भ्रामित मनुष्य

सारा कुमारी । मनुष्य को प्राणी वर्ग में सर्वश्रेष्ठ प्राणी का दर्जा दिया गया है, क्यूंकि ईश्वर ने व्यक्ति को सोचने समझने के लिए एक दिमाग़ भी दिया है, जिससे हम सही गलत का चुनाव कर सकते है, और यहीं खासियत हमें पशुओं से भिन्न बनाती हैं।

इश्वर ने हमें बाहरी दुनिया से गृहण करने के लिए 5 इंद्रियां दी है, परंतु गृहण करने के पश्चात उसको स्त्यापित करने के लिए एक मस्तिष्क भी दिया है, ताकी हम ग्राहय वस्तु का अवलोकन कर सके, और सही को लेकर, गलत को निष्कासित कर सके।

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परंतु सनातन शिक्षा से दूर होता ये समाज, चाहें हमारे देश में हो, या विश्व के किसी भी कोने में, भले ही वो ईसाई या मुस्लिम भी हो,  दिमागी रूप से इतना कमजोर हो गया,  ये अचानक नहीं हुआ, इसके लिए सदियों से पैशाचीक प्रवृत्ति के लोगों ने प्रयास किए, और मनुष्य को दिमागी तौर पर इतना कमज़ोर बना दिया की आज हम केवल देख कर किसी बात को सच मान लेते, उसका अवलोकन नहीं कर पाते हैं।

एक नकली दुनिया गढ़ी गई, दिखावे की दुनिया, जिसका सच्चाई से कोई वास्ता नहीं है, हमारी संवेदनाओं से खेलने के लिए बनाई गई, एक नकली दुनिया, परंतु ये हमारे मन पर गहरा असर डालने लगी है, हमारी सोच को पूरी तरह से बदल देती है। यानी एक पल पहले आप वहीं थे, परन्तु तस्वीर देखने के बाद, एक पल में ही आपके विचार बदल गए। अभी देश के लोग शरणार्थी के खिलाफ़ थे, परंतु तस्वीर देखते ही आपका मन पसीज गया, इनके प्रति दया का भाव उमड़ आता है, और आप उनके प्रति सहानभूति दिखाने लगते है।

क्या जीवों में सबसे समझदार प्राणी, को वाकई में इतनी आसानी से तस्वीरों के माध्यम से बहलाया जा सकता है। हालांकि ये प्रश्न आपसे किया जाएगा, तो आपका त्वरित उत्तर होगा, बिल्कुल नहीं, परंतु वास्तव में ये हो रहा हैl हमारे आस पास तो ये प्रतिदिन  हो रहा है। छोटे छोटे मात्र 30 सेकंड के advertisment दिखाए जाते है, और आप उस वस्तु को बाजार से लेने के लिए लालायित हो जाते हैं। ये भी नहीं सोचते, इस  चीज़ की हमें जरुरत है भी की नहीं, इसका मूल्य कितना हैं, मेरे स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा। मतलब हम उधार का दिमाग use कर रहे है, सामने वाले ने कहां ये अच्छा है, और हम खरीद लेते है। बड़े बड़े बुद्धिजीवी marketing के लोगों ने हमारी इसी कमजोरी को भांप लिया हैं, और कोई भी वस्तु निम्न स्तर का बना के, अच्छे optics के साथ पेश कर देते हैं, उनको पता है, हम केवल देखेंगे और ले लेंगे, बुद्धि का इस्तेमाल नहीं करेंगे।

अभी युक्रेन को भीषण युद्ध की विभीषिका में झोंकने वाला जेलेंसकी पहली बार सोवियत संघ के विघटन के बाद पूर्व और पश्चिम दोनो भागों से जीता है, ये भी मार्केटिंग का ही कमाल था, वरना वो वाकई में कितना अच्छा नेता हैं, ये आज हम सब देख ही रहे हैं। जो खाना स्वादिष्ट समझ कर युक्रेन के लोगों ने खा लिया, परंतु उसने विष का काम किया।

