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मध्यमवर्गीय-निम्नवर्गीय परिवारों का प्रेम केबीसी की मजबूती का आधार था

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विपुल रेगे। अभिनेता अमिताभ बच्चन अपने व्यक्तित्व के करिश्मे से बेजान पड़ चुके शो कौन बनेगा करोड़पति को सांसे देने की भरसक कोशिश कर रहे हैं लेकिन बात वहीं की वहीं है। कौन बनेगा करोड़पति जानकारियां और ज्ञान बढ़ाने वाला एक लोकप्रिय शो हुआ करता था, एक ऐसा केक जिसकी आइसिंग की चेरी बच्चन हुआ करते थे। वे सुनहरे दिन अब बीत चुके हैं। अब इस मंच पर धर्म को लेकर विवादित प्रश्न पूछे जाते हैं।

सन 2019 में ही अमिताभ बच्चन के प्रसिद्ध शो की लोकप्रियता में डेंट पड़ने की शुरुआत हो चुकी थी। ये सुशांत की रहस्य्मयी मौत से भी एक वर्ष पूर्व की बात है। ये डेंट जब पड़ना शुरु हुए, उस समय तक सरकार द्वारा टीआरपी भी सस्पेंड नहीं की गई थी। सन 2013 में भी एक बार केबीसी की रेटिंग गिरी थी लेकिन कुछ समय बाद बात संभल गई थी। अमिताभ बच्चन और उनके शो केबीसी की लोकप्रियता में उतार आज से दो वर्ष पूर्व ही शुरु हो चुका था।

उस वर्ष में केबीसी की रेटिंग कई बार एक धारावाहिक ‘कुमकुम भाग्य’ से नीचे आती रही। ये वह समय था, जब केबीसी में अति नाटकीयता भर दी गई थी। हर चौथा प्रतियोगी मंच पर आकर अपनी गरीबी और बेरोजगारी का रोना रोने लगा था। दर्शक इसी अधिकता से ऊबने लगे थे। एक पॉइंट पर आकर वे समझ चुके थे कि केबीसी भी ‘फिक्सिंग’ से अछूता नहीं रहा है। वे समझ चुके थे कि केबीसी में ये रोना-धोना स्क्रिप्ट का ही एक हिस्सा है। फिर सुशांत की मृत्यु के बाद फिल्म उद्योग के प्रति जो घृणा फैली, उसके चलते केबीसी की रेटिंग रसातल में पहुँच गई।

वह तो भला हो सरकार का कि रेटिंग कई माह से निलंबित है, नहीं तो इस शो का कच्चा चिट्ठा लोगों के सामने आ जाता। शो के धराशायी होने का सीधा असर बच्चन की धैर्यशीलता पर हुआ। विनम्र और जल्दी प्रतिक्रिया न देने वाले बच्चन ट्वीटर पर बात-बात में उखड़ने लगे। वे आम जनता को अपना वह एंग्री यंग मैन वाला रुप दिखाने लगे, जो वे अब तक फिल्मों में बुरे लोगों को दिखाया करते थे। इतना ही नहीं उन्होंने सनातन धर्म पर प्रहार करना अपना लक्ष्य बना लिया।

उनके शो में ‘मनुस्मृति’ को लेकर सवाल किये जाने लगे। एक बार तो उन्होंने अपने शो में छत्रपति शिवाजी महाराज को ‘शिवाजी’ कहकर तुच्छ बनाने का भी प्रयास किया। निश्चित ही बच्चन की घटती लोकप्रियता और उनके प्रति बढ़ती घृणा ने उनकी मार्केट वेल्यू गिराई है। उनके विज्ञापन कम होते चले गए हैं। ये कमी इतनी अधिक हो गई कि पोलियो के लिए सुंदर अभियान करने वाले अमिताभ को पान मसाले का विज्ञापन करना पड़ गया।

उसकी आलोचना पर खेद व्यक्त करने के बजाय फिर उन्होंने बेशर्मी दिखाकर कहा ‘पैसों के लिए किया है।’ कभी उनके शो में गलत प्रश्न कर लिया जाता है तो कभी वे धर्म को लेकर निशाने पर रहते हैं। पिछली बार जब टीआरपी निलंबित हुई थी तो केबीसी की रेटिंग 3 से भी नीचे चली गई थी। इस समय इस शो का क्या हाल है, सहज ही समझा जा सकता है।

याद करें वह समय जब केबीसी शुरु होता था और भारत थम जाता था। लोग टीवी के सामने से हटते नहीं थे। और आज का ये हाल है कि इस शो की चर्चा घर-परिवार में होना भी बंद हो गई है। इन्हीं मध्यमवर्गीय-निम्नवर्गीय परिवारों का प्रेम केबीसी की मजबूती का आधार था। अब वह आधार नहीं है और शो भी अपने अंतिम दौर में चल रहा है।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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