एक महिला को टीवी स्टूडियो में मौलाना पीटे तो ‘सेक्यूलर खामोशी’ और अग्निवेश पिटाए तो हिंदू गुंडे? सलेक्टिव आउटरेज अब बर्दाश्त नहीं!

अग्निवेश की पिटाई से कल शेखर गुप्ता बड़े दुखी थी। लगातार ट्वीट पर ट्वीट किए जा रहे थे। अग्निवेश की पिटाई उन्हें ‘शॉकिंग’ और ‘सेमफुल’ लग रही थी। उन्होंने अग्निवेश की याद में बहाए आंसू वाले अपने ट्वीट को पिन कर रखा है। वहीं, कल ही ‘जी हिंदुस्तान’ के स्टूडियो में ऑल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मुफ्ती एजाज अरशद कासमी नामक एक मौलाना ने तीन तलाक की मुख्य याचिकाकर्ता फराह फैज की पिटाई कर दी, लेकिन शेखर गुप्ता ने इसे लेकर मुंह में रसगुल्ला रख लिया और हाथ को कमर के पीछे बांध लिया! उनका एक भी ट्वीट इस घटना पर नहीं आया।

ऐसा ही हाल राजदीप सरदेसाई का है। राजदीप ने मौलाना द्वारा महिला की पिटाई का वीडियो तो शेयर किया, उसे शर्मनाक भी बताया, लेकिन अगले ही ट्वीट में ऑलइंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड का बचाव करते और हिंदुओं को कोसते भी दिखे। उन्होंने पर्सनल बोर्ड के सदस्य को सेल्फ स्टाइल मौलवी कह कर, पर्सनल बोर्ड के कट्टरपंथी सोच को ढंकने का प्रयास किया। साथ ही अपने उस ट्वीट में उसकी तुलना हिंदू चरमंथी से कर दी और इसे हिंदू-मुसलमान का मुद्दा बता डाला।

राजदीप ने इस पूरी घटना की निंदा करने की जगह इसे नौटंकी बता कर इसे हल्का करने का प्रयास किया। तीन तलाक, हलाला जैसी कुरीतियों में जकड़ी मुसलिम महिलाओं के विरोध और कट्टरपंथी मुल्ले-मौलवियों को बचाने का प्रयास राजदीप के ट्वीट में साफ-साफ झलकता है।

आपको याद होगा फ्रांस के एक अखबार शेब्लोहार्दो में आतंकवादी धड़धड़ाते घुसते चले गये थे और नौ पत्रकारों को गोलियों से भून दिया था। भारत की पत्रकारिता में बैठे मौलानाओं (एंकर पत्रकार) ने यह तक कह दिया था कि किसी मजहब पर कटाक्ष कर उसे उकसाना नहीं चाहिए। एनडीटीवी के रवीश ने तो साफ-साफ उस हत्या को जस्टिफाई करने का प्रयास किया था। लेकिन आज जब अग्निवेश हिंदुओं को खुलेआम गाली-गलौच देता है तो पत्रकारिता के वेश में बैठे ये सेल्फ स्टाइल्ड मौलाना हिंदुओं को ही गाली देते हैं। दरअसल हिंदुओं के प्रति इनके अंदर इस कदर नफरत भरी है कि ये हमेशा उसे गाली देने और गाली देने वालों के समर्थन में जुटे रहते हैं। हिंदुओं से नफरत के कारण से मुसलिम और ईसाई समाज की कट्टरपंथी जमात को खुलकर प्रश्रय देते हैं, जिस कारण उस समाज की बुराई के पक्ष में भी ये खड़े हो जाते हैं।

अग्निवेश कोई स्वामी नहीं है, बल्कि वह मिशनरीज का एजेंट और माओवादी है। भले ही वह भगवा चोला पहने, पगड़ी लगाए, खुद को आर्यसमाजी कहे, लेकिन उसका पूरा कर्म भारत और हिंदू धर्म के खिलाफ है। आर्यसमाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती से लेकर श्रद्धानंद तक ने कन्वर्जन का विरोध किया था। श्रद्धानंदजी की हत्त्या तो शुद्धिकरण अभियान के कारण एक मुसलमान ने ही की थी। आरोप है कि अग्निवेश आदिवासियों के कन्वर्जन मंे ईसाई मिशनरीज की मदद करता है। फिर यह किस तरह से आर्यसमाजी हुआ? यह भारत की प्राचीनता, उसके स्वर्णिम इतिहास का हमेशा मजाक बनाता है। नीचे के वीडियो में देखिए कि यह किस तरह देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और हिंदू धर्म का मजाक बना रहा है?

