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भारत भूमि की असली पहचान – साधना, साहस, सेवा, सत्संग : आइए समझें सनातन के चार शब्द!

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आदित्य जैन। भाव – राग – ताल की शरणस्थली भारत की पहचान क्या है ? राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत का भारत , चक्रवर्ती सम्राट ऋषभ देव के पुत्र भरत का भारत, विश्व के वैचारिक भार को अपनी सांस्कृतिक तुला पर नापने वाला भारत , अनेकता में आध्यात्मिक एकता को अंगीकार करने वाले भारत की पहचान क्या है ? वसुधैव कुटुंबकम् , सर्वे भवन्तु सुखिन: , इदम न मम् , तम सो मा ज्योतिर्गमय, अहम् ब्रह्मास्मि आदि वचनों का उद्घोष करने वाले भारत की पहचान क्या है ? आखिर भारत भूमि में ही इन वचनों का उद्घोष क्यों हुआ? 52 शक्ति पीठों, 12 ज्योतिर्लिंगों, 4 धामों , 5 परमेष्ठियों, 10 अवतारों, 24 तीर्थंकरों, 9 देवियों वाले भारत की पहचान क्या है ? भारत की विशेषता क्या है, जो इसके स्वरूप को सनातन बना देता है ?

भारत की दृष्टि आज खंडित हो गई है। जो साधना करता है , उसे राष्ट्र सेवा से कोई सरोकार नहीं है। जो सेवा करता है, उसके पास पंच मक्कारों से निपटने के लिए पर्याप्त साहस नहीं है। जिसके पास साहस और सेवा दोनों ही मूल्य है, उसके पास संगठन नहीं है क्योंकि वह सत्संग नहीं करता है। जो साहस, सेवा के साथ संगठन निर्माण हेतु सत्संग करते हैं, वह निरंतर साधना नहीं करते हैं। जिसके कारण उनका कार्य दीर्घजीवी नहीं हो पाता है। भारत में साधना, साहस, सेवा और सत्संग चारों को समानांतर रूप से साथ – साथ ही करना होता है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु अपने शरीर, मन, बुद्धि, चेतना तथा अन्य घटकों को साधने की कला साधना है। इसके विभिन्न रूप हैं।

साधना से प्राप्त ऊर्जा से सेवा करनी होती है । जो इस राष्ट्र सेवा में बाधा बने , उससे साहस के साथ जूझना होता है। लोगों को संगठित करने के लिए सत्संग करना होता है। सत्संग से सकारात्मक ऊर्जा का संचार जनमानस में होता है। संगठन की निरंतरता सत्संग पर ही निर्भर करती है। साधना, साहस, सेवा और सत्संग का मूल उदगम भारत की आध्यात्मिकता से होता है। इसी आध्यात्मिकता से सनातन के दो मॉडल प्राप्त होते हैं, जिनकी चर्चा मैं पूर्व के लेख में कर चुका हूं।

भारत की पहचान है – आध्यात्मिकता। जो दिख रहा है, वह भौतिक है । जो भौतिक के पीछे की क्रिया संचालित कर रहा है, वो अध्यात्म है । जो स्थूल के पीछे सूक्ष्मता काम कर रही है, वो अध्यात्म है। मुझमें, तुझमें, पत्थर में, पौधे में – सबमें उसी आत्म तत्त्व का वास है , यह आध्यात्मिकता है। जो हमें कुछ भी देता है तो वह देवता है। इसीलिए पर्वत को भी देवता मानकर पूजा की। गणेश के रूप में हाथी को भी पूजा। गाय को भी पूजा। पुरुष को भी पूजा। स्त्री को भी पूजा। किन्नर को भी पूजा।

वृक्ष को भी पूजा। क्योंकि सबमें उसी आत्मा का वास है। प्रकृति के सभी घटकों को सम्मान देने की भावना आध्यात्मिकता है। आध्यात्मिक व्यक्ति कभी किसी का शोषण नहीं कर सकता। इसीलिए कहा गया – ” तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः ” अर्थात भोग भी करो तो त्यागपूर्वक। वृक्ष के फल खाओ तो पौधे को भी रोपो। किसी घटक से कुछ भी लो तो कृतज्ञता व्यक्त करो। सूर्य को अर्घ्य देना, गंगा नदी को मां कहना, सागर को भी वर्षा का जल वाष्पीकृत करके देने के कारण समुद्र देवता कहना – उसी आध्यात्मिक स्वरूप की अभिव्यक्ति है।

प्रश्न उठता है कि यह आध्यात्मिक प्रवृत्ति भारत में कैसे आयी? अन्य देशों में क्यों नहीं आयी? तो इसका उत्तर है – भारत के लोगों ने साधना, साहस, सेवा, सत्संग को अपनी जीवनशैली में शामिल किया, अन्य देश इन चार आयामों के समूह से वंचित रहे। राम ने साधना की। वशिष्ठ और विश्वामित्र दोनों ऋषियों ने राम से साधना करवाई। वनवास में साधना की । कृष्ण ने योग साधना की । विवेकानंद ने साधना की, अरविंद, दयानंद सरस्वती, टैगोर आदि ने किसी ना किसी रूप में साधना को अपने जीवन में प्रश्रय दिया।

