आतंकवाद राजनीतिक नहीं, विशुद्ध मजहबी समस्या है!



Posted On: July 15, 2016
ISD Bureau
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इस्लामपंथ की बंदूक को वामपंथ की कलम अब और कवर नहीं दे सकती! सोशल मीडिया ने जनता को जगाना शुरु कर दिया है! जो लोग आतंकवाद को राजनीति की समस्या बताकर मजहबी उन्माद को बढ़ाने में अपना सहयोग दे रहे हैं, वह भी उतने ही दोषी हैं, जितना बुरहान वानी या कोई अन्य आतंकवादी। कश्मीर से लेकर फ्रांस तक, एक विचारधारा विशेष के लोगों द्वारा अपने विचार से अलग विचार रखने वालों की हत्याएं हो रही है, और इसे राजनीतिक समस्या बताया जा रहा है? शर्म आनी चाहिए ऐसे दोगले और पाखंडियों को जो विशुद्ध मजहबी समस्या को राजनीतिक समस्या बताकर आतंकियों के प्रति सहानुभूति का एजेंडा चला रहे हैं!

एक तर्क यह भी दिया जाता है कि इस्लामी आतंकवाद से सबसे अधिक नुकसान तो मुसलमानों का ही हो रहा है, सबसे ज्यादा तो मुसलमान ही मर रहे हैं तो फिर इसे इस्लामी आतंकवाद न कहा जाए! बहावी सुन्नी विचारधरा शिया, अहमदिया, सूफी आदि को मुसलमान मानता ही कहां है कि आप मुसलमानों की मौत का रोना रो कर इस्लामी चरमपंथ से झुलस रही दुनिया का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं? दुनिया भर में आतंकवाद के कारण मरने वाले मुसलमानों में शियाओं की संख्या गिन लीजिए, पता चल जाएगा कि बहाबी कटटरपंथी विचारधरा किस तरह से इस्लाम-इस्लाम में भेद कर कत्लेआम करती है। हिंदू, बौद्ध आदि बुतपरस्त धर्मावलंबियों को तो काफिर कह कर मारने की घोषणा पवित्र किताब करती ही है, इसलिए हमारी मौत को मत गिनिए! और तभी तो आपने कश्मीरी पंडितों की मौत की गिनती आज तक नहीं की है!

इस्लामपंथ व वामपंथ- यह दो साम्राज्यवादी विचारधारा है, जिसका मूल उसूल है दूसरे विचारों को समाप्त करना। एक 700 ईस्वी में दुनिया को ले जाना चाहता है और दूसरा 1917 की सोवियत क्रांति का ख्वाब देखता है। यह दोनों ही विचारधरा खूनी क्रांति पर आधारित है। मुहम्मद व उनके खलिफाओं ने इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए खून बहाया, लेनिन-स्टालिन ने साम्यवादी राज्य के लिए कत्लेआम किया। कोई फर्क नहीं है। पूरी दुनिया की लाशें गिन लीजिए, इन दो विचारधाराओं ने सबसे अधिक मानव हत्या की है।

इसीलिए बुरहान वानी, अफजल, कसाब, याकूब आदि इस्लामी आतंकवादी बंदूक से दूसरे विचारधारा के मानने वालों को शूट करते हैं और रवीश, राजदीप, बरखा, कविता, सागरिका जैसे वामपंथी बुद्धिजीवी कलम और कैमरे से अन्य विचार वालों को बहस से बाहर करने की कोशिशों को अंजाम देते हैं।

मैं जो ‘भारतीय वामपंथ का काला इतिहास’ लिख रहा हूं, उसके लिए जितना भी पढ रहा हूं, पाता हूं कि एक स्ट्रेटेजी के तरह इस्लामपंथ व वामपंथ एक-दूसरे को कवर फायर देते रहे हैं। इसीलिए फ्रांस में जब एक सनकी मुसलमान 100 लोगों को मार देता है तो एनडीटीवी ‘इस्लामी आतंकवाद’ नहीं, ‘खूनी ट्रक’ लिखता है! खुद को खूबसूरत शब्दों, जैसे- लेफट लिबरल कह कर ये रेडिकल लेफटिस्ट रेडिकल इस्लामिस्ट को पूरी दुनिया में कवर फायर देते रहे हैं। यूरोप में राष्ट्रवाद जिंदा है, इसलिए उन्हें सदबुद्धि आने लगी है! भारत में अभी सदबुद्धि आना बांकी है, क्योंकि यहां दरिद्रों के लिए विचारधारा के साथ-साथ विदेशी फंडिंग का भी जुगाड़ अहम रखता है! आईएसआई ने कश्मीरी आतंकियों को आंदोलनकारी बताने के लिए जो 100 करोड़ खर्च किए हैं, वो इनके पेट में ही तो गया होगा न!



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