युद्ध में अयोध्या: बाबरी एक्शन कमेटी और इसलामपंथी-वामपंथी इतिहासकारों ने किस तरह अयोध्या मामले को उलझाने का खेल खेला, इसे एक उदाहरण से समझते हैं!



'Yuddha Mein Ayodhya' Book by Hemant Sharma
ISD Bureau
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सुप्रीम कोर्ट ने यह तय कर दिया कि अयोध्या मामले में सुनवाई केवल जमीन विवाद पर होगी, अन्य किसी भी चीज पर नहीं। वहीं अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए संत समाज अनशन पर बैठ चुका है। संत समाज का मानना है कि राष्ट्रपति व केंद्र सरकार से लेकर उप्र तक में भाजपा की सरकार है। ऐसे में वह यदि मंदिर निर्माण के लिए अभी भी कानूनी दांव-पेंच में उलझी रहेगी तो यह हिंदू समाज को स्वीकार्य नहीं होगा।

धधकती अयोध्या को समझने के लिए India Speaks daily वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हेमंत शर्मा की पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या’ शीर्षक से ही एक श्रृंखला शुरु कर रहा है, ताकि छोटे-छोटे टुकड़ों में आज की पीढ़ी अयोध्या और उससे जुड़े इतिहास, महत्वपूर्ण घटनाएं व उसके सच को जान-समझ सके। यह पूरी श्रृंखला प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हेमंतजी की पुस्तक ‘युद्ध में अयोध्या’ पर आधारित है। आजादी के बाद अयोध्या से जुड़ी पांच बड़ी घटनाओं में से चार के हेमंतजी न केवल गवाह रहे हैं, बल्कि उस दौर में जनसत्ता के लिए उसकी रिपोर्टिंग भी की है। यही नहीं, अयोध्या मसले पर बातचीत के कई पक्षों के साथ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हेमंत जी शामिल रहे हैं। इसलिए इस किताब के तथ्य एक तरह से अयोध्या की गवाही हैं।

श्रृंखला-एक

हेमंत शर्मा। साल 1986 में ताला खोलने के अदालती फैसले के विरोध में जब बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी बनी थी, तभी से कमेटी और उसके नेता सैयद शहाबुद्दीन कई दफा यह सार्वजनिक घोषणा कर रहे थे कि अगर यह सिद्ध हो जाए कि बाबरी ढांचे से पहले वहां कोई मंदिर था और मौजूदा मसजिद उसे तोड़कर बनाई गई है, तो हम शरीयत के मुताबिक उसे मसजिद नहीं मानेंगे। मुसलिम नेता स्वयं वहां जाकर उस ढांचे को गिरा देंगे।

इसके बाद इस चुनौती का जवाब देने के लिए दोनों तरपफ से ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्य इकट्ठा किए जाने लगे। प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के वक्त इस सवाल पर दोनों पक्षों की छह दौर की बैठकें हुईं। छठी बैठक में जब चार घंटे के इंतजार के बाद बाबरी पक्ष के विशेषज्ञ नहीं आए तो बैठक बिना किसी नतीजे के खत्म हो गई। इससे पहले दोनों पक्षों ने इस मुद्दे पर साक्ष्यों का आदान-प्रदान भी किया। प्रो. आर.एस.शर्मा, प्रो. अतहर अली, प्रो. सूरजभान, प्रो. डी.एन.झा और जावेद हबीब बाबरी कमेटी की तरफ से और विश्व हिंदू परिषद की ओर से प्रो.बी.पी.सिन्हा, डॉ. स्वराज प्रकाश गुप्ता, प्रो. हर्ष नारायण, प्रो. के.एम. लाल, प्रो. देवेंद्र स्वरूप, बलदेव राज ग्रोवर सबूत पेश करने वालों में थे।

अब इतिहास और पुरातत्व अयोध्या विवाद के केंद्रीय बिंदु बन गये थे। चौतरफा ऐतिहासिक साक्ष्यों की पड़ताल शुरू हो गयी। ढांचा गिरने के बाद जनवरी 1993 में भारत के राष्ट्रपति ने ‘प्रेसीडेंसियल रेफरेंस’ के जरिए सुप्रीम कोर्ट से यह पूछा कि राम जन्मभूमि/बाबारी ढांचे से पहले वहां किसी हिंदू मंदिर या धार्मिक भवन का अस्तित्व था? सुप्रीम कोर्ट को लगा कि सरकार उसके कंधे पर रख बंदूक चलाना चाहती है। लिहाजा लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल पर राय देने से मना कर दिया और संविधान के अनुच्छेद 143 ए के तहत किया गया ‘रेफरेंस’ सरकार को वापस लौटा दिया।