महाराणा प्रताप द्वारा घास की रोटी खाना भी इसी साधना का ही रूप है। क्योंकि उन्होंने अपने स्वाद और मन की इच्छा को परिशोधित किया । वीर सावरकर और तिलक द्वारा जेल में बिताए गए पल साधना ही थी। साधना नहीं करेंगे तो साहस का भाव उत्पन्न नहीं होगा। जब साधना से ऊर्जा मिली तो सेवा की। सेवा के साथ साथ सत्संग को भी महत्व दिया। भारत भूमि में जन्म लेने वाले प्रत्येक महापुरुष ने साधना, साहस, सेवा, सत्संग के मार्ग को अपनाया ही है। राम जी ने स्वयं को प्रजा का सेवक माना। इसी तरह कृष्ण ने भी एक समारोह में राजाओं के चरणों को धोया। स्वतंत्रता सेनानियों ने भी साधना की तथा राष्ट्र सेवा में अपने प्राणों की आहुति दे दी। प्रश्न उठता है कि आखिर साधना, साहस, सेवा, सत्संग है क्या ?

साधना का तात्पर्य स्वयं को साध लेने से है । किसी साध्य की प्राप्ति के लिए निरंतर किए जाने वाले तप को साधना कहते हैं। स्वयं को साधने के लिए पहले अपने शरीर को वश में करना पड़ता है । अर्थात आहार, विहार, शयन, जागरण, नित्य कर्म आदि क्रियाओं पर अनुशासन रखना पड़ता है। सात्विक भोजन, रात्रि शयन, ब्रह्म मुहूर्त जागरण, एक निश्चित समय में मल विसर्जन आदि इसके अंतर्गत आते हैं । इसके साथ ही मन, बुद्धि, स्मृति, अंहकार आदि को भी अपने ध्येय अनुसार गति देनी होती है ।

यह तथ्य सुनने में जितना सरल है, करने में भी उतना ही सरल है। लेकिन प्रारम्भ में निरंतर अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है। प्रत्येक महापुरुष ने अपने जीवन काल में साधना को महत्व दिया है। भारत भूमि के किसी भी महान व्यक्तित्व का नाम लीजिए, वह साधक ही निकलेगा। इसीलिए योग दर्शन के प्रणेता ऋषि को अपने ग्रंथ में साधन पाद नामक एक अध्याय ही लिखना पड़ गया।

साधना हेतु यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि, षट्कर्म, मुद्रा, मंत्र उच्चारण, यज्ञ आदि की क्रियाएं आती हैं। साधना से प्राप्त ऊर्जा की सहज अभिव्यक्ति ही सेवा कहलाती है। सेवा के अंतर्गत अंहकार विलगन की प्रक्रिया होती है। शौचालयों के मल की सफाई करना हो, रक्तदान करना हो, किसी को मदद करनी हो, भूखे को भोजन कराना हो, उपचार कराना हो आदि सभी कार्य सेवा ही हैं। जब दूसरों की पीड़ा आपके आंखों से आंसू बनकर बहने लगे और आप उस भाव को लेकर कुछ भी करें तो वह सेवा होती है ।

सेवा में किसी लाभ या पारिश्रमिक की अपेक्षा नहीं होती है। यह आज के अर्थशास्त्र की शब्दावली वाली सेवा नहीं है। गुरु द्वारा में चलने वाला लंगर सेवा की ही अभिव्यक्ति है। मंदिरों को कोविड केयर सेंटर में बदल देना सेवा ही तो है। सेवा करना मानव होने की ही सहज पहचान है। भारत के प्रत्येक व्यक्ति के मन में दूसरे की सहायता और सेवा का स्वाभाविक भाव विद्यमान रहता ही है ।

इसीलिए नारायण सेवा संस्थान के संस्थापक अभी तक लाखों विकलांग लोगों को सकलांग कर चुके हैं। इसीलिए विवेकानंद को कहना पड़ गया कि मैं दरिद्र नारायण की सेवा को ही भगवान की पूजा मानता हूं। अपने राष्ट्र को भावी संकटों से बचाना सबसे बड़ी सेवा है। इसलिए मैं चाणक्य को सबसे बड़ा सेवक मानता हूं। इसी कारण भारत के प्रधानमंत्री भी स्वयं को प्रधान सेवक कहते हैं क्योंकि भारत की हज़ारों वर्षों की परम्परा यही रही है ।

इस सेवा में कोई बाधा बने तो उसका निराकरण करना ही साहस कहलाता है। भारत में तो साहसी महापुरुषों की एक लम्बी परम्परा है। इसके विषय में आप सभी को पर्याप्त जानकारी है ही। यदि नहीं है तो कपोत प्रकाशन की वेबसाइट पर जाकर केवल पुस्तकों के फ्रंट कवर को देख लें, आपको साहसी व्यक्तित्वों की सूची मिल जाएगी।