गांधी जी का दांडी मार्च, जिसकी तस्वीरों ने तो बहुत हंगामा मचाया परंतु आज़ादी में उसका प्रभाव देखने जाएंगे तो कुछ नहीं, अफ्रीका में मृत्यु के करीब एक कुपोषित बच्चे की तस्वीर तो सबको याद है, उस तस्वीर को लेने वाले फोटोग्राफर को बेस्ट अवार्ड भी मिला, परंतु उस बच्चे की जान की कीमत पर, अंततः उस फोटोग्राफर को अपने ऐसे निर्मोही कृत्य के लिए आत्महत्या करनी पड़ी।

चीन में तियामिन स्क्वेयर पर टैंक के आगे खड़े एक व्यक्ति की तस्वीर ने, चीन में आंदोलन शुरू हो गया।हालांकि वो मात्र एक तस्वीर थी, टैंक ने उसको कुचला नही था। ऐसे ही जब अमेरिका ने अपनी तेल की हवस के लिए, 2011 में अरब स्प्रिंग की शुरुवात की थी, तब यूरोप ने शरणार्थियों को  लेने से मना कर दिया था, तब भी समुद्र के किनारे मृत एक बच्चे की तस्वीर का उपयोग किया गया, जो खूब वायरल हुई, और यूरोप ने अपने दरवाजे और दिल दोनो ही शरणार्थियों के लिए खोल कर रख दिया। हालांकि आज उसके दुष्परिणाम भी यूरोप में देखने को मिल रहा है, क्राइम ग्राफ बहुत बढ़ चुका है। वहां के मूल निवासी के लिए जीवन कठिन हो गया है।
ये सभी दृश्य लोगों ने अपनी आंख से नहीं देखे, मिडिया के माध्यम से देखे, परंतु विश्व के परिदृश्य को बदलने में इनकी अहम भूमिका रही हैं। तो आप सभी का स्वागत है

into world of optics

यहां जो दिखता है, होता नही है और जो होता हैं वो दिखता नहीं है। भारत में ये खेल सबसे ज्यादा खेला जाता है, यहां 20 से अधिक पार्टियां हैं, भले ही हिंदू की स्तिथि 1947 से अब तक साल दरसाल ख़राब ही हुई है, परंतु चुनाव के समय ये सभी पार्टी के नेता , त्रिपुण्ड लगा कर, मंदिरों में आरती करते नजर आएंगे। और भोली भाली हिंदू जनता भ्रमित हो जाती हैं, कभी कांग्रेस के पिछे भाग रही हैं, कभी लालू, कभी मुलायम और अभी बीजेपी का नशा चढ़ा है। परन्तु नतीजा वही ढाक के तीन पात।केवल हिंदुओं का शोषण हो रहा हैं, भलाई कुछ नहीं हो रही।

क्या सबसे ज्यादा ज्ञान परम्परा वाला, सबसे ज्यादा शिक्षा साहित्य वाला हिंदू समाज अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करना छोड़ चुका है ??क्यों हमारी स्थिति इतनी दयनीय बन चुकी हैं,? क्यूं विश्व में इकलौता देश है, जहां बहुसंख्यक अपने लिए बराबरी के अधिकार मांगने को विवश हैं ?  क्यों हम अपने देश की इंच इंच भूमि खोते जा रहे है ? क्यों हमारी युवा पीढी विदेशों में भाग रही हैं? ऐसे अनगिनत सवाल है, जिसके जवाब हमे अपने अंदर ही खोजने हैं, illusion की दुनिया से बाहर निकल कर, हकीकत की कसौटी पर अपने वर्तमान और आने वाले भविस्य को परखना है। तभी हम अपने समाज को बचा सकते है।

जय हिन्द जय भारत 

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