस घटाटोप में राजनीति की असलियत लोगों को दिखनी बंद हो गई। परंतु नेताओं को तो सब दिख ही रहा था। चुनाव जीतने के लिये जितने हथकंडे अपनाये जाते हैं, उन सबको लोकतंत्र के लिये आवश्यक प्रचारित कर दिया जाता है। इस प्रकार व्यवहार में वास्तविक व्यावहारिक समीकरण साधे जाते हैं परंतु विश्लेषण में आइडियालॉजी की धंुध छाई रहती है। पर दीर्घकाल में धुंध छंटनी आवश्यक है।

यह धुंध पहली बार इंदिरा गांधी द्वारा राष्ट्रीय आपातकाल के प्रावधान के दुरूपयोग से दिखी। परंतु उस धुंध का लाभ उठाकर अभूतपूर्व राजनैतिक कदम उठाते हुये इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ के संकेत पर भारतीय राज्य को सम्प्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के स्थान पर समाजवादी गणराज्य बना दिया। विश्व में सभी जानते हैं कि समाजवाद लोकतंत्र का पूर्ण विरोधी है।

परंतु भारतीय राजनैतिक विमर्श में इतने बड़े और खुले विरोध पर कोई चर्चा ही नहीं हुई। इस विचित्र संवैधानिक घटना पर सर्वानुमति बनी रही।
दूसरी बार यह धुंध तब दिखी जब जनता पार्टी के नेताओं में जूतमपैजार शुरू हुई और सोवियत संघ के निर्देश पर मधुलिमये ने दोहरी सदस्यता का नाटक रच कर पार्टी तोड़ दी और सरकार गिर गई।

तीसरी बार यह धुंध तब दिखी जब सोनिया गांधी ने साम्प्रदायिकता निवारण अधिनियम का प्रारूप तैयार किया और हर दंगे के लिये हिन्दुओं को दोषी ठहराने का विधिक षडयंत्र रचने का दुस्साहस किया। हिन्दुओं के सम्पूर्ण दमन की इस दुष्ट योजना के समय अचानक दैवी हस्तक्षेप हुआ और 2014 ईस्वी में श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री प्रभुकृपा से बने।

परंतु तब भी भारतीय राजनीति में धर्म और परमसत्ता के प्रति श्रद्धा का कोई उन्मेष नहीं हुआ और विश्लेषक लोग पार्टियों और संगठनों तथा मतवादों के विश्लेषण में मगन रहे। फलस्वरूप विगत दिनों चौथी बार यह धुंध दिखी। जब आर्थिक भ्रष्टाचार से शून्य होने के एकमात्र आधार पर ही यशस्वी हुये नीतीश कुमार ने आर्थिक भ्रष्टाचार के साकार रूप लालू यादव के चरणों में सिर झुका लिया।

जातिवाद और अमर्यादित सत्तालिप्सा की इस पराकाष्ठा का लाभ भारत विरोधी मुस्लिम उग्रवाद, मिशनरी विस्तारवाद तथा अन्य विध्वंसक शक्तियाँ खुल कर उठाने को ललक रही हैं। परंतु भारत राष्ट्र के मर्मभाग और मुख्य भाग में राजनैतिक चेतना जाग्रत है और इसलिये विध्वंसक तथा भारतद्रोही शक्तियाँ कसमसा रही हैं और कुलबुला रही हैं।

इसीलिये प्रधानमंत्री जी द्वारा अमृत महोत्सव की घोषणा का विशेष महत्व हैं। परंतु भारत अब जिस मोड़ पर खड़ा है, उसमें उसे 75 वर्षों से चली आ रही एक बड़ी दुविधा से निपटना होगा और अपने स्व की गौरवपूर्ण अभिव्यक्ति का पुरूषार्थ करना होगा। भारत का वह स्व है एकात्मता दर्शन। जिसे दीनदयाल उपाध्याय जी ने बहुत कम शब्दों में बहुत सुन्दर ढंग से व्याख्यायित किया था।

परंतु परमपूज्य डॉ. हेडगेवार ने उस समय के परिवेश में राष्ट्र की जिस विराट आध्यात्मिक और दिव्य चेतना से अनुप्राणित होकर राष्ट्र की चिन्ता में संगठन का सूत्रपात किया था, विभाजन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं के संदर्भ में राष्ट्र की वह चेतना केवल सनातन धर्म के रूप में ही है और उसी रूप में संरक्षण के योग्य है, यह तथ्य राजनीति में लगे हिन्दुत्वनिष्ठ लोग भी राष्ट्र की रट में भूल चुके हैं। संचार माध्यमों और शिक्षा संस्थानों से सनातन धर्म के सार्वभौम नियमों और मूल्यों का महत्व अनुपस्थित रहने के कारण नेशन स्टेट को ही राष्ट्र मान लिया गया है।

