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महात्मा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक, कांग्रेस के DNA में ही नहीं है लोकतंत्र!

कर्नाटक प्रकरण को लेकर आज-कल लोकतंत्र और उसकी हत्या का शोर हर जगह मचा है! शोर मचाने वालों में कांग्रेस और उसके अध्यक्ष राहुल गांधी सबसे आगे दिखते हैं! जबकि कांग्रेस के इतिहास पर नजर डालेंगे तो हर तरफ रक्तरंजित लोकतंत्र मिलेगा! वह चाहे 1938 में सुभाष चंद्र बोस का अध्यक्ष पद पर चुनाव के बाद कांग्रेस से निकालना हो या 1946 में बहुमत सरदार बल्लव भाई पटेल के पक्ष में होने के बावजूद उसका गला घोंटकर जवाहर लाल नेहरू को पार्टी का अध्यक्ष बनाना हो, हर कदम पर कांग्रेस के अंदर लोकतंत्र का गला दबाए जाने का इतिहास मिलता है।

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल गांधी तक, कांग्रेस केवल गांधी-नेहरू उपनाम की बपौती बनकर रही है। सीताराम केसरी को अपमानित कर सोनिया गांधी को पदस्थापित करना हो या चतुराई से निर्विरोध राहुल का पदाभिषेक हो,अधिकांश समय नेहरू गांधी परिवार के लिए आंतरिक या बाह्य, हर प्रकार के लोकतंत्र की हत्या हुई है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि महात्मा गांधी से लेकर राहुल गांधी तक कांग्रेस के डीएनए में ही लोकतंत्र नहीं है।

मुख्य बिंदु

* गाधी ने स्वयं कई बार बहुमत की गला घोंटकर पटेल की जगह नेहरू को बनवाया अध्यक्ष
* सुभाष चंद्र बोस जब गांधी के उम्मीदवार को हराकर बने अध्यक्ष तो उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया

सुविधानुसार फैसलों को मानने और इच्छा के विपरित परिणाम को बदनाम करने की फितरत भी कांग्रेस को महात्मा गांधी से विरासत में ही मिली है। इसका खुलासा India Speaks Daily के प्रधान संपादक और वरिष्ठ पत्रकार संदीप देव की लिखी किताब “कहानी कम्युनिस्टों की” में हुआ है। महात्मा गांधी एक समय में कांग्रेस के लिए एक संविधानेत्तर संस्था बन गए थे। उनके लिए पार्टी में बहुमत या अल्पमत कोई मायने नहीं रखता था। एक प्रकार से उनकी इच्छा के अनुरूप ही फैसले होते थे। वह चाहे 1929, 1936, 1939 तथा 1946 में हुए कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए चुनाव, प्रक्रिया और परिणाम में देखा जा सकता है।

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कांग्रेस के अंदर लोकतंत्र की हत्या के शिकार सुभाषचंद्र बोस से लेकर सरदार पटेल तक!

1929 में लाहौर अधिवेशन में सरदार पटेल का अध्यक्ष बनना तय था क्योंकि बहुमत उनके पक्ष में था लेकिन अध्यक्ष का पद मिला जवाहर लाल नेहरू को, क्योंकि महात्मा गांधी यही चाहते थे। इसी प्रकार 1936 में महाराष्ट्र के फैजपुर गांव में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में भी यही घटना दोहराई गई। पटेल को अधिकांश सदस्यों के समर्थन हासिल होने के बावजूद महात्मा गांधी ने नेहरू को अध्यक्ष बनाना उचित समझा। इतना ही नहीं हद तो तब हो गई जब महात्मा गांधी ने 1946 में 15 प्रांतीय समितियों में से 12 समितियों की भावनाओं के खिलाफ जाकर एक बार फिर पटेल के स्थान पर नेहरू को तरजीह दी। 1946 में कांग्रेस का अध्यक्ष बनना काफी महत्वपूर्ण था। क्योंकि यह पहले से ही तय हो चुका था कि इस बार का अध्यक्ष ही स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनेगा। शायद इसलिए गांधी बहुमत का गला दबा कर पटेल की जगह नेहरू को अध्यक्ष बनाया।

