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गो-वध बंदी आंदोलन: आदि से आज तक- न रुका है, न रुकेगा!

रामबहादुर राय। गोरक्षा का सवाल सैकड़ों साल पुराना है। इसका संबंध भारत की सभ्यता से है। हमारी सभ्यता में गाय और गोवंश का स्थान बहुत ऊंचा है। जब कभी इस भावना को चोट पहुंची तो विरोध हुआ। आंदोलन हुए। गोरक्षा के लिए बलिदान और अपने जान की बाजी लगा देने वालों की कभी कमी नहीं रही। इस बारे में बहुत कुछ इतिहास के पन्नों में बिखरा हुआ है। गांधी धारा के विचारक और इतिहासकार धर्मपाल ने इस बारे में अध्ययन कर कुछ ऐसे तथ्य खोजे जो अज्ञात थे।

उन्होंने लिखा कि गाय की पवित्रता का वर्णन ‘प्राचीन ऋ षियों के काव्यों, वेदादि से लेकर उत्तरवर्ती साहित्य और लोकगीतों में भी मिल जाता है।’ उन्होंने ही यह पहली बार बताया कि 1860 से ब्रिटिश बौद्धिकों ने हमारे अंग्रेजी पढ़े-लिखे समाज को बताना शुरू किया कि वेदों में वर्णन है कि विशेष अवसरों पर गोमांस का सेवन होता था। वे हमारे मन में गाय की महत्ता को कम करने का प्रयास कर रहे थे। लेकिन उसका भारतीय मानस पर खास प्रभाव नहीं पड़ा। अंग्रेजी शासन में गोमांस के लिए ज्यादा कत्लखाने खुले। गायों की हत्या बढ़ी। गाय की दुर्दशा होती गई। इसके बावजूद भारतीयों के लिए गाय पवित्र और पूज्यनीय बनी हुई है।

धर्मपाल ने इस धारणा की भी बारीकी से छानबीन की है कि गो-वध की शुरुआत भारत में इस्लाम विजय के साथ हुई। उसके कारणों को उन्होंने स्पष्ट किया। यह बताया कि ‘इस्लामी परंपराओं में बलि चढ़ाने में भेंड़, बकरा और जहां भोज में सात से ज्यादा लोग शामिल होते थे, तो ऊंट की बलि चढ़ाई जाती थी। गाय की बलि का तो प्रश्न ही नहीं उठता था, क्योंकि जहां इस्लाम फला-फूला वहां ज्यादा गोवंश नहीं था।’

उन्होंने लिखा है कि जब भारतीयों और इस्लामी विजताओं में विद्वेष बढ़ा तब अपमानित करने के ख्याल से कई बार बड़ी संख्या में गोहत्या कराई गई। लेकिन विरोध होने पर इस्लामी राजाओं ने अपने शासन क्षेत्र में गोवध पर प्रतिबंध भी लगाए। ‘इस्लामी प्रभुता के दौर में सालाना गो-हत्याओं का आंकड़ा अधिकतम बीस हजार ठहरता है।’ गो-वध पर अज्ञान का आलम यह है कि शासन और न्याय के ऊंचे पदों पर बैठे लोग भी वास्तविकताओं से अपरिचित हैं। वे इस झंझट में पड़ना नहीं चाहते। इतिहास की हकीकत को जानने का वे प्रयास नहीं करते। यही हाल उनका भी है जो गो-वध बंदी की मांग करते हैं।

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अब यह तथ्य सामने आ गया है कि 1750 से अंग्रेजों ने गो-वध कराना शुरू किया। अंग्रेज अपने आहार के लिए गोमांस का उपयोग करते थे। जैसे-जैसे यह जानकारी लोगों तक पहुंची तो उसका विरोध होने लगा। यह भी सही है कि गोहत्या के विरोध में उस समय जो आंदोलन हुए उसे इतिहासकारों ने ज्यादा महत्व नहीं दिया। उसका उल्लेख चलते-फिरते ढंग से किया गया है। 1750 से 1830 तक गो-हत्या से भारतीय दुखी हुए, पर वे भयभीत और लाचार भी थे। जो विस्फोट 1857 में हुआ, उसमें गोहत्या भी एक बड़ा कारण था।

