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आज हर चूका हुआ फिल्मी कलाकार टुकड़े-टुकड़े गैंग जॉइन कर रहा है!

ये 2014 में मोदी सरकार के अस्तित्व में आने के साथ शुरू हुआ था। अचानक देश में एक अवार्ड लौटाओ गैंग उभर आई थी। अभी साहित्यकार मोदी पर मलानतें भेज ही रहे थे कि फिल्म उद्योग के कलाकार भी इस आग में कूद पड़े। शाहरुख़ खान, सलमान खान और आमिर खान के व्यक्तव्य हम सभी को याद है। जैसे-जैसे मोदी सरकार के दूसरी बार चुने जाने की संभावनाएं बनने लगी तो और भी कई कलाकार टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करने के लिए आ डटे।

स्वरा भास्कर, सोनम कपूर, जीशान अय्यूब और जाने कितने कलाकार इस सरकार के खिलाफ उतर आए। क्या वे जानते हैं कि इससे फिल्म उद्योग को कितना बड़ा नुकसान होने जा रहा है। क्या वे जानते हैं कि उनके इस कृत्य से कलाकार और प्रशंसक का स्वाभाविक रिश्ता बिखरने लगा है।

हिन्दी फ़िल्में और गानें एक आम भारतीय की कमज़ोरी रही है। हिन्दी फिल्मों के कलाकार उनके लिए जीवन में ख़ास महत्व रखते हैं। आप जिन कलाकारों की फ़िल्में देखते बड़े हुए, उनसे आपका एक ख़ास रिश्ता बन जाता है। ये ऐसा रोमानी अहसास है जो हम कभी अपने से अलग नहीं होने देना चाहते। बुजुर्ग होने तक ये अहसास हम जीवन के झंझावतों से जूझते हुए भी बचाए रखते हैं।

लेकिन सन 2014 के बाद इस रोमानी अहसास पर तेज़ाब डाल दिया गया। आमिर खान के देशविरोधी बयान ने उनके प्रशंसकों को आहत किया। अधिकांश प्रशंसकों ने मन के कोने में बसे आमिर खान को बाहर का रास्ता दिखा दिया। किसी ने शाहरुख़, किसी ने सोनम कपूर को दिल से बाहर निकाल फेंका। एक कलाकार और मुरीद का रिश्ता बिखर गया।

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कभी किशोर कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की प्रशंसा करने से मना कर दिया था तो उनके गीतों का प्रसारण विविध भारती पर रोक दिया गया था। स्वाभाविक था कि किशोर कुमार आपातकाल से नाराज़ थे और इसकी जिम्मेदार प्रधानमंत्री की शान में कसीदे नहीं पढ़ना चाहते थे। आज के सिनेरियो में अनुराग कश्यप जैसे लोग जो कर रहे हैं, उसे स्वाभाविक विरोध नहीं कहा जा सकता।

सोचिये किशोर कुमार का कदम अपनी सरकार के खिलाफ गलत माना जाता तो उस समय उनका वैसा ही बायकॉट किया जाता, जैसा आज आमिर या अनुराग का हो रहा है। आज देश की अधिकांश जनता इन विरोधी कलाकारों के साथ क्यों नहीं खड़ी है, जैसी किशोर कुमार के साथ खड़ी थी। ये सवाल उन्हें अपने आप से पूछना चाहिए। 

आज फिल्म लेखकों के सामने संकट खड़ा हो गया है। वे आमिर खान के बारे में अच्छा लिखना चाहते थे। वे अनुराग कश्यप की बेहतरीन फिल्मों के बारे में लिखना चाहते थे। वे दीपिका पादुकोण की अभिनय क्षमता के बारे में लिखना चाहते थे। अब वे क्या लिखेंगे ?

इन चंद कलाकारों ने तो ऐसा काम कर दिया है कि बहुत साल बाद जब इनकी बात होगी तो जेएनयू स्टैंड, देश छोड़ने वाले बयान ही याद किये जाएंगे। इनकी बरसों की मेहनत इस प्रायोजित क्रांति की भेंट चढ़ गई है। फिल्म उद्योग को लेकर देश में घृणा का वातावरण तैयार हो रहा है, जो इसकी नींव खोखली कर सकता है क्योंकि आज के दौर में हर दूसरे कलाकार में जनता देश के दुश्मन को देख रही है। 

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पहले के दौर में जब कलाकार को फिल्मों में काम मिलना बंद हो जाता था तो वह निर्देशक बन जाता था या सहयोगी कलाकार के किरदार स्वीकारने लगता था। आज चूका हुआ कलाकार टुकड़े-टुकड़े गैंग जॉइन करता है। स्वरा भास्कर, सोनम कपूर और जीशान मोहम्मद अय्यूब के उदाहरण सामने हैं। इन लोगों को जब विज्ञापन तक मिलना दूभर हो गया तो ये जेएनयू के साथ खड़े दिखाई देने लगे।

पूरी लिस्ट देख लीजिये, इनमे कोई कलाकार ऐसा नहीं मिलेगा, जिसका कॅरियर अच्छा चल रहा हो और वह देश तोड़ने वालों के साथ आ खड़ा हुआ हो। दीपिका आती हैं लेकिन उनके पति रणवीर इस झमेले से दूर रहते हैं क्योंकि वे सुपरस्टार हैं। उन्हें काम की कमी नहीं है। ट्विंकल खन्ना इस गैंग के साथ खड़ी होती है लेकिन उनके पति अक्षय कुमार नहीं खड़े होते। अक्षय एक बिकाऊ सितारा है और उनको अभी दूसरे रोजगार की ज़रूरत नहीं है। 

यदि बहुत जल्दी फिल्म उद्योग ने इस स्थिति को नियंत्रण में नहीं किया तो ये उनके लिए बहुत नुकसानदेह साबित होने जा रहा है। यदि कलाकार और प्रशंसक का रिश्ता टूट गया तो फिल्म उद्योग तबाह हो सकता है क्योंकि इसी रिश्ते पर तो उसकी नींव बनी हुई है।

आप अपने क्षेत्र में रहे तो बेहतर है। राजनीति में किसी तरह से प्रवेश आपका खात्मा कर सकता है। जो लोग इस गैंग के साथ खड़े हुए हैं, उनके विज्ञापन छीने जा रहे हैं और फिल्मो में वापसी तो दूर की बात है। दीपिका पादुकोण भव्य विज्ञापनों में दिखाई देती थी लेकिन आज वे विज्ञापन उनकी गिरती छवि के चलते रोक दिए गए हैं। यही हाल औरों का भी होगा। समय रहते इस बात को समझ लेना बहुत आवश्यक है।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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3 Comments

  1. Avatar Varun Sharma says:

    Anurag Kashyap aur baki award vapsi gang ko movies mat dekho….apne aap ghutne par aa jayenge aur bekar ke bayaan nai denge

  2. Avatar Kunal says:

    Joh ho raha hai bilkul sahi ho raha hai..Bollywood ne 1990 se hi leftist agendas jaise feminism,Islamism, LGBT aur Degeneracy ko hi promote kiya hai isiliye mujhe unse pehle hi nafrat thi.

  3. Avatar Manohar parihar says:

    सर नमस्कार आपको बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं आपके कहे अनुसार ही आज लिखने के लिए डायरी लेने के लिए जाएगा जय भारत जय मा भारती

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