छठ महापर्व: लोक आस्था का वह महापर्व जिसने अप्रवासियों को दिलाया परदेश में सम्मान!

छठ को यदि आप पर्व कहेंगें तो बिहारी आपको समझाने लगेंगे ऐसी गलती न कीजिए छठ पर्व नही महापर्व है। बिहार समेत पूरे पूर्वांचल में छठ लोक आस्था का महापर्व है। बिहार में दिवाली आने का मतलब होता है कि चलो छठ की तैयारी शुरु कर दो। दिवाली में जहां घर को साफ सुथरा किया जाता वहीं छठ में घर से लेकर घाट तक। मतलब पूरे गांव को। इस दौरान आम तौर पर बिहारी मांसाहार नहीं करता भले ही उसके घर छठ मनाया जाए या नहीं। इस महापर्व में वो चुंबकीय शक्ति है जो जाति और मजहब की बेड़ियों से मुक्त कर हर किसी को छठ घाट की ओर खींच लेता है। हर मनोकामना को पूर्ण करने वाले इस महापर्व की ताकत ही है कि इसमें असीम आस्था रखने वाले बिहारियों को बिहार के बाहर भी ताकत मिली, सम्मान मिला।

बिहारी दो दशक पहले अपमान का शब्द था छठ मैय्या की ताकत ने उसे सम्मान का शब्द बना दिया। छठ की महत्ता बिहार के बाहर इतनी बढ़ी कि
बिहारी परदेश को भी अपना देश बना लिए। छठ ने बिहारियों को परदेश में एक जुट किया और लोकतंत्र में एकजुटता की उस ताकत को राजनेताओं से समझा। फिर ‘बिहार’ सम्मान और लोकसंस्कृति के वाहक बनते चले गए। बदलते दौर में बिहार के बाहर छठ राजनीतिक प्रदर्शन का प्रतीक बन गया। बिहारी राजनीतिक ताकत का केंद्र बन गए। महापर्व छठ की उसमें बड़ी भूमिका है। बिहारियों की आस्था है कि बिहार के बाहर छठ के प्रति आस्था रखने वालों के अपमान को देख कर ही छठी मय्या ने बिहारी शब्द को बिहार के बाहर सम्मान जनक बना दिया। खुद को बिहारी बताने से संकोच करने वाले आज तनकर कहते हैं कि वो बिहारी हैं इसमें लोक आस्था के महापर्व की बड़ी भूमिका है।

दिल्ली के यमुना घाट से लेकर मुंबई के जूहू चौपाटी तक की पहचान छठ घाट के रुप में हो गई। क्योंकि इन जगहों पर छठ के अवसर पर वो सांस्कृतिक भव्यता होती है जो बिहार में भी नहीं दिखती। जूहू चौपाटी पर छठ के अवसर पर बॉलीवुड कलाकारों को बुलाने के कारण बढ़ती भीड़ और आम आदमी को परेशानी होने के कारण मामला बोम्बे हाइकोर्ट तक भी पहुंचा। लेकिन अप्रवासियों के वोट बैंक को लुभाने के लिए न राजनेता पीछे हटे न कलाकार। आस्था के इसी महापर्व में हर कोई गोता लगाता रहा। जिससे छठ की छटा हर जगह बिखेरी जाने लगी। सही मायने में कहें तो बिहार के बाहर छठ के अवसर पर बढ़ते चकाचौंध ने बिहार में भी लोक संस्कृति के इस महापर्व को भव्यता दे दी है। देश और विदेश का कोई कोना नही जहां बिहारी हो वहां छठ की छाप न हो।

दुनिया में छठ ही एक ऐसा सांकृतिक महापर्व है जिसमें पहले डूबते हुए शक्ति की अराधना की जाती है फिर उगते हुए शक्ति की। दुनिया में शायद दूसरी कोई मिसाल नहीं जहां डूबते हुए शक्ति की अराधना की जाती हो। लोक आस्था के इस महापर्व में शाम का अर्ध्य डूबते हुए सूरज को दिया जाता है, फिर उगते हुए सूरज को। यह एक ऐसा महापर्व है जिसमें न पुरोहित की जरुरत होती है न मूर्ति की। इसीलिए बिहार समेत पूरे पूर्वांचल में इस्लाम धर्म को मानने वाले भी बड़ी संख्या में छठ के प्रति आस्था रखते है। मान्यता है कि छठ में हर मनोकामना पूर्ण होती है यदि पूर्ण आस्था के साथ इसे मनाया जाए। दिलचस्प यह है कि इस पर्व में अलूआ, सूथनी जैसे वो तमाम फल और सब्जी प्रसाद के रुप में अर्पित किया जाता है जिसे निकृष्ट माना जाता है। दरअसल छठ हर चीज को सम्मानित करने की प्रेरणा देता है। एक ही घाट पर हर जाति समुदाय के लोग आपस में पानी में खड़ा होकर अर्ध देते हैं। यह पूर्णतः जाति बंधन को तोडने वाला महापर्व है जो हर किया को ईश्वर के सामने समान रुप से खड़ा करता है। यह एक मात्र महापर्व है जिसमें प्रसाद दिया नहीं जाता भिक्षा की तरह मांगा जाता है। यह बड़े-छोटे, ऊँच-नीच और हर प्रकार के अहंकार को मिटा देने वाला महापर्व है।