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सैकड़ों साल पुराने गो-वध बंदी आंदोलन को कोई सरकार दबा नहीं सकती। यह आंदोलन अपनी राख से फिर फिर जिंदा हो जाने के उदाहरण पेश करता रहा है। भले ही इस समय कोई संगठित आंदोलन न हो रहा हो और कोई बड़े नामी संत उसका नेतृत्व न कर रहे हों फिर भी इस आंदोलन की चिंगारी को कम करके नहीं आंका जा सकता। यह आंदोलन अपनी मंजिल पर ही जाकर रुकेगा। वह है- पूर्ण गो-वध बंदी।

1857 में अंग्रेज जीते। सेना में अंग्रेजों की संख्या पहले से दो-तीन गुनी ज्यादा हो गई। 1858 में एक लाख से भी अधिक अंग्रेज सेना में हो गए। नए अंग्रेज सैनिक ज्यादातर उत्तर भारत में विभिन्न स्थानों पर नियुक्त किए गए। गोवध में भी अन्य जगहों के मुकाबले इन जगहों पर ज्यादा वृद्धि हुई। दैनिक गोवध के कारण भारतीय कृषि और ग्रामीण जीवन अधिक प्रभावित होने लगा। इसका परिणाम पंजाब के कूका विद्रोह (नामधारी सिख) के रूप में प्रकट हुआ।

नामधारी पंथ के लोगों ने गोरक्षा के लिए 1860 के आस-पास ही हथियार उठा लिए। वह विद्रोह दस साल चला। जो धीरे-धीरे देशव्यापी हुआ। भारत के हर हिस्से में बढ़ती गोहत्या से जो विद्रोह की भावना भड़की उसका नेतृत्व संन्यासियों ने किया। दक्षिण भारत के संन्यासी श्रीमन स्वामी और दयानंद सरस्वती का नेतृत्व पाकर समाज खड़ा हो गया। गोरक्षणी सभाएं बनीं। ये सभाएं उत्तर भारत में हर जगह थी। गोरक्षा के लिए साधु-संत देशभर में अलख जगाते रहे। जिनका नाम इतिहास के पन्नों में अमर रहेगा- ऐसे संत अलाराम, गोपालानंद स्वामी, स्वामी भाष्करानंद, स्वामी ब्रह्मानंद और खाकी बाबा हैं। इस तरह के जनजागरण से गोरक्षा का जो आंदोलन खड़ा हुआ, वह 1880 से 1894 तक पूरे देश में चला।

आंदोलन को एक दिशा देने के लिए स्वामी दयानंद सरस्वती ने एक लाख हस्ताक्षरों वाला एक ज्ञापन महारानी विक्टोरिया, ब्रिटिश संसद और वायसराय को देने की घोषणा की। उसे छपवाया। उसमें गोरक्षा के तर्क थे और मांग थी कि गोवंश का वध बंद हो। एक अनुमान है कि कई लाख हस्ताक्षर एकत्र हुए। जिसमें चालीस हजार हस्ताक्षर मेवाड़ से थे और साठ हजार पटियाला से। जब आंदोलन तेज हुआ तो महारानी विक्टोरिया ने वायसराय को पत्र लिखा। उसमें उन्होंने माना कि ‘गोरक्षा का यह आंदोलन वास्तव में हमारे खिलाफ है क्योंकि अपने सैनिकों के लिए हम अधिक गोवध करते हैं।’

उस आंदोलन में कांग्रेस के नेता पंडित मदन मोहन मालवीय भी शामिल हुए। उनके जगह-जगह व्याख्यान हुए। उनके सहयोगी लाला रामचरण दास और कालाकांकर के राजा रामपाल सिंह भी गोरक्षा सभाओं की अध्यक्षता करते थे। उस आंदोलन के महत्वपूर्ण ब्रिटिश दस्तावेज और रिपोर्ट का इतिहासकार धर्मपाल ने अध्ययन कर एक पुस्तक बनाई। पुस्तक है- ‘गौवध और अंग्रेज।’

