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सिद्दू की ताजपोशी का क्या है त्रिकोण? सोनिया परिवार की पार्टी पर कब्जे की लड़ाई पर अमित श्रीवास्तव की एक रिपोर्ट।

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अमित श्रीवास्तव। कैप्टन अमरिंदर सिंह काँग्रेस के एकमात्र ऐसे नेता है जो अपने दम पर चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। यह क्षमता अब सोनिया गांधी में नहीं बची है और राहुल व प्रियंका गांधी में कभी थी ही नहीं। अहमद पटेल, ऑस्कर, दिग्विजय सिंह कुशल संगठक हो सकते हैं किंतु चुनाव जीतवाने की कला इन्हें नहीं आती। कैप्टन अमरिंदर सिंह से इतर वर्तमान कॉंग्रेस में कोई भी नेता नहीं बचा है जिसमें अपने दम पर पार्टी को जीत दिलवाने की क्षमता हो।

कैप्टन को पता है कि कॉंग्रेस की मर्ज क्या है और इसका उपचार क्या है। इसी उपचार का इस्तेमाल करते हुए ही उन्होंने उस दौर में भी पंजाब चुनाव में कॉंग्रेस की सरकार बनवाने में सफल हुए जब कॉंग्रेस नेतृत्व विहीन अपनी सबसे कठिन दौर से गुजर रही थी। यह उपचार है सोनिया परिवार मुक्त कॉंग्रेस। भले ही आज कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद, आनन्द शर्मा जैसे वरिष्ठ नेता कॉंग्रेस की दुर्दशा के लिए सोनिया परिवार को जिम्मेवार मान रहे हो किन्तु कैप्टन पहले कॉंग्रेसी थे जिन्होंने इस मर्ज को न सिर्फ समझा बल्कि इसका उपचार करते हुए 2017 के पंजाब विधानसभा चुनाव में जीत दिलवाने के लिए पूरी चुनावी प्रक्रिया से सोनिया परिवार को दूर रखा।

यह एक पहला चुनाव था जिससे सोनिया, राहुल गांधी व प्रियंका वाड्रा को दूर रखा गया और पार्टी विजयी भी हुई। कॉंग्रेस की मर्ज को पहचानते हुए यह फैसला कैप्टन ने लिया था। कैप्टन की इस राजनीतिक समझ वाली क्षमता को न सिर्फ दरकिनार करते हुए बल्कि उनकी मंशा के विरुद्ध एवं उनके विरोध को नजरअंदाज करते हुए नवजोत सिंह सिद्धू को पंजाब का प्रदेश अध्यक्ष बनाना फिर से साबित करता है कि वर्तमान कॉंग्रेस को खैव्य्या नहीं चापलूस ही चाहिए।

पार्टी को संगठन व सरकार चलाने की क्षमता वाले कुशल नेता अथवा कार्यकर्ता नहीं अपितु 10 जनपथ का वफादार चाहिए। सोनिया परिवार को कॉंग्रेस से ज्यादा अपनी चिंता है। यही कारण है कि लगभग सभी वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी के द्वारा हाल के दिनों में लिए गए फैसलों से नाखुश है और इसका खुल कर विरोध कर रहे हैं। किंतु पुत्रमोह व पार्टी पर कब्जे की जिद लिए सोनिया परिवार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।

कैप्टन की राजनीतिक सूझबूझ ने उन्हें मुख्यमंत्री तो बनवा दिया किन्तु समय के साथ वो 10 जनपथ की नजरों में चुभने भी लगे। वर्तमान स्थिति में जब लगभग सभी वरिष्ठ कॉंग्रेसी पार्टी के अंदर लोकतंत्र की स्थापना की मांग का सहारा लेते हुए पार्टी को सोनिया परिवार से मुक्ति की मांग कर रहे हैं तो 10 जनपथ को यह डर और भी सताने लगा है कि अमरिंदर सिंह विरोधी नेताओं के सिरमौर न बन जाए और पार्टी के अंदर उनका कद राहुल गांधी या प्रियंका से बड़ा न हो जाए। सोनिया परिवार का विरोध करने वाले नेताओं का कमजोर पक्ष यह है कि ये सब हारे हुए नेता हैं।

