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वंचित बच्चों की मदद के लिए कैलाश सत्यार्थी करेंगे 10 करोड़ युवाओं को तैयार!

अनिल पांडेय। दुनिया में आज भी करीब 16.8 करोड़ बच्चे बाल मजदूरी के लिए अभिशप्त हैं। यह संख्या दुनिया की 5 से 17 वर्ष तक की उम्र की 10 प्रतिशत आबादी के बराबर है। इनमें से करीब 5.5 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जो गुलामी का जीवन जी रहे हैं। 21वीं सदी में, जब दुनिया ने इतना विकास कर लिया है कि वह चांद पर घर बसाने का सपना देख रहा है, ऐसे में यह सुनना कि आज भी बच्चों को गुलाम बनाकर उनसे काम कराया जाता है, हमारे विकास के मॉडल की हकीकत बयां करता है।

बच्चों के बद्तर हालात के आकंडों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। आकड़ों की नजर में बच्चों की दुनिया की हालत बहुत खराब है। दुनिया में जितने बच्चे बाल मजदूरी कर रहे हैं उनमें से आधे से ज्यादा लगभग 7.5 करोड़ खतरनाक कार्यों में लगे हुए हैं। मजदूरी के मुश्किल भरे हालात से जूझने के साथ ही करोड़ों बच्चे लगातार अपना बचपन गवां रहे हैं। सीरिया में तो पूरी एक पीढ़ी ही अपने अधिकारों से वंचित है। युद्दग्रस्त इलाकों के तकरीबन 56 लाख बच्चे भयावह हालात में जी रहे हैं और गरीबी, विस्थापन व हिंसा का सामना कर रहे हैं। ऐसे बच्चों की संख्या भी बहुत ज्यादा है, जो शिक्षा के अधिकार से वंचित हो रहे हैं।

भारत की हालत यह है कि यहां के 6 से 14 साल तक के 4.27 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं। यानी हर पांचवा बच्चा स्कूल से बाहर है। 18 साल से कम उम्र के देश में 8.4 करोड़ ऐसे बच्चे और किशोर हैं जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा है। जब कि पढ़ाई बच्चों का मौलिक अधिकार है। भारत में शिक्षा का अधिकार कानून सभी बच्चों को स्कूल में पढ़ाई की गारंटी देता है। बच्चों को देश का भविष्य कहा जाता है।

बाल दिवस समारोहों में नेता जी की मौजूदगी में यह गीत भी खूब बजता है, ‘इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के…. नेता तुम्ही हो कल के…।’ लेकिन हकीकत इसके उलट है। जिसे देश का भविष्य बताया जा रहा है उसकी शिक्षा और स्वास्थ्य पर बजट का मामूली हिस्सा ही खर्च किया जाता है। भारत की आबादी में बच्चों (18 साल से कम उम्र के लोग) की हिस्सेदारी 36 फीसदी है, लेकिन उनके लिए बजट का तकरीबन 4 फीसदी हिस्सा ही आवंटित किया जाता है। यह हाल पूरी दुनिया का है। बच्चे उनकी प्राथमिकता में नहीं हैं। अगर ऐसा न होता तो हथियारों पर खर्च करने की बजाए शिक्षा पर कहीं ज्यादा खर्च किया जाता। आप जानकर हैरान होंगे कि दुनिया सेना पर 1.6 खरब डालर खर्च करती है, जबकि शिक्षा पर 1.3 खरब डालर ही खर्च होता है। जबकि शिक्षा ही बच्चों की सबसे बड़ी सुरक्षा है। पढ़ने लिखने से ही किसी बच्चे का भविष्य सुरक्षित होता है।

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पिछले दो दशकों में बच्चों के अधिकारों के लिए तमाम कानून बने हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने कई चार्टर पारित किए। लाखों जन संगठन बाल मजदूरी को खत्म कर बच्चों को शिक्षित करने लिए प्रयासरत हैं, इसके बावजूद बाल मजदूरी का कलंक दुनिया के माथे से मिटने का नाम नहीं ले रहा है। दरअसल, इसकी एक बड़ी वजह बच्चों के प्रति समाज का संवेदनशील न होना है। बच्चों के भी कुछ अधिकार हैं जिसे उन्हें मिलना चाहिए, इस सोच का व्यापक अभाव है। लोगों को लगता है कि गरीब के बच्चे काम नहीं करेंगे तो खाएंगे क्या। बच्चों का बचपन खुशहाल हो। उन्हें खेल और पढ़ाई का अधिकार मिले, इसके लिए अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है। बच्चे न तो सरकार की प्राथमिकता में हैं और न ही समाज के। विकास की योजनाओं से बच्चे कोसों दूर हैं। बच्चों की खुशहाली के लिए हमें बचपन केंद्रित विकास की अवधारणा और संस्कृति को जन्म देना होगा। तो वहीं बच्चों के बारे में लोगों के माइंडसेट बदलने की भी जरूरत है।

इसी कड़ी में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी भारत की धरती से एक अनोखी और ऐतिहासिक पहल करने जा रहे हैं। वे दुनिया के प्रभावी और सामाजिक प्रतिष्ठा वाले नेताओं को बच्चों के अधिकारों के लिए सशक्त आवाज उठाने के लिए एक जुट करने की कोशिश कर रहे हैं। 10-11 दिसंबर, 2016 को राष्ट्रपति भवन में ‘लॉरिएट्स एंड लीडर फॉर चिल्ड्रेंन समिट’ का आयोजन कर श्री कैलाश सत्यार्थी बच्चों के हित में दुनियाभर के नोबेल पुरस्कार विजेताओं और विश्व के प्रमुख नेताओं का एक नैतिक मंच तैयार करने जा रहे हैं। भारत की धरती से बच्चों के लिए आवाज उठेगी, यह देश के लिए गर्व की भी बात है। इस अवसर पर वे बाल मजदूरी, बाल दासता, बाल दुर्व्यापार और बाल यौन शोषण के खिलाफ दुनिया के सबसे बड़े आंदोलन ‘हंड्रेड मिलियन फॉर हंड्रेड मिलियन कैंपेन’ की भी शुरुआत करने जा रहे हैं। #WillForChildren

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इस अभियान का उद्देश्य 10 करोड़ वंचित बच्चों की मदद के लिए 10 करोड़ युवाओं को तैयार करना है। विभिन्न कार्यक्रमों और सोशल मीडिया के जरिए इन युवाओं में समाज में बदलाव लाने का जज्बा पैदा किया जाएगा। श्री कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि बच्चों के खिलाफ हिंसा को रोकने के लिए लोगों के दिलों में ‘करुणा’ का भाव पैदा करना होगा। जब भूमंडलीकरण के इस युग में ‘बाजार का वैश्वीकरण’ हो रहा है तो सत्यार्थी जी भारत की धरती से ‘करुणा के वैश्वीकरण’ की पहल कर रहे हैं। पश्चिम ने बाजारवाद दिया, जिसकी वजह से आज दुनिया अशांति और हिंसा की चपेट में है। इस अशांति और हिंसा के सबसे ज्यादा शिकार बच्चे ही हैं। बाजार भी बाल श्रम और वेश्यावृत्ति के रूप में बच्चों का जम कर शोषण कर रहा है। वसुधैव कुटुम्बकम का दर्शन देने वाला भारत अहिंसा और प्रेम के लिए ही जाना जाता है। उम्मीद है कैलाश सत्यार्थी जी की इस पहल से पूरब से उठने वाली ‘करुणा की बयार’ दुनिया में शांति और अमन लाने के साथ-साथ बच्चों को खुशहाल बचपन देने में जरूर मददगार साबित होगी।

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