इस विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 सितंबर, 2010 को जो फैसला सुनाया, उसमें हाईकोर्ट ने इस सवाल का जवाब ढूंढ़ लिया। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘आर्कलॉजि सर्वे ऑफ इंडिया’ की उस रिपोर्ट को मंजूर कर लिया, जिसमें कहा गया था कि बाबरी ढांचे के नीचे खुदाई में दसवीं शताब्दी के हिंदू मंदिर के कई सबूत मिले हैं। तीन जजों की इस बेंच ने अपने फैसले में ए.एस.आई की रिपोर्ट को ही आधार बामना।

ए.एस.आई ने 574 पेज की जो रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी, उसमें कहा गया कि विवादित ढांचे के नीचे खुदाई में नक्काशीदार पत्थर, कसौटी पत्थरों के खंभे, देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाएं, मंदिर में इस्तेमाल होने वाली नक्काशीदार सामग्री, आमलक, काले पत्थर के खंभों के उपर लगने वाली अष्टभुजीय आकृति मिली हैं। इसके अलावा वहां मिले 50 खंभों की नींव, उस जगह पर विशालकाय हिंदू ढांचे की मौजूदगी का सबूत है। जो साफ तौर पर मसजिद से पहले वहां मंदिर होने के संकेत देते हैं। ये पुरातात्विक सबूत उत्तर भारत में बने मंदिरों की विशिष्टताओं से पूरी तरह मेल खाते हैं।…

भारत सरकार ने अयोध्या ध्वंस पर फरवरी 1993 में एक श्वेत-पत्र प्रकाशित किया। श्वेत-पत्र के पैरा 2/3 में भी इसी बात का खुलासा हुआ कि इस विवाद के सौहार्दपूर्ण हल के लिए जो बातचीत दोनों पक्षों में हुई, उसमें यही मुद्दा उभरकर सामने आया कि “जहां वर्तमान ढांचात है, वहां क्या पहले मंदिर था? जिसे मसजिद निर्माण के लिए बाबर ने ढहा दिया।” भारत सरकार का श्वेत-पत्र कहता है कि मुसलिम नेताओं ने यह भी कहा कि अगर ऐसा साबित होता है तो मुसलिम स्वेच्छा से हिंदुओं को यह विवादित स्थल सौंप देंगे।

इन्हीं सवालों से दो-चार होते इलाहबाद हाईकोर्ट की लखनउ पीठ को भी पुरातात्विक साक्ष्यों में ही रास्ता दिखा। उसने भी ए.एस.आई से यही पूछा। ए.एस.आई भारत की शीर्ष पुरातत्ववेत्ता शोध एजेंसी है, जिसे अंग्रेजों ने 1861 में बनाया था।

हाईकोर्ट ने ए.एस.आई से कहा कि खुदाई से पहले उस जगह का जी.पी.आर. सर्वे कराया जाए, जहां बाबरी ढांचा खड़ा है। जी.पी.आर. अध्ययन का मतलब होता है ‘ग्राउंड पेनीट्रेटिंग रडार’। इसमें जमीन को खोदे बगैर जमीन के नीचे की संरचना को देखा जाता है, जिससे पता चलता है कि क्या जमीन के अंदर कुछ ऐसे सबूत हैं, जो यह बताएं कि उस जगह पर पहले कभी कोई इमारत थी या नहीं।

इस पद्धति में उच्च क्षमता के एंटिना जमीन में विद्युत चुंबकीय तरंगों को भेजते हैं। जमीन के भीतर अलग-अलग संरचनाओं से टकरा एक कंप्यूटर में गति की विभिन्नता रिकॉर्ड होती है। इससे जमीन के भाीतर ढांचों का नक्शा तैयार होता है। अयोध्या में विववादित जगह पर इंडो-कनैडियन फर्म ‘तोजो इंटरनेशनल’ ने हाईकोर्ट के आदेश पर 30 सितंबर, 2002 से 17 जनवरी, 2003 तक जी.पी.आर अध्ययन किया। इस अध्ययन की रिपोर्ट ए.एस.आई के जरिए हाईकोर्ट में 17 फरवरी को दाखिल हुई। इस रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे हुए। जमीन की सतह से आधा मीटर नीचे से लेकर करीब साढ़े पांच मीटर की गहराई तक अलग-अलग वक्त में तीन तरह के निर्माण के सबूत मिले।

