एक महिला जिसने महिलाओं के उन ‘पांच दिनों’ के कष्ट को दूर करने के लिए सरकारी नौकरी छोड़ी, शादी नहीं किया और खुद को झोंक दिया!

एक स्वच्छ और बेहतर जीवन सबका अधिकार है! दुनिया की हर स्त्री एक बेहतर और स्वच्छ ज़िन्दगी चाहती है, वह अपने लिए कम से कम स्वच्छता और सामाजिक टैबू से परे एक ज़िन्दगी चाहती है। और यह चाह कोई गलत नहीं है। मगर उनकी स्वच्छता की चाह इतनी भी आसान नहीं है। किशोर होते ही महीने के वह पांच दिन, जब उन्हें न केवल सामाजिक टैबू से लड़ना होता है, बल्कि उसके साथ ही उन्हें अपनी साफ़ सफाई का भी ध्यान रखना होता है, तब उनके सामने असल समस्या पैदा होती है। हर घर में इतना पैसा आज भी नहीं है कि वह अपनी घर की औरतों के लिए सैनिटरी पैड खरीद सकें। महीने के वे पांच दिन? और उनकी सार्थकता! न ही तो बालिकाओं को उन दिनों के बारे में बहुत विस्तार से बताया जाता है और न ही उन दिनों में ख़ास तरह से साफ़ सफाई बरतने की सलाह दी जाती है।

ऐसे में कई हाथ हैं, जो समाज की तरफ से लड़कियों के लिए उठने चाहिए। सौभाग्य से इन दिनों महिला स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता आई है और ऐसे क्षेत्रों में भी लडकियां ही कुछ नया करने के इरादे से उतर रही हैं। उनके लिए मुनाफ़ा है महिलाओं का स्वास्थ्य, उनके लिए मुनाफ़ा है महिलाओं की स्वस्थ मुस्कान, ऐसी ही एक महिला हैं दिल्ली की प्राची कौशिक, जिन्होनें गरीब घरों की लड़कियों के लिए कम कीमत वाले सैनिटरी नैपकीन रक्षक बनाए। उन्खोनें हर महिला तक सैनिटरी नैपकीन पहुंचाने का जिम्मा लिया।

जब आज भी महीने के उन पांच दिनों के बारे में बोलना एक टैबू माना जाता है, ऐसे में प्राची के लिए यह सब आसान तो होगा नहीं, मगर यह प्राची की समाज की बुराइयों को साफ़ करने की जिद्द ही थी, जिसने उसे इस तरफ मोड़ा! प्राची कहती हैं कि आज भी पीरियड और सैनिटरी नैपकिन शब्द सुनने में बहुत अजीब लगते हैं, आप उनके बारे में सामने बात नहीं कर सकते, तो ऐसे देश में जहां पर महिलाओं को अभी भी सैनिटरी पैड कागज़ में लपेट कर ले जाने होते हैं, तो ऐसे में महिला का सैनिटरी पैड के बारे में बात करना बहुत ही मुश्किल था।

प्राची के लिए अपने सपने को साकार करना बहुत ही कठिन था, क्योंकि 32 वर्ष की उम्र में अपने नौकरी छोड़ना और शादी न करके कुछ इस तरह का काम करना, धारा के खिलाफ चलने जैसा था। मगर जिसमे कुछ करने का जूनून हो, तो उसके लिए हर कोई राहें आसान कर देता है। ऐसा ही प्राची के साथ हुआ। प्राची ने कहा कि गरीब महिलाएं जब उनसे कहती थीं, कि उनके पास सैनिटरी नैपकीन खरीदने का पैसा नहीं है, तो उनका यह काम शुरू करने का इरादा और गहरा हो जाता था। जब उन्होंने देश भर की महिलाओं से यह पता चला कि वे अपने पीरियड के दिनों में बहुत ही नुकसानदायक सामानों का इस्तेमाल करती हैं जैसे जूट का बोरा आदि और उन्हें यह पता था कि इससे पेशाब में संक्रमण बढेगा ही, मगर इसके लिए उन औरतों का क्या आरोप लगाना! उन्हें तो यह सब पता ही नहीं था या न ही वह सैनिटरी पैड उनकी जेब में था।

दिल्ली सरकार की अपनी नौकरी को छोड़कर प्राची ने शोध के बाद 2016 में व्योमिनी नामक अपना सामाजिक उपक्रम शुरू किया और इस साल अपने दोस्तों और शुभचिंतकों की छोटी सी टीम के साथ रक्षक नामक सैनिटरी पैड शुरू किए। रक्षक को जनता के लिए सांसद मीनाक्षी लेखी जी ने प्रस्तुत किया। गरीबी खत्म करने की इस जंग में मिसेज़ इंडिया वर्ल्ड 2018 रूमाना सिन्हा सहगल ने रक्षक का प्रचार अंतर्राष्ट्रीय मेनस्ट्रल डे पर किया।

अपनी व्योमिनी के साथ वह महिलाओं को मासिक के दौरान साफ़ सफाई पर बात करना सिखा रही हैं, वह कार्यशालाओं का आयोजन करती हैं और महिलाओं को साफ़ और सुरक्षित होना सिखाती हैं।

आँखों में आसमान लिए हम चले ही हैं,
वह अपना ही है, यह यकीन भी है।

URL: A woman who left the government job for relieving women Menstruation period suffering

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Sonali Misra

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सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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