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कानून तो एक सप्ताह में बनकर पास हो सकता है लेकिन इच्छाशक्ति तो हो

नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई सफ़दर रहमान की फिल्म ‘चिप्पा’ में दादा पोते को कहानी सुनाता है। एक ऐसी महिला की कहानी, जिसमे वह एक ‘हनुमान’ को नारियल छीनने पर चांटा मारकर भगा देती है। सफ़दर रहमान की फिल्म में बंदर ‘हनुमान’ बना दिया जाता है। स्वाभाविक है क्योंकि ये एक मुस्लिम निर्देशक की फिल्म है। शायद इस निर्देशक को ऐसा करने के बाद एक अजीब सी संतुष्टि मिली होगी। ये वही संतुष्टि है जो इन लोगों को मंदिर और मूर्तियां तोड़कर मिलती है। हिन्दू संस्कृति के प्रति घृणा का मनोविज्ञान इस कदर हावी है कि सारी नफरत वेब प्लेटफॉर्म पर निकाली जा रही है क्योंकि यहाँ कोई सेंसरबोर्ड नहीं बैठा है जो निर्देशक सफ़दर रहमान से सवाल पूछ ले।

अनुष्का शर्मा की ‘पाताल लोक’ और एकता कपूर की ‘अनसेंसर्ड:2’ को लेकर अभी विवाद थमा ही नहीं है और अब सफ़दर रहमान की फिल्म ‘चिप्पा’ का नया विवाद सामने आ खड़ा है। कम से कम ये अच्छी बात हुई है कि इस तरह की फिल्मों को लेकर नागरिक खुलकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। एकता कपूर ने माफ़ी मांगते हुए अपनी फिल्म से सारे आपत्तिजनक दृश्य हटाने की बात कही है। ये सब हिंदुस्तानी भाऊ की चलाई गई मुहीम के कारण संभव हो सका है लेकिन एक बात समझ नहीं आती कि भाऊ पाताल लोक और चिप्पा को लेकर ऐसा अभियान क्यों नहीं चलाते हैं। यदि वे ये मुहीम हाथ में लेंगे तो कम से कम इन फिल्म निर्माताओं में कुछ तो डर बैठेगा।

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मैंने पहले भी लिखा था कि वेब प्लेटफॉर्म पर सेंसरशिप के लिए भारत सरकार ने कोई कानून नहीं बनाया है। जबकि भारतीय फिल्मों को मंजूरी मिलते ही एक सख्त कानून का प्रावधान होना चाहिए था। देश में एक ऐसी ताकत काम कर रही है, जो फिल्मों और टीवी के माध्यम से भारत की संस्कृति पर हमलावर है। इसका ख़ास निशाना देश का हिन्दू बहुल समाज है। इस विषय पर एक विशेष अनुसंधान करने की आवश्यकता है कि आखिर ‘चिप्पा’ जैसी फिल्मों को धन कौन उपलब्ध करवा रहा है। शायद आपको याद हो कि ‘पद्मावत’ से ये आक्रमण शुरू हुआ था और अब ये आक्रमण वेब प्लेटफॉर्म के मंच से किया जा रहा है। अनुराग कश्यप, एकता कपूर और अनुष्का शर्मा जैसे फिल्म निर्माताओं को रोक पाने में शक्तिशाली केंद्र सरकार भी बेबस दिखाई दे रही है।

सरकार द्वारा कोई सेंसरशिप लागू न कर पाने के कारण इन निर्माताओं का दुःसाहस सीमापार कर गया है। अनुष्का शर्मा की ‘पाताल लोक’ में उत्तरप्रदेश के लोनी से विधायक नन्द किशोर गुर्जर की फोटो प्रयोग कर ली जाती है। क्या ये दुःसाहस नहीं है कि जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधि की फोटो को एक फिल्म में उसकी इजाज़त के बिना प्रयोग कर लिया जाए। जब आप विरोध करते हैं तो वे क्षमा मांगकर वह दृश्य हटा लेते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं ‘वे दृश्य हटाए नहीं हट सकते।’ जैसे ही वेब पर ये फ़िल्में प्रदर्शित होती हैं, पायरेट्स द्वारा कॉपी कर ली जाती है। ये कॉपियां बाज़ार में सस्ते दामों पर बेच दी जाती हैं। इसके बाद इनके दृश्य पोर्न साइट्स पर अपलोड कर दिए जाते हैं। सोचिये इन निर्माताओं के माफ़ी मांगने और मूल ओरिजिनल कॉपी से आपत्तिजनक दृश्य हटाने का क्या फायदा है। रायता तो पहले ही फ़ैल चुका होता है।

