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हिंदी को सेक्युलरिज्म से मुक्त करने की शपथ लें

हिंदी दिवस, Hindi Diwas

हिंदी दिवस के नाम पर आज काफी लिखा जाएगा तथा कई षड्यंत्रों से हिंदी को जनता से दूर करने वाले आज फिर से इस दिवस पर आंसू बहाएंगे! मगर वह आज के दिन हिंदी की ताकत को पहचानने से इंकार करेंगे। वह इस बात पर आंसू बहाएंगे कि अमुक पत्रिका बंद हुई, अमुक पत्रिका के ग्राहक नहीं, अमुक के पास पैसे नहीं, मगर वह उस मूल कारण पर नहीं जाएंगे जिस कारण आज उन पत्रिकाओं के बंद होने की नौबत आई!

हिंदी कई विरोधाभासों के साथ आगे बढ़ी है। हिंदी के इतिहास में यदि जाते हैं तो पाते हैं कि हिंदी ने मुगलों के अत्याचारों से सांस्कृतिक राहत देने का कार्य किया। अवधी, तथा ब्रज भाषाएँ जो हिंदी की ही बोलियाँ थीं उन्होंने भारतीय चेतना को जागृत किया। अन्याय से लड़ने के लिए सांस्कृतिक रूप से सुद्रढ़ किया। जब खड़ी बोली के रूप में हिंदी का विकास हुआ तो जैसे इस भाषा को पंख ही लग गए। महात्मा गांधी का यह स्पष्ट मानना था कि पूरे देश को यदि कोई भाषा एक सूत्र में बाँध सकती है तो वह है हिंदी!  उन्होंने हिंदी की अनिवार्यता पर बल दिया। जब भारत में छापेखाने का आगमन हुआ, देशप्रेम की भावनाओं का प्रस्फुटन होने लगा, तथा जनजागरण हुआ तो हिंदी ही वह भाषा बनकर उभरी जिसने पूरब से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण तक पूरे भारत को एकता की डोर में बाँध दिया।

हिंदी देखते ही देखते जन जन की भाषा बन गयी, एक आन्दोलन की भाषा बन गयी। तथा कुलीनता तथा दासता की भाषा अंग्रेजी को जैसे भारत का हर व्यक्ति अपने कंधे से झाड़ कर फेंक देना चाहता था।  हिंदी को लोकप्रिय तथा जनता की भाषा बनाने में जैसे मध्यकाल में भक्तिकालीन संतों का योगदान था तो आधुनिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर मैथिलीशरण गुप्त, प्रेमचंद, महावीर प्रसाद द्विवेदी आदि साहित्यकारों का योगदान रहा। इस भाषा को स्वामी विवेकानंद जैसे संतों ने आध्यात्मिक जागरण हेतु प्रयोग किया।

Hindi Diwas, हिंदी दिवस
हिंदी दिवस

ऐसा नहीं था कि हिंदी के विरुद्ध षड्यंत्र नहीं हुआ। जैसे जैसे हिंदी की लोकप्रियता बढ़ रही थी, भाषाई स्तर पर उसका विरोध भी आरम्भ होने लगा था। परन्तु महात्मा गांधी के साथ कई अन्य नेता भी हिंदी को ही संपर्क की भाषा बनाए रखने के इच्छुक थे।हिंदी के सुविख्यात आलोचक आचार्य श्री रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी के इतिहास को मुगलकाल माना है। उनका कहना है कि “अकबर से लेकर औरंगजेब तक मुगलों ने जिस देशभाषा का स्वागत किया वह ब्रजभाषा थी।”

वहीं राहुल सांकृत्यायन इस बात के एकदम विरोधी थे कि हिंदी को भारत में केवल उत्तर भारत के ही लोग समझते हैं। उनका मानना था कि “इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक तथा ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं।”

यही कारण था कि संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा का स्थान प्रदान किया गया। 14 सितम्बर 1949 ही वह दिन था जब हिंदी को यह पद प्रदान किया गया। हिंदी को राजभाषा बना दिया गया।

परन्तु हिंदी का वास्तविक संघर्ष उसके उपरान्त आरम्भ हुआ, जब राजनीति के लालच में हिंदी को शेष भारतीय भाषाओं के विरोध में खड़ा कर दिया गया तथा दक्षिण में तो हिंदी विरोध की राजनीति ही आरम्भ हो गयी। जिस भाषा ने अंग्रेजों के विरुद्ध पूरे देश को एकजुट कर दिया था, उसे ही क्षुद्र राजनीति ने अपनों के विरुद्ध खड़ा कर दिया।

परन्तु हिंदी ने हार नहीं मानी! 