इसमें प्राचीन काल के स्तंभ, दीवारें, चबूतरे, पत्थर के फर्श और प्राचीन भवन की नींव जैसी बहुत सी चीजें दिखीं। इस सर्वे ने सबसे पहले जमीन के नीचे किसी और ढांचे की बात कही। इसकी पुष्टि पुरातात्विक खुदाई के जरिए ही हो सकती थी। इस सर्वे रिपोर्ट के नतीजों को देखकर ही 5 मार्च, 2003 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने विवादित जगह पर ए.एस.आई से खुदाई करके साक्ष्य इकट्ठा करने को कहा।…

शुरुआती खुदाई से जो सांकेतिक अवशेष निकले, उन्होंने बाबरी समर्थक खेमे के माथे पर चिंता की लकीचें खींच दीं। नतीजतन आनन-फानन में इस खेमे ने एक बयान जारी कर कहा कि यह खुदाई बेमानी होगी, इससे गलत नजीर पड़ेगी। उनकी दलील थी कि इस आधर पर किसी भी धार्मिक स्मारक को ध्वस्त किया जा सकता है, अगर उसके नीचे यह सबूत मिल जाए कि वहां दूसरे समुदाय का धार्मिक ढांचा पहले कभी मौजूद था। कोर्ट के इस आदेश से गलत मिसाल वाले इस सिद्धांत को न्यायिक मान्यता मिल जाएगी, अतः उसे रोका जाए। बयान जारी करने वालों में प्रो.इरफान हबीब, के.एम.श्रीमाली, सूरज भान और एडवोकेट राजीव धवन थे।

इस विरोध-पत्र पर दस्तखत करने वालों ने ए.एस.आई की निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े किए। इन लोगों ने इस तरह के कठिन, वैज्ञानिक एवं तटस्थ उत्खनन कर सकने की ए.एस.आई की क्षमता पर भी उंगली उठाई। यह अलग बात थी कि प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के जमाने में और फिर बाद में नरसिंह राव के शासनकाल में यही विद्वान बाबरी पक्ष के इतिहासकार बनकर वहां पहले से ही मसजिद थी, इस बात के सबूत दे रहे थे। ये विद्वान दोनों पक्षों की संवाद प्रक्रिया में भी शामिल रहे। हर बैठक में मसजिद के समर्थन में साक्ष्य देते थे। पर जब पुरातात्विक साक्ष्य अपने खिलाफ जाते नजर आए तो ये इतिहासकार मैदान से भाग खड़े हुए, इस दलील की आड़ में कि अगर ऐसा हुआ तो फिर ऐतिहासिक इमारतों को गिराने का नया सिलसिला शुरू हो जाएगा और इस सिद्धांत को न्यायिक मान्यता मिल जाएगी।

बाबरी समर्थक इन विद्वानों का बयान एक तरह से अपने पक्ष की कमी को स्वीकार करना था। बाबरी समर्थक गुटों ने यह बात कभी कबूूल नहीं की थी। यह बाबरी मसजिद के नीचे गैर-मुसलिम ढांचा होने की संभावना की पहली सांकेतिक स्वीकारोक्ति थी। इससे पहले तक यह गुट पूरी ताकत के साथ कहता आया था कि बाबरी मसजिद खाली जगह बनी है। लेकिन बदले हालातों ने उन्हें अपनी रणनीति को बदलने के लिए मजबूर किया।

क्रमशः…

नोट- केवल शीर्षक में संपादकीय स्वतंत्रता ली गई है, अन्यथा संपूर्ण तथ्य ‘युद्ध में अयोध्या’, प्रभात प्रकाशन (पेज-307 से 310) से ज्यों के त्यों लिए गये हैं।

हेमंत शर्मा जी की अयोध्या पर दो पुस्तकें एक साथ आयी है। ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’। दोनों पुस्तक कुरियर/डाक से मंगवाने के लिए मोबाइल नंबर- 7827007777 पर फोन, एसएमएस, व्हाट्सअप या मिस कॉल दें।

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इंडिया स्पीक्स डेली युद्ध में अयोध्या पुस्तक के आधार पर इसी नाम से अयोध्या पर श्रृंखलाबद्ध तथ्य-परक खबरों का प्रकाशन कर रहा है। अन्य खबरों को पढ़ने के लिए नीचे दिए लिंक ओपन करें-

युद्ध में अयोध्याः बाबरी ध्वंश से तीन दिन पहले नरसिंह राव कल्याण सिंह सरकार को बर्खास्त करना चाहते थे, लेकिन राज्यपाल ने ऐसा होने नहीं दिया!

URL: Yuddha Mein Ayodhya Book by Hemant sharma

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