विदेशी महिलाओं को लुभा रही है साड़ी, और भारतीय लड़कियां पहन रही हैं फटी जींस! संस्कृति का यह अनुलोम-विलोम आखिर क्या संकेत दे रहा है?

स्वामी विवेकानन्द पहली बार शिकागो यात्रा पर गए! बस स्टॉप पर बस का इंतज़ार कर रहे थे। उन्होंने भगवा धोती कुर्ता और सिर पर भगवा पगड़ी बाँध रखी थी तो एक सूट बूट पहने अमरीकी ने उनको देख कर प्रश्न पुछा तुमने ये कैसे परिधान पहने हैं? ये कैसा पहनावा हैं? मेरे कपड़े देखो कितने शानदार हैं? और ये कहते हुए अपने टेलर की तारीफ़ करने लगा। इस पर स्वामी विवेकानंद मौन रहे और बोले “मेरी पहचान मेरे कपड़ो या उसके टेलर से नहीं बल्कि मेरी पहचान मेरे देश की संस्कृति से हैं।” तो एक बार ठहरकर सोचिये की आप स्टाइल के नाम पर कटे फटे और अंगप्रदर्शित करने वाले कपड़े पहनकर सभ्य बन रहे हैं या फिर अपनी फूहड़ता का परिचय दे रहे हैं?

आपकी पहचान आपकी फूहड़ता है, या फिर आपकी पहचान आपकी भारतीयता है? आप आधुनिक हैं, या फिर अंधानुकरण करने वाले नकलची? आधुनिकता सोच में होनी चाहिए, नग्नता में नहीं! यदि नग्नता में आधुनिकत होती तो सड़क पर आवारा घूम रहा श्वान, आपसे कहीं अधिक आधुनिक माना जाना चाहिए, है न? अरे भाई! आखिर उसने तो उतना भी कपड़ा नहीं, पहना जितना आप पहनकर अंग प्रदर्शन कर रहे हैं? तो आपकी सोच कि हिसाब से ज्यादा आधुनिक आप हुए या ‘स्ट्रीट डॉग?’ सोचिए! सोचना जरूरी है!

संस्कृति और परिधान का ताल-मेल बहुत पुराना है

संस्कृति और परिधान का ताल-मेल बहुत पुराना है किसी भी देश की संस्कृति को जानना हो तो वहां के दैनिक जीवन के तौर-तरीके और वेशभूषा को देखकर वहां की सभ्यता और संस्कारों का पता काफी हद तक लगाया जा सकता है। मुख्य रूप से भारतीय परम्परा और संस्कृति इस मामले में सर्वोत्तम रही है फिर वो कहे कोई भी काल क्यों न हो? लेकिन आज के परिवेश में संस्कृति की धज्जियाँ उड़ाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी जाती। विशेष रूप से विदेशी वेशभूषा का नितांत बिगड़ा स्वरुप जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में भारत को अपने रंग में रंगता जा रहा है, उससे होने वाली भारत की संस्कृति के ह्रास को देख कर मन दुखी हो जाता है।

फैशन या फूहड़ता?
ईश्वरत्व, अध्यात्म और मोक्ष की ओर ले जाने वाली देव भूमि पर आज अंग्रेजियत के एक अदद शब्द ‘फैशन’ ने किस तरह फन फैलाये नाग की तरह कुंडली मार ली है कि उसके सामने केवल फूहड़ता शब्द ही कहना उचित है। पाश्चात्य कपड़े पूरी तरह से नकारने योग्य है कहना, रूढ़िवादिता होगी क्यूंकि आज की युग में तेज़ी से दौड़ते हुए टेक्नोलॉजी के कई कार्य -व्यापार है। जिनमें वेस्ट्रन पहनावें की भी आवश्यकता है मगर रोज़ की जीवन शैली में अपने पारम्परिक वेश-भूषा का त्याग करके ‘फैशन’ के नाम पर अंधी दौड़ में फूहड़ वस्त्रों को पहनना कहाँ तक सार्थक है?

क्या आप टीवी में विज्ञापन, मॉडल, फ़िल्मी कलाकारों के पहनावे को देख कर वेस्टर्न कपड़े खरीद लेते हैं? अगर हाँ तो आप अनजाने ही अपनी संस्कृति को सस्ते दामों पर बेच रहे हैं! आज हमारे यहाँ के यूथ को फैशन ट्रेंड के नाम पर किस तरह बरगलाया जा रहा हैं। उसके लिए टीवी विज्ञापन में विदेशी कपड़ो को बेचते मॉडल, फ़िल्मी कलाकार आदि सब आते हैं। जिससे सबसे ज़्यादा हमारी युवा पीढ़ी प्रभावित होती हैं। छोटे और कटे -फटे कपड़े कभी भी भारतीय सभ्यता का हिस्सा नहीं थे लेकिन आज परिधान के नए और युवा फैशन के नाम पर भारतीय बाजार, छोटे तंग और कटे फटे कपड़ो के स्टाइल से भरे पड़े हैं! युवा पीढ़ी उसे बड़े शान से पहनती हैं तथा उसमें अपने आपको शिक्षित होने के गर्व से भी जोड़ती हैं।

