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Tagged: Great Indian leaders

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टुकड़े-टुकड़े गैंग के लिए ‘अटल’ प्रतिज्ञा साकार होते देखना सदमें जैसा है, इसीलिए वे बेचैन हैं!

उन्हें अटल जी से नफरत करने की पूरी आजादी होनी जानी चाहिए! भारत तेरे टुकड़े होंगे का नारा देने के बाद भी देश में अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे में बताने वाले, जितनी नफरत...

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एक महान नेता की अंतिम विदाई और भावनाओं का ज्वार!

मोनिका। हजारों की भीढ़, लेकिन इस भीढ़ में हर चेहरे पर एक मायूसी थी। अटल जी जाने का गम था, एक टीस थी जो उन्हें उमस भरी गर्मी में यहां तक खीच लाई थी।...

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आरंभ से अब तक की यात्रा में ‘अटल’ माइलस्टोन!

सदेह ‘अटल’ का अनन्त गमन के लिए विदेह होना तय है, पर उनके प्रति उत्सुकता बिरले है मृत्यु मौन किन्तु अटल, आती है बिन आहट। व्याकूल करती होने और न होने की छटपटाहट किसी...

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टीवी पर वाजपेयी हमेशा टीआरपी का जरिया रहे…!

जब दुनिया उन्हें उनके ओजस्वी भाषणों और कविता को याद कर रही है मन व्याकुल हो रहा है एक दशक से ज्यादा वक्त से वे मौन क्यों हैं? मौत से उनकी ऐसी ठनी कि...

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अटलजी को लेकर 14 अगस्त को एम्स निदेशक और प्रधानमंत्री मोदी की क्या बातचीत हुई?

मोनिका, एम्स से इंडिया स्पीक्स के लिए। अटलजी 11 जून से एम्स में भर्ती हैं। अचानक 14 अगस्त को एम्स के निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया पीएमओ पहुंचे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्होंने मिलने का...

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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: ‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ’

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत...

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जिनकी वजह से राजनीति की मेरी समझ विकसित हुई, वह अटल हैं!

मैं भी राजनीति से उदासीन एक युवा था। राजनीति को अछूत समझता था। कोई रुचि नहीं थी मेरी राजनीति में। तब पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी जी का भाषण सुना था। 1996 में वह...

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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: ‘सुनो प्रसून की अगवानी का स्वर उन्चास पवन में’!

पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित सचित्र साप्ताहिक अभ्युदय में प्रकाशित अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता, 11 फरवरी 1946 नौ अगस्त सन बयालीस का लोहित स्वर्ण प्रभात, जली आंसुओं की ज्वाला में परवशता...

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पंडित मदन मोहन मालवीय ने सनातन धर्म के लिए ठुकरा दिया था गवर्नल जनरल का आग्रह !

जीतेन्द्र कुमार सिंह। कलकत्ता विश्वविद्यालय के उपकुलपति का एक पत्र पाकर पं. मदन मोहन मालवीय असमंजस में पड़ गए। वे बुदबुदाए “अजीब प्रस्ताव रखा है यह तो उन्होंने। क्या कहूँ, क्या लिखूँ?” पास बैठे...

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