सेवा की भावना से प्राप्त फल की स्वाभाविक परिणति सत्संग है। जब आप सेवा करते हैं तो लोग आप से प्रभावित होते हैं। आपकी सेवा की शक्ति आपकी साधना से जुड़ी है। लोग भी उस साधना से जुड़ना चाहते हैं। साधना से जुड़ने की यह सात्विक इच्छा सत्संग कहलाती है। जब मानव के मन में उपस्थित सत्व एक दूसरे से जुड़ना चाहे, एक – दूसरे का संग करना चाहे, तो यही सत्संग है। भारत भूमि में सत्संग के कई रूप हैं।

आप किसी कक्ष में अकेले बैठकर उपनिषद के ऋषियों के सत्व का संग उनके विचारों को पढ़कर कर सकते हैं। यह भी सत्संग है। जब आप अपनी आत्मा के स्वरूप के साथ ध्यान अवस्था में बैठते हैं तो यह भी सत्संग है। किसी भी रूप में सत्य का संग करना सत्संग है। रात्रि में सबके साथ बैठकर शुद्ध अंत: करण से भजन का सामूहिक उच्चारण करना भी सत्संग है। indiaspeaksdaily के लेखों को पढ़ना और यूट्यूब के वीडियो को देखना भी राष्ट्र से संबंधित सत्य को जानना है अर्थात सत्य का संग करना है। सत्संग करना है।

सत्संग करने से मानव एक – दूसरे से मन से जुड़ते हैं तो साधना और सेवा का लक्ष्य जल्दी पूर्ण होता है । इसीलिए घर के बड़े – वृद्ध प्रतिदिन संध्या के समय सत्संग करते थे । आज भी गांवों में कीर्तन, भजन, सामूहिक गान, आरती आदि होती है, जो सत्संग का ही एक रूप है। सत्संग के द्वारा हम मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं। हमारे अंदर सामाजिक दायित्व बोध भी बढ़ता है। समुदाय आदि की उन्नति के लिए भी हम प्रेरित होते हैं। जो लोग साथ में सत्संग करते हैं, उनके बीच मतभेद होने की संभावना भी काफी कम हो जाती है ।

अगर झगड़ा आदि होता भी है तो आसानी से सुलझ जाता है । सत्संग से भी हमें सामूहिक ऊर्जा मिलती है । साधना , साहस , सेवा , सत्संग के लिए ही भारत में 52 शक्ति पीठों, 12 ज्योतिर्लिंगों, 4 धामों तथा असंख्य मंदिरों की रचना की गई थी। साधना, साहस, सेवा, सत्संग के कारण ही भारत की परंपरा और संस्कृति सनातन कहलाती है। अगर कुछ रूढ़ियां आ जाती हैं तो साधना की आग में तपकर बुद्ध, महावीर, कबीर जैसे साधक उन्हें दूर कर देते हैं। जब लोगों में किसी प्रकार की दूरी आ जाती है तो कोई चैतन्य महाप्रभु , कोई रामानुज, कोई वल्लभाचार्य भक्ति आंदोलन खड़ा करते हैं और सत्संग के माध्यम से लोगों को एक कर देते हैं।

इस प्रकार भारत भूमि में जन्म लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति को साधक, साहसी, सेवक और सत्संगी होना चाहिए। लेकिन पश्चिमी संस्कृति आज हमें व्यभिचारी, स्वार्थी और व्यसनी बनाने में लगी है। अनियंत्रित रूप से भोजन का उपभोग करो। अश्लील वेब सीरीज को स्वतंत्रता के नाम पर देखो। पोर्न वेबसाइट्स के हज़ारों करोड़ों की मार्केट कैपिटल को भुनाने की कोशिश हो या युवाओं को दिग्भ्रमित करने की बात हो, आज भारतीयों को साधना, साहस, सेवा, सत्संग से दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।

इसके लिए हिन्दू सनातन परंपराओं को बदनाम करने की साजिश भी चल रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भारत राष्ट्र के आध्यात्मिक स्वरूप को समझें तथा साधना, साहस, सेवा, सत्संग की संस्कृति को पुन: स्थापित करें एवम् इसके लाभों को प्रचारित करें। श्री संदीप जी इन चारों पक्षों पर कार्य कर रहे हैं। उनका मैं हृदय से आभार करता हूं। जय भारत। जयतु जय जय सनातन योग परंपरा। जय पारसनाथ।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र हैं । कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध पत्रों का वाचन भी कर चुके हैं। विश्व विख्यात संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के युवा आचार्य हैं। भारत सरकार द्वारा इन्हे योग शिक्षक के रूप में भी मान्यता मिली है। भारतीय दर्शन, इतिहास, संस्कृति, साहित्य, कविता, कहानियों तथा विभिन्न पुस्तकों को पढ़ने में इनकी विशेष रुचि है और यूट्यूब में पुस्तकों की समीक्षा भी करते हैं ।)

aditya jain

लेखक आदित्य जैन
सीनियर रिसर्च फेलो
यूजीसी प्रयागराज
adianu1627@gmail.com

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