हिंदी ने तमाम विरोधों के बावजूद जनता के ह्रदय में अपना स्थान बनाए रखा! परन्तु हिंदी के साथ जो सबसे बड़ा खेल हुआ वह था उसे मात्र अनुवाद की भाषा बना देना। हिंदी के साथ साथ अंग्रेजी को भी तब तक सरकारी कामकाज की भाषा बनाया गया था जब तक हिंदी अपने पैरों पर खड़ी न हो जाए।

हिंदी के साथ सबसे बड़ा छल किया वामपंथी साहित्यकारों तथा हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाने वाले अधिकारियों ने। सरल हिंदी के स्थान पर सरकारी भाषा में इतनी क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग किया जाने लगा कि हिंदी व्यवहारिक न होकर दुरूह होती गयी। सरकार हिंदी के नाम पर तमाम तरह के प्रयोग करती रही।

बाद में जब हिंदी को तथा सरल बनाने की मुहीम चली तो हिंदी के मूल नियमों से ही छेड़छाड़ होने लगी। हिंदी से कुटिलतापूर्वक संस्कृत के शब्द अलग करके उसे सरल बनाने के नाम पर उर्दू के शब्द ठूंसे जाने लगे। तथा यह सब हुआ हिंदी को सरल बनाने के नाम पर।

हिंदी को सेक्युलर हिदी बनाने का खेल आरम्भ हुआ। संस्कृत को वामपंथी साहित्यकार पहले ही साम्प्रदायिक ठहरा चुके थे, तथा हिंदी में से चुन चुनकर उसके शब्द हटाने भी उन्होंने आरम्भ किये। हिंदी जो पहले ही सरकारी कामकाज में अनुवाद की भाषा थी, अब सरलीकरण के नाम पर अपनी मूल पहचान से ही दूर होने लगी। तथा यह कोई बहुत पहले नहीं अपितु हाल ही में पंद्रह वर्षों के बीच हुई घटनाएँ हैं।

जहां एक तरफ हिंदी के सिकुड़ने का रोना रोकर वामपंथी साहित्यकार तथा अंग्रेजी पढ़कर बाबू बनी पीढ़ी हाय तौबा मचा रही थी वहीं साहित्य में भी ऐसा साहित्य रचा जा रहा था तथा पुरस्कृत हो रहा था जो हिंदी को हिंदी भाषियों से ही अलग कर रहा था।

हिंदी के साथ एक नहीं बल्कि कई स्तर पर षड्यंत्र हो रहे थे। तथा अभी भी हो रहे हैं। परन्तु हिंदी आज इन सभी संघर्षों से लड़कर अपनी एक विशेष पहचान के साथ सम्पूर्ण भारत के ह्रदय में विद्यमान है। तथा इसके लिए यदि कोई उत्तरदायी है तो वह है हिन्दुओं की चेतना तथा मध्यकाल में रचा गया भक्तिकालीन साहित्य या कहें रामचरितमानस!

हिंदी भारत की चेतना की भाषा है, इसलिए उस चेतना पर ही प्रहार जानबूझकर किया गया था, क्योंकि भाषा नहीं रहेगी तो पीढ़ी तो स्वयं ही नष्ट हो जाएगी। आज हिंदी के विरुद्ध षड्यन्त्रकारी एक नहीं बल्कि कई हैं, छद्म रूप धरकर ईसाई मिशनरी भी लड़ रही हैं, वह चाहती हैं कि हिंदी भारत से नष्ट हो जाए, पर यह भी विरोधाभास ही है कि हिन्दी का विरोध करने के लिए भी उन्हें अपना साहित्य हिंदी में लाना पड़ रहा है।

हिंदी के सम्मुख चुनौतियों में सबसे बड़ी चुनौती है इसे इसके मूल रूप में बने रहने देना। इसका सेक्युलरीकरण न होने देना! यदि हमने हिंदी को उसके मूल संस्कृत निष्ठ तथा भारतीय भाषाओं से भरे रूप में वापस ला दिया तो शेष संघर्ष हिंदी स्वयं ही जीत जाएगी! क्योंकि उसे अपनी चेतना प्राप्त हो जाएगी तथा उसके माध्यम से हमें तथा सम्पूर्ण भारतवर्ष को चेतना प्राप्त हो जाएगी! आइये इस हिंदी दिवस पर यह शपथ लें कि हिंदी को सेक्युलरिज्म से मुक्त करेंगे! हिंदी को उसका गौरव प्रदान करें!

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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