गांधी की इच्छा के खिलाफ कांग्रेस में पत्ता भी नहीं डोल सकता था, इसका भी एक उदाहरण 1939 में हुए कांग्रेस के अध्यक्षीय चुनाव में सामने आया। 1939 में गांधी की इच्छा के विरुद्ध सुभाचंद्र बोस ने उनके उम्मीदवार पट्टाभिसीतारमैया के खिलाफ अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ा। बोस ने चुनाव लड़ा ही नहीं, बल्कि सीतारमैया को 203 मतों से हरा भी दिया। इसका परिणाम ये हुआ कि बोस को बीच में ही कांग्रेस के अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा। अध्यक्ष पद ही नहीं गया बल्कि तीन सालों तक कोई पद नहीं लेने के आदेश के तहत पार्टी से भी निकाल दिया गया। उस समय गांधी का विरोध करने वालों का यही हस्र होता था। और ये बात नेहरू बहुत बढ़िया से जानते थे। तभी तो नेहरू अंदर से भले ही मार्क्स, लेनिन और स्टालिन का संगम बहा रहे हों लेकिन बाहर से कभी भी गांधीवाद का लबादा नहीं उतारा।

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आंतरिक लोकतंत्र के साथ सांस्थानिक लोकतंत्र की भी कांग्रेस ने कई बार हत्या की है

नेहरू से लेकर, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी तक के काल में लोकतंत्र की हुई हत्या के अनेकों तथ्य भरे पड़े हैं। सब जानते हैं कि सोनिया गांधी को किस प्रकार वयोवृद्ध नेता सीताराम केसरी को अपमानित कर पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। हाल ही में किस प्रकार पार्टी के इतने काबिल नेता के होते हुए सर्वस्वीकार्य निर्विरोध राहुल गांधी का कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पदाभिषेक किया गया। जबकि उनके पार्टी के ही शहजादपूनावाला ने राहुल गांधी के निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष चुने जाने को चुनौती दी थी। राहुल गांधी के चापलूसों ने पूनावाला को ही पार्टी से निकाल दिया।

आंतरिक लोकतंत्र के साथ सांस्थानिक लोकतंत्र की भी कांग्रेस ने कई बार हत्या की है। वह चाहे राज्यपालों के विवेकाधिकार के रास्ते हो या फिर धारा 356 का दुरुपयोग। इसकी शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलान नेहरू ने ही की थी। नेहरू ने सबसे पहले 1959 में केरल में लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई नंबूदरीपाद की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। नेहरू ने तो उस सरकार को बहुमत भी साबित नहीं करने दिया था।

राज्यपाल के ऑफिस का दुरुपयोग करने के अपने पिता की विरासत को इंदिरा गांधी ने भी जिंदा रखा। उन्होंने दो बार राज्यपाल के ऑफिस का दुरुपयोग कर 1967 में पहली बार पश्चिम बंगाल की यूनाइटेड फ्रंट सरकार तथा 1984 में आधी रात को एनटी रामाराव की सरकार को बर्खास्त कर दिया था। वहीं राजीव गांधी ने 1989 में कर्नाटक में ही बोम्मई सरकार को बिना बहुमत साबित किए हुए ही बर्खास्त कर दिया। यह वही मामला था जो सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था और फिर कोर्ट ने सदन में बहुमत साबित करने का आदेश दिया था। मनमोहन सिंह भी कांग्रेस की विरासत को आगे बढ़ाने में पीछे नहीं रहे। उन्होंने साल 2005 में बिहार में पहली बार बनी जेडीयू-भाजपा गठबंधन की सरकार को बर्खास्त कर राज्यपाल के दफ्तर का बेजा इस्तेमाल किया।

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आपको मालूम होना चाहिए कि विरोधी सरकारों के खिलाफ धारा 356 का जितना दुरुपयोग कांग्रेस ने किया है उतना अभी तक किसी पार्टी ने नहीं किया। कांग्रेस ने तो इसे अपना हथियार ही बना लिया था। जिससे उनके अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री भयभीत और आशंकित रहते थे। देश में लोकतंत्र को तानाशाह बनाने का खेल सिर्फ कांग्रेस ने किया है। गुजरात में राज्यपाल के विवेकाधिकार का दुरुपयोग कर किस प्रकार लोकतंत्र की हत्या कर सुरेश मेहता की सरकार को बर्खास्त कराया था। ये तो महज एक उदाहरण है जबकि घटनाएं तो अटी पड़ी हैं

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