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मैंने ‘चिप्पा’ को लेकर काफी खोजबीन की लेकिन एक भी मीडिया संस्थान को इसके आपत्तिजनक दृश्यों पर संज्ञान लेते हुए नहीं पाया। दरअसल मीडिया का ऐसे मामलों में सीधा सा स्टैंड है कि वे तब तक चर्चा नहीं करते, जब तक कि लोगों का विरोध प्रबल न हो जाए। अब ‘चिप्पा’ को ही लीजिये। ये पिछले साल की फिल्म है और इसे ओट्टावा इंडियन फिल्म फेस्टिवल से अवार्ड भी मिल चुका है। अवार्ड मिलने की ख़बरें मीडिया दिखाता है लेकिन विरोध की खबर गायब है। दरअसल मनोरंजन और मीडिया को लेकर कोई नियंत्रण न हो पाने के कारण स्थितियां अब विकट हो चली हैं। अनुष्का शर्मा ने तो अब तक इस भयंकर विरोध पर कोई बयान ही नहीं दिया है, हाँ उनके क्रिकेटर पति को ‘पाताल लोक’ बनाने को लेकर अपनी पत्नी पर गर्व जरूर हुआ है। इनके जैसे निर्माता भारत सरकार और उसके सेंसर को ठेंगे पर रखते हैं और यूँ दिखाते हैं कि उनको देश के लाखों लोगों के विरोध से कोई फर्क नहीं पड़ता।

सूचना व प्रसारण मंत्रालय की भूमिका यहाँ बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। ये विभाग यदि कानून नहीं बना सकता तो कम से कम इन फिल्म निर्माताओं को चेतावनी तो दे सकता है, कोई एडवायजरी जारी कर सकता है। लेकिन ऐसा कुछ ये मंत्रालय नहीं करता। किसी भी देश को उसकी मौलिक संस्कृति से पहचाना जाता है। भारत अनुपम है तो उसकी हज़ारों वर्ष प्राचीन संस्कृति के कारण। उस संस्कृति को शनैः शनैः खंड-खंड किया जा रहा है। और दुःख की बात ये है कि ये षड्यंत्र एक राष्ट्रवादी सरकार के कार्यकाल में किया जा रहा है। माना आपके पास एक शक्तिशाली कानून नहीं है लेकिन आप चुनी हुई शक्तिशाली सरकार हो। कानून तो एक सप्ताह में बनकर पास हो सकता है लेकिन इच्छाशक्ति तो हो। 

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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5 Comments

  1. Avatar Deepak Kumar says:

    एक छोटे से वायरस के लिए पुरे देश को ६० दिनों तक बंद कर दिया जाता है, तो क्या को संस्कृति नो नस्ट भ्रस्ट करती हो उन्हें प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता ?

  2. Avatar suresh chand gupta says:

    Reason behind all these things they want to tap our younger generation, and this younger generation bhartiya snaskriti ke virodh me khadi ho jaye aur organise system se bharat ko loote rahe. And one more thing I have observe koi be sarkar bharat ko ek nahi hone degi. But rest assured “yada yada he dharmasay …………” Samay samay per bhagat singh, netaji subhash bose, sardar patel, lal bhadur shastri, rajiv dixit jaisi punya Atamay bharat me janam leti rahegi aab wah samay aa gaya he bharat her field me vishwa ka marg darshan karega. Hamara complete system Burecauracy, Judicial, Police sab ki soch Angrajo wali he . Manviay sam vednay nahi he Kanoon he Mask compulsaroy he kyo. Polio desh ko napsoonk banae ki dawa. As per our system koi Bimar ho hi nahi sakta. Logo ko Daroa aur looto.

  3. Avatar Narendar Swami says:

    हिन्दुओं को भी उत्तर देना सीखना ही होगा….

  4. Avatar नवीन कुमार says:

    ऐसे विषय पैसे खाये लोगों और मिडिया के भरोसे पर नहीं छोड़ा जा सकता है । एक वृहद जनआंदोलन से सरकार में इच्छा लाई जा सकती है कि ऐसे विषयों के लिए सरकार कठोर कानून बनाए ।

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