ये सोनिया परिवार पर भी यही आरोप लगाते हैं। ऐसे में यदि कैप्टन अमरिंदर सिंह दुबारा जीत दर्ज कर लेते हैं तो पार्टी के अंदर यह सन्देश जाएगा कि कैप्टन ही एकमात्र ऐसे नेता है जो पार्टी को जीत दिलवा सकते हैं। इस जीत का श्रेय अकेले कैप्टन को मिलेगा। पार्टी के अंदर सोनिया परिवार का विरोध कर रहे वरिष्ठ नेताओं को फिर से हमला करने का मौका मिल जाएगा। सोनिया गांधी पर फिर से पार्टी का आंतरिक चुनाव करवाने का दबाव पड़ेगा। सोनिया गांधी पार्टी पर कब्जे को कभी छोड़ना नहीं चाहती यह भी एक कारण है कि पंजाब में पार्टी की जीत का श्रेय वो अकेले कैप्टन को दिलवा कर अपने लिए एक मजबूत प्रतिद्वंद्वी खड़ा नहीं करना चाहती। सोनिया सिद्धू की नियुक्ति कर अमरिंदर सिंह पर नकेल कसने का प्रयास कर रही है।

नवजोत सिंह सिद्धू की नियुक्ति का एक सूत्र चल रहे किसान आंदोलन से भी जुड़ता है। सिद्धू की ताजपोशी का विरोध करते हुए केंद्रीय नेतृत्व को लिखे पत्र में कैप्टन ने पंजाब की स्थिति का भी जिक्र किया था। उन्होंने विशेष रूप से इस बात का जिक्र किया कि पंजाब एक सीमावर्ती राज्य है। कॉंग्रेस की आंतरिक रस्साकशी में सीमावर्ती राज्य होने की बात क्यों कही गई? राज्य के मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें यह ज्ञात है कि चल रहे किसान आंदोलन के पीछे कौन सी शक्तियां काम कर रही है और इसका परिणाम क्या हो सकता है? पंजाब दशकों तक खालिस्तान की आग में झुलस चुका है।

गैर सिख और विशेष कर पंजाब के अंदर हिन्दू विरोधी भावना का दुष्परिणाम दिल्ली में सिख विरोधी दंगे के रूप में कैप्टन देख चुके हैं। 26 जनवरी को लालकिले की घटना ने साबित कर दिया है कि इस किसान आंदोलन का चेहरा जो भी स्वयंसिद्ध किसान नेता हों किन्तु कमान सीमा पार के ही हाथों में है। कैप्टन व इनके मंत्री दबी जुबान से कोरोना की दूसरी लहर के संक्रमण के फैलने का एक कारण किसान आंदोलन को ठहरा चुके हैं। किसान आंदोलन की सीमा पार की कमान को अमरिंदर सिंह पहचानते हुए खुद को इससे अलग चुके हैं। किंतु सोनिया परिवार को इन विदेशी शक्तियों से कोई परहेज नहीं है।

मोदी विरोध व सत्ता से दूरी ने सोनिया परिवार व उनके सिपहसलारों को इतना भ्रष्ट कर दिया है कि वो भारत विरोधी विदेशी शक्तियों के एजेंडे को बढाने से गुरेज नहीं कर रहे। ऐसे में किसान आंदोलन द्वारा आहुल काल दिवस से जब कैप्टन किनारा कर रहे थे तब भी सिद्धू अपने घर पर काला झंडा फहरा कर खुद को किसान आंदोलन से जोड़ रहे थे। कैप्टन एक सधे हुए राजनेता हैं। वो लोगों की नब्ज पहचानते हैं। वो जानते हैं कि किसान आंदोलन में निहित खालिस्तान समर्थकों के साथ खड़ा दिखने से पंजाब के हिन्दू व प्रवासी मतदाताओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

किन्तु मोदी विरोध व पार्टी पर कब्जे की लड़ाई में अंधी हो चुकी सोनिया परिवार को पार्टी की जीत से ज्यादा मोदी विरोध व पार्टी पर कब्जे की चिंता रहती है। यही कारण है कि सिद्धू जैसे अपरिपक्व ढोल के हाथों कैप्टन अमरिंदर सिंह के रास्ते उन सभी वरिष्ठ नेताओं को सन्देश देना चाहता है जो सोनिया परिवार का पार्टी पर कब्जे का विरोध कर रहे हैं।

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