राष्ट्र की जिस चिति की बात दीनदयाल जी ने कही थी, उसका कोई भी संबंध नेशन स्टेट तक सीमित नहीं है। वह चिति तो सनातन धर्म की चेतना का ही नाम है। ऐसी स्थिति में भारत राष्ट्र का स्व केवल तभी अभिव्यक्त और प्रतिष्ठित हो सकता है, जब सार्वभौम मूल्यों की बात की जाये। वस्तुतः भारत का यह स्व सम्पूर्ण विश्व के लिये उपादेय और ग्रहण योग्य है। अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां भी इसके अनुकूल हैं। यद्यपि इसकी विरोधी शक्तियां भी खुल कर सक्रिय हैं।

ऐसी स्थिति में भारत के स्व की अभिव्यक्ति का एक ही उपाय है – एकात्मता दर्शन का गौरवपूर्ण उद्घोष और सम्पूर्ण विश्व में सार्वभौम नियमां अर्थात् नैतिक मूल्यों की स्थापना और प्रसार के लिये सक्रिय होने के भारत के संकल्प की घोषणा। अमृत महोत्सव में यही भारत का वैश्विक महत्व का उद्घोष होगा। परन्तु इसके लिये यह आवश्यक है कि पहले भारत शासन भारत के सभी नागरिकों के लिये सार्वभौम नैतिक मूल्यां की अनिवार्यता की घोषणा करे और इनकी उपेक्षा करने वाले तथा इनको बाधित करने वाले नागरिकों की नागरिकता समाप्त करने की भी घोषणा साथ-साथ करे। अ- नागरिक के रूप में ऐसे लोग कानून और व्यवस्था की मर्यादा में भारत में रहनेे दियेे जा सकते हैं। परन्तु उन्हें भारत की नागरिकत मान्य नहीं की जा सकती। यह घोषणा ही अमृत महोत्सव का उत्कर्ष होगी।

इसके विरूद्ध सक्रिय शक्तियों ने जाति तथा अल्पसंख्यकांे के साथ न्याय, जिसका व्यावहारिक अर्थ है अल्पसंख्यकवाद का अनुचित विशेषाधिकार संरक्षित रखना, इन आवरणों की आड़ में सत्तालिप्सा का बहुत ही बीभत्स रूप खुल कर दिखा दिया है। अरविन्द केजरीवाल से ममता बनर्जी तक तो यह खेल खेल ही रहे थे, अब कल तक भाजपा के सहयोगी बने और आर्थिक भ्रष्टाचार से अलिप्त होने के लिये प्रसिद्धि पाने वाले नीतीश कुमार ने भ्रष्टाचार, हिन्दुद्रोह तथा निकृष्ट किस्म के जातिवाद (जिसमें जाति का कोई अनुशासन मान्य नहीं होगा, केवल वोट पाने के लिये उसका आवाहन किया जायेगा) को अपना कर राजनीति करने की घोषणा करने का दुस्साहस किया है और इसके लिये अपने यशः शरीर की भी बलि दे दी है।


ऐसी स्थिति में भारत को सनातन धर्म या सार्वभौम नैतिक मूल्यों की समस्त विश्व में प्रतिष्ठा करने का अपना संकल्प उद्घोषित करना होगा और तदनुरूप राष्ट्रीय नीति निर्धारित करनी होगी। विश्व में अनेक प्रबुद्ध समूह इसमें भारत का साथ देगें। यूरोप के एथीइस्ट लोग वस्तुतः विवेक के अनुयायी लोग हैं। जिन्होंने ख्रीस्त पंथ की थियालॉजी को ठुकराने का पुरूषार्थ किया है। ऐसे यूरोपीय मानवतावादी लोग भारत के इस कदम का खुलकर समर्थन करेंगे।

संयुक्त राष्ट्र संघ में तथा अनेक अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों – यूनेस्को, विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक आदि – में और साथ ही संयुक्त राज्य अमेरिका तथा पश्चिमी यूरोप में ऐसे लोग प्रभावशाली पदों पर हैं। जो ख्रीस्त पंथ की जकड़न को ठुकरा चुके हैं और सच्चे अर्थों में मानवतावादी हैं। वे सब लोग भारत की इस पहल का समर्थन करेंगे। जातिवादी और हिन्दुद्रोही राजनीति को परास्त करने का एकमात्र उपाय यही है कि सार्वभौम नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा और संरक्षण भारत का राजधर्म घोषित हो और सम्पूर्ण विश्व में इन मूल्यों का प्रसार करने में सहयोग देना भारत का राष्ट्रधर्म घोषित हो। अमृत महोत्सव की सार्थकता इसी में है।

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