दूसरी ओर, हम अपने ही परिधान को त्याग कर उसे ओल्ड फैशन होने का खिताब दे देते हैं, वहीं हमारे देश में आने वाले कितने ही विदेशी यात्री इसे इसलिए अपनाते हैं क्योंकि ये परिधान आरामदेह और भारतीयता के द्योतक हैं। उन विदेशियों को हमारे परिधान यहाँ की संस्कृति का भान करते हैं। वहीं क्या जगह-जगह से कटे-फटे छोटे कपड़े हमें किसी तरह के संस्कार से जोड़ते हैं? या फिर केवल निरंकुश स्वच्छंदता की ओर धकेल रहे हैं? वो भी इस हद तक कि वहां से वापस आने की सोचना भी हमें अपनी आज़ादी में दखल लगने लगता है!

सांस्कृतिक अंतर को समझना जरूरी

भारतीय कल्चर वो हैं जो भारत में माना जाता हैं। जिसमें विभिन धर्म जाति के लोग हैं। विदेशी कल्चर में विशेष रूप से यहूदी, क्रिश्चियन और मुसलिम आते हैं। जहाँ हमारे परिवारों में संयुक्त परिवार की मान्यता रही हैं विदेशी संस्कृति में एकल परिवार का प्रचलन हैं। जिसमें बच्चों के 18 वर्ष का होते ही माँ बाप और परिवार को छोड़कर अकेले अपनी इच्छा द्वारा रहना होता हैं! वह कुछ भी पहन सकता हैं कहीं भी आ जा सकता हैं। उस पर किसी तरह की कोई रोक-टोक नहीं होती। यहीं से शुरू होती हैं उन्मुक्तता और फिर उसकी पराकाष्ठा फिर वो चाहे जीवन शैली हो पहनावा हो या फिर कार्यव्यवहार की।

आजादी से पहले अंग्रेजों ने भारतीय शिक्षा व्यवस्था को समाप्त करने के लिए जिस तरह अंग्रेजियत का बीज बोया और जिस तरह से भारतीय ढंग से सोचने वालों के अंदर कुंठा का भाव पैदा किया, ठीक उसी प्रकार आज कल बाज़ारों में युवाओं के लिए ट्रेंडी कह कर जो परिधान परोसे जा रहे हैं यदि वो उसको न चुनकर कुछ अपनी संस्कृति या सभ्यता के अनुरूप चुनाव करें तो उसे पिछड़ा हुआ महसूस होता हैं! आप सोचिए कि विवेकानंदजी ने क्या कहा था? इसलिए भारतीय परिधान पहन कर आप अंग्रेजियत मानसिकता वालों को कुंठा दीजिए, न कि कट-फटे पश्चिमी परिधान पहन कर हर किसी के उपहास का पात्र बनिए!

बाजार का टूल मत बनिए, बाजार को अपने हिसाब से चलाइए!

भारतीय परंपरा के परिधान जैसे साड़ी, सूट सलवार कमीज दुप्पटा, इनमें भी बहुत नए ट्रेंड और फैशन हैं मगर विदेशी कटे-फटे और छोटे कपड़ो में ऐसा क्या हैं की लोगो को उसी की चाहत हैं? भारतीय बाजार, विदेशी ब्रांड्स के लिए एक मुनाफे का बाजार हैं क्यूंकि यहाँ सस्ते दामों में काफी कुछ बिक जाता हैं और उपभोक्ता का मनो-दोहन बाजार की प्राथमिकता हैं। यहाँ की युवा आबादी भी बहुत अधिक हैं और अंग्रेज़ियत फैशन के परिधान को अपनानें के लिए उनके मन का दोहन नए नए शोपिंग साइट्स, ट्रेंड्स और विज्ञापन द्वारा किया जाता हैं! और भारतीय युवा फटी-कटी जीन्स, टॉप, क्रॉप स्कर्ट या शॉर्ट्स को आम जीवन में पहनकर खुद को विदेशियों के बराबर समझने लगता हैं!

आपने कितनी ही ऐसे युवाओं को करते देखा होगा जो इन परिधानों को पहनते हैं। अजीब तरह के अधनंगे और छोटे कपड़े पहने होते हैं जिसमें उन कपड़ो का फटा होना उनकी दृष्टिकोण में स्टाइल सूचक हैं! रही सही कसर उनके अजीबो गरीब हेयर स्टाइल या रंग बिरंगे हेयर स्टाइल पूरे कर देते हैं! और पूछने पर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ढिंढोरा पीटने लगते हैं। क्या अभिव्यक्ति का मतलब अपनी गरिमा को गिराना है? अभिव्यक्ति का मतलब सार्वजनिक स्थलों पर अभद्रता और नग्नता का प्रदर्शन है? अभिव्यक्ति का मतलब पशुवत आचरण करना है? सोच कर देखिए?

URL: Indian traditional wear compared to Western dress

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