बदलते वक्त में यह त्योहार धीरे-धीरे आर्थिक प्रदर्शनी का जरिया बन गया। छठ राजनीतिक प्रदर्शन का जरिया बन गया। कोई भी छठ वर्ती कभी दिवाली या होली के पर्व के तरह छठ में अपना आर्थिक प्रदर्शन नहीं करता है। मान्यता है कि छठी मय्या इससे नाराज होती है। लेकिन बिहार के बाहर यह धीरे- धीरे राजनीति में रुची रखने वालों के लिए यह राजनीतिक प्रदर्शन का त्योहार बन गया। कारण यह कि यह एक ऐसा पर्व है जो संगठित होकर एक साथ मनाया जाता है। यह किसी खास जाति या मजहब का भी पर्व नहीं माना जाता। छठ के लोक गीत पर पूरबिया को अपनी ओर खिंचता है चाहे वो किसी जाति या मजहब का क्यों न हो? पूरबियों के आपसी खिंचाव ने ही परदेश में उसे नई ताकत दी। ताकत इस कदर की दिल्ली जैसे शहर में पूर्वाचंल के लोग तय करने लगे की दिल्ली की सत्ता किसके हाथ में होगी?

यही कारण है कि बिहार के बाहर दिल्ली एक मात्र प्रदेश है जहां छठ में सरकारी छुट्टी होती है। दिल्ली में आम आदमी की सरकार बनाने में बड़ी भूमिका बिहारियों और पूरबियों की है। यही कारण है कि दिल्ली भाजपा ने अपना अध्यक्ष उस मनोज तिवारी को बनाया जिनकी पहचान ही दिल्ली में छठ घाट पर गाना गा कर अपनी पहचान बनाने से है। आज भी मनोज तिवारी दक्षिण दिल्ली के एक छठ घाट पर उसी तरह से एक कलाकार के रुप में गाना गाने जाते हैं जैसे 10 साल पहले जाते हैं। क्योंकि उनकी आस्था है कि छठी मय्या के आशीर्वाद से ही वे यहां तक पहुंचे हैं। दिल्ली में 35 से 40 प्रतिशत सीटों पर पूरबियों का प्रभुत्व है। हर राजनीतिक दल को इसका एहसास है। यही कारण है कि जिस दिल्ली में 2000 से पहले बिहारी अपमान जनक शब्द था वहां के नगर निगम में एक तिहाई बिहारी हैं। परदेश में बिहारियों और पूरबियों की इस बढ़ते ताकत को छठी माय का आशीर्वाद ही माना जाता है।

लोक संस्कृति के इस महापर्व में गैरबिहारियों की आस्था भी तेजी से बढ़ने लगी है। अहंकार को नष्ट करने वाले इस महापर्व के प्रति लोगो के आस्था को कुछ ऐसे समझ सकते हैं कि 12 साल पहले पुरानी दिल्ली के एक प्रभावशाली भाजपा नेता ने छठ घाट पर जाकर प्रसाद बांटना शुरु कर दिया। लोगों ने प्रसाद लेने से इंकार करते हुए उन्हें समझाया यहां प्रसाद सिर्फ वही बांट सकता है जिसने चार दिन की पूर्ण शुद्धता और तपस्या वाला व्रत किया है। वो चाहे किसी भी जाति का हो उसका पांव छूकर ही प्रसाद ग्रहण किया जाता है। आप उस योग्य नहीं है। यह आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन के लिए गिफ्ट देने वाला पर्व नहीं लोक आस्था का महापर्व है जहां प्रसाद भिक्षा की तरह मांगा जाता है। यह पूरे समाज को एकरुपता प्रदान करने वाला महापर्व है।

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क्यों और कैसे मनाते हैं छठ महापर्व?

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