अगर इस पर गहरी खोजबीन हो और अध्ययन विधिवत हो तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि अंग्रेजी राज में अस्सी साल से ज्यादा लंबा आंदोलन गोरक्षा के लिए चला है। वही आजादी के आंदोलन की प्रेरणा बनी। तभी तो महात्मा गांधी यह कहते हैं कि ‘गाय की पवित्रता हिन्दू धर्म का केंद्र बिंदु है।’ उन्होंने यह भी कहा कि ‘गाय की रक्षा के लिए मैं किसी मनुष्य को नहीं मारुंगा, इसी प्रकार किसी भी मनुष्य के जीवन की रक्षा के लिए, चाहे वह कितना भी महत्वपूर्ण हो, मैं गाय को नहीं मारुंगा।’ गांधीजी की प्रेरणा से ही 1928 में साबरमती आश्रम में गोसेवा संघ गठित किया गया। इसके लक्ष्य की घोषणा में कहा गया- ‘क्योंकि हिन्दू अपने धर्म के निर्देशानुसार गोरक्षा का कर्तव्य पालन करने में विफल रहे हैं, भारत में गोवंश का दिन पर दिन ह्रास तथा क्षय हो रहा है, अत: उस धर्म कर्तव्य के पालन के लिए गो-सेवा संघ गठित किया जाता है। संघ का लक्ष्य होगा-सभी नैतिक उपायों द्वारा गोवंश का रक्षण।’

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1946 में अंतरिम सरकार बनने पर गोवध बंदी की मांग की गई। नेहरू सरकार पर दबाव बढ़ा। खाद्य मंत्री डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने सर दातार सिंह की अध्यक्षता में गोरक्षण और गो पालन विशेषज्ञ समिति बनाई। उसकी रिपोर्ट को ध्यान में रखकर संविधान सभा ने गोवध निषेध के लिए नीति-निर्देशक तत्व में व्यवस्था दी। जो संविधान की धारा 48वां है।

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स्वाधीन भारत में विनोबाजी ने पूर्ण गोवध बंदी की मांग रखी। उसके लिए कानून बनाने का आग्रह नेहरू से किया। वे अपनी पदयात्रा में यह सवाल उठाते रहे। कुछ राज्यों ने गोवध बंदी के कानून बनाए। इसी बीच हिन्दू महासभा के अध्यक्ष निर्मल चंद्र चटर्जी (लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी के पिता) ने एक विधेयक 1955 में प्रस्तुत किया। उस पर जवाहरलाल नेहरू ने लोकसभा में घोषणा की कि ‘मैं गोवध बंदी के विरुद्ध हूं। सदन इस विधेयक को रद्द कर दे। राज्य सरकारों से मेरा अनुरोध है कि ऐसे विधेयक पर न तो विचार करें और न कोई कार्यवाही।’ लेकिन 1956 में कसाईयों ने उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उस पर 1960 में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। धीरे-धीरे समय निकलता जा रहा था। लोगों को लगा कि अपनी सरकार अंग्रेजों की राह पर है। वह आश्वासन देती है, लेकिन आचरण उसका गोवध के नाश का होता है।

इससे ही गोरक्षा का प्रश्न पिछली सदी के छठे दशक में राष्ट्रीय सवाल बन गया। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्रीजी और देश के तमाम संतों ने इसे आंदोलन का रूप दिया। गोरक्षा का अभियान शुरू हुआ। वह अभियान जैसे-जैसे बढ़ा उसके महत्व को राजनीतिक नेताओं ने समझा। सबसे पहले लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को पत्र लिखा। वह 21 सितंबर, 1966 का है। उन्होंने लिखा कि ‘गो-वध बंदी के लिए लंबे समय से चल रहे आंदोलन के बारे में आप जानतीं ही हैं। संसद के पिछले सत्र में भी यह मुद्दा सामने आया था।— और जहां तक मेरा सवाल है मैं यह समझ नहीं पाता कि भारत जैसे एक हिन्दू-बहुल देश में, जहां गलत हो या सही, गोवध के विरुद्ध ऐसा तीव्र जन-संवेग है, गोवध पर कानूनन प्रतिबंध क्यों नहीं लगाया जा सकता।’