झारखंड के पाकुड़ में जिन लोगों ने अग्निवेश की पिटाई की उनका आरोप भी यही है कि अग्निवेश ईसाई मिशनरीज के इशारे पर आदिवासी समाज को भड़काने आया था। इसका खुलासा इससे भी होता है कि जिले के पुलिस अधीक्षक शैलेंद्र प्रसाद बर्नवाल ने अपने बयान में कहा कि ‘जिले में अग्निवेश के कार्यक्रम को लेकर उनके पास पहले से कोई जानकारी नहीं थी।’ याद रखिए कन्वर्जन का काम हमेशा चोरी-छिपे ही चलता है। तो फिर क्या कारण था कि अग्निवेश या उसके आयोजकों ने अपने कार्यक्रम की सूचना जिला प्रशासन को नहीं दी थी? कहीं वह सीधे-सीधे कन्वर्जन कराने का काम तो नहीं कर रहे हैं? अग्निवेश हमेशा जंगलों में बैठे माओवादियों के संपर्क में रहे हैं। आखिर यह कैसे संभव है कि अन्य भगवाधारियों को तो माओवादी दुश्मन समझते हैं और अग्निवेश उनके लिए सगा है? यह सर्वविदित है कि माओवादियों के साये में मिशनरियां कन्वर्जन का धंधा चलाती हैं और इसके एवज में माओवादियों को फंड से लेकर बंदूक तक मुहैया कराती हैं।

आज अग्निवेश पिटाई पर रोने और अरशद काजमी द्वारा फराह फैज की पिटाई पर सेक्यूलर खामोशी अख्तियार करने वाले का पाखंड खुलकर सामने आ गया है। वामपंथी-इस्लामपंथी विचारधारा वाले ये पत्रकार इस पर खामोश हैं कि अग्निवेश बिना पूर्व सूचना दिए आदिवासियों के इलाके में गुपचुप तरीके से क्यों जाते हैं? दरअसल अंग्रेजी मीडिया, इलेक्ट्रोनिक न्यूज चैनल और एनजीओ में बैठे ये लोग न तो पत्रकार हैं और न एक्टिविस्ट, बल्कि ये सभी शहरी नक्सल हैं, जो हर हाल में हिंदुस्तान को तोड़ने के प्रयास में जुटे हैं।

‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ के हर सदस्य के पक्ष में सामूहिक आर्तनाद करना इनकी रणनीति का हिस्सा है। चूंकि इन सभी का फंडकर्ता समान है, इसलिए ये सभी एक-दूसरे को अपने-अपने माध्यम से मदद पहुंचाते हैं। यही कारण है कि रांची में मदर टेरेसा के संस्थान से लगातार बच्चा बेचे जाने की इतनी बड़ी खबर केवल हिंदी अखबारों और सोशल मीडिया का मुद्दा बन कर रह गयी। अंग्रेजी अखबार और न्यूज चैनलों में इस पर बहस नहीं दिखी? आपको याद होगा कि अंग्रेजी आउटलुक ने आरएसएस के खिलाफ बच्चा बेचे जाने की झूठी खबर प्रकाशित की थी और सारे अंग्रेजी पत्रकारों ने इस पर खूब हो-हल्ला मचाया था। जब एक स्वयंसेवक ने इसे लेकर आउटलुक पर मानहानि का मुकदमा कर दिया तो भी सारे अंग्रेजी पत्रकार ‘अभिव्यक्ति का गला घोंटा जा रहा है’- का नारा बुलंद करते हुए शोर मचाने लगे थे। बाद में पता चला वह पूरी खबर ही फर्जी है और फिर आउटलुक के संपादक को इस्तीफा देना पड़ा था। उस संपादक के इस्तीफा पर भी खूब शोर मचाया गया कि भाजपा की सरकार फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन को दबा रही है, लेकिन इनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि आखिर वो संपादक अपनी खबर के पक्ष में कोई सबूत क्यों पेश नहीं कर पा रहे थे?

देख लीजिए महिला को पीटने वाले उस कट्टरपंथी मौलाना के पक्ष में किस तरह से कम्युनिस्ट पार्टी उतर आयी है-

आप सोच कर देखिए, मदर टेरेसा के एनजीओ से इतने बच्चे चोरी होने के सबूत मिल चुके हैं, लेकिन कहीं कोई हो-हल्ला इन मिशनरीज के पालतू पत्रकारों ने मचाया? दरअसल ये सब गांधी परिवार के पालतू हैं और भारत में अरब और वेटिकन नेटवर्क का सबसे बड़ा सिरा गांधी परिवार से ही जुड़ता है। स्वाभाविक है गांधी परिवार इनका माई-बाप है। तो जागिए, और इनके सलेक्टिव आउटरेज के खिलाफ सोशल मीडिया पर जमकर अपना गुस्सा निकालिए, इन्हें आईना दिखाइए और इन्हें तथ्यगत रूप से नंगा कीजिए। यही रास्ता है, भारत और हिंदू समाज को बचाने का।

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