इंदिरा गांधी ने जे.पी. की सलाह नहीं मानी। परिणाम हुआ कि सर्वदलीय गोरक्षा महा अभियान ने दिल्ली में विराट प्रदर्शन किया। दिल्ली के इतिहास का वह सबसे बड़ा प्रदर्शन था। गोरक्षा के लिए तब प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, पुरी के शंकराचार्य निरंजन देव तीर्थ ने गोरक्षा के लिए प्रदर्शनकारियों पर पुलिस जुल्म के विरोध में और गो-वध बंदी की मांग के लिए 20 नवंबर, 1966 को अनशन प्रारंभ कर दिया। वे गिरफ्तार किए गए। प्रभुदत्त ब्रह्मचारी का अनशन 30 जनवरी, 1967 तक चला। 73वें दिन डॉ. राममनोहर लोहिया ने अनशन तुड़वाया। अगले दिन पुरी के शंकराचार्य ने भी अनशन तोड़ा। उसी समय जैन संत मुनि सुशील कुमार ने भी लंबा अनशन किया था। ऐसे संकल्प तो संत अपनी सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए ही करते हैं।

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ऐसा नहीं है कि गोरक्षा का प्रश्न उस आंदोलन के बाद बंद हो गया। वह दस साल बाद फिर शुरू हुआ। उसे संत विनोबा ने उठाया। 12 अप्रैल, 1978 को डॉ. रामजी सिंह ने एक निजी विधेयक रखा। जिसमें संविधान की धारा 48 के निर्देश पर अमल के लिए कानून बनाने की मांग थी। 21 अप्रैल, 1979 को विनोबा ने अनशन शुरू कर दिया। पांच दिन बाद प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने कानून बनाने का आश्वासन दिया और विनोबा ने उपवास तोड़ा। 10 मई, 1979 को एक संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया। जो लोकसभा के विघटित होने के कारण अपने आप समाप्त हो गया। इंदिरा गांधी के दोबारा शासन में आने के बाद 1981 में पवनार में गोसेवा सम्मेलन हुआ। उसके निर्णयानुसार 30 जनवरी, 1982 के सुबह विनोबा ने उपवास रखकर गोरक्षा के लिए सौम्य सत्याग्रह की शुरुआत की। वह सत्याग्रह 18 साल तक चलता रहा।

गोवध बंदी आंदोलन और सत्याग्रहों का ही प्रभाव था कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने धर्मपाल की अध्यक्षता में गो-पशु आयोग बनाया। धर्मपाल ने जल्दी ही आयोग की सीमाएं पहचान लीं। वे समझ गए कि मसले को टालने के लिए आयोग बनाया गया है। सरकार गोवंश की रक्षा के प्रति ईमानदार नहीं थी। उन्होंने यह अनुभव करते ही आयोग से इस्तीफा दे दिया। धर्मपाल मानते थे और यही सच भी है कि गोवध पर पूरा प्रतिबंध लगना चाहिए। इसके लिए कानून हो। नेहरू के जमाने में सुप्रीम कोर्ट से थोड़ी अड़चन थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री को इसका बहाना भी मिल जाता था।

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इस समय वह अड़चन सुप्रीम कोर्ट ने खुद दूर कर दी है। गुजरात में गोवध बंदी पर पूरी रोक नरेन्द्र मोदी की सरकार ने लगाई। जिस पर गुजरात हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पूरी रोक नहीं लगाई जा सकती। 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार के कानून को सही ठहराया। अगर गुजरात में पूरी रोक लगाई जा सकती है तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी केंद्रीय कानून बनाकर पूरे देश में उसे लागू क्यों नहीं कर सकते?

अगर मोदी सरकार ऐसा निर्णय करती है तो खेती, पशुपालन और गांव की पुनर्रचना का वह सपना साकार हो सकता है, जिसका संबंध स्वराज्य और राज्य व्यवस्था की पुनर्रचना से है।

साभार: यथावत

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