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‘टिक टॉक’ पर गधे को भी नथनी पहनकर नाचने का अधिकार है

लोकप्रिय होना हर मानव का स्वप्न है। ये एक सुसुप्त इच्छा है जो मन के किसी कोने में दुबकी रहती है और ‘टिक टॉक’ जैसे मंच उपलब्ध होने पर प्रकट हो जाती है। कुछ समय पहले तक हर चौथा आदमी वर्ल्ड फेमस नहीं होना चाहता था। हर चौथा आदमी अपनी छोटी सी दुनिया में प्रसन्न था। इंटरनेट के प्रादुर्भाव के बाद दूर-दूर सिमटी दुनियाएं पास आने लगी। लोगों को अभिव्यक्ति के नए-नए मंच मिलने लगे। संसार को कई लेखक, संगीतकार, पर्यावरणविद, अभिनेता इन मंचों से मिलने लगे। ‘टिक टॉक’ ऐसा ही अभिव्यक्ति का मंच था, जो एक चीनी कंपनी ने उपलब्ध करवाया था। विशेष तौर से भारत में ‘टिक टॉक’ मोबाइल वीडियोज से प्रसिद्ध होने के काम आ रहा था।

भारत सरकार ने चीन से खराब होते संबंधों के चलते टिक टॉक समेत कई चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध लगा दिया है। वह भले ही एक अच्छा मंच था और नए कलाकारों के लिए अपनी प्रतिभा दिखलाने का ज़रिया था लेकिन जिस देश की सेना से संघर्ष में हमारे बीस सैनिक बलिदान हो गए हो, उस देश का एप कितना भी अच्छा हो, हमें देशहित में खुद ही उसका त्याग कर देना चाहिए।

 हालांकि कल से सरकार के खिलाफ जिस ढंग से विलाप किया जा रहा है, उससे पता चलता है कि बीते कुछ साल में नई पीढ़ी के अंदर देश को लेकर सम्मान और प्रेम कम होता चला गया है। इसका नज़ारा कल दिखाई दिया, जब एक अठारह साल की ‘टिक टॉकर’ प्रतिबंध के बाद सरकार को ‘शेम ऑन यू’ कहती दिखाई दी। एक और सुंदर सी  ‘टिक टॉकर’ ने आंसू टपकाते हुए कहा कि ‘मोदी जी हमने आपको चुनकर बहुत गलत किया।’ एक अन्य का कहना था कि वह कोई स्वदेशी एप का प्रयोग नहीं करेगी।

सोशल मीडिया की सबसे अच्छी बात ये है कि यहाँ गधे को भी नथनी पहनकर नाचने का अधिकार है। इस अधिकार का सबसे अधिक दुरुपयोग फेसबुक और टिक टॉक पर किया गया है। कई विलक्षण प्रतिभाएं इन मंचों के जरिये सामने आई लेकिन अधिकांश कचरा ही उत्सर्जित हुआ। आपने देखा होगा कि वह कचरा फेसबुक पर अपलोड होकर हमारे हंसने के काम आता है। टिक टॉक की इस दुनिया में अमिताभ, मिथुन, जैकी श्रॉफ, सलमान खान की बद से बदतर ‘कॉपियां’ बिखरी पड़ी है।

 इन अभिनेताओं के ये डुप्लीकेट उनके हिट गीतों पर विद्रूपता भरा अभिनय करते हैं और आश्चर्य कि ‘सिनेमा’ जैसे महान माध्यम को कचरा-कचरा करते ये वीडियो पचास हज़ार तक व्यूज बटोर लेते हैं। विधाता ने हर मूरत को भिन्न ढंग से बनाया है। कोई गोविंदा या मनोज कुमार जैसा दिखता है और सिर्फ इस वजह से कैमरा लेकर नाचना शुरू कर देता है, तो समझ लीजे,  जो थोड़ी बहुत लोकप्रियता इनके हिस्से आई है, वह तो उस चेहरे की है, जो किसी सितारे से मेल खाता है।

  टिक टॉक पर व्यूज और फेसबुक पर लाइक बटोरने का खेल मन में दबी दो इच्छाओं को लेकर खेला जाता है। भीड़ में विशिष्ट दिखने की चाह और कम समय में लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए जो वीडियो बनाए जाते हैं, वे कई बार गरिमा की सीमा को पार कर जाते हैं। ऐसा हम ‘प्रेंक वीडियोज’ में देखते हैं कि अच्छे-भले राह चलते व्यक्ति को टिक टॉकर बेवकूफ बनाते हैं।

 इन लाखों वीडियोज में कुछेक मन को भले लगते हैं और समाज को प्रेरणा देते हैं। लाखों के कचरे में चंद अच्छे वीडियोज खोजने पड़ते हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर उनके विद्रूपता भरे वीडियोज की मांग होती है ताकि लोग उन पर ठहाके लगा सके। एक औसत टिक टॉकर को मालूम ही नहीं होता कि वह सोशल मीडिया के लाखों दर्शकों को हंसाने वाले जोकर से अधिक कुछ नहीं हैं।

सिनेमा अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है। वीडियो माध्यम उसकी ही संतान है और इसकी शक्ति भी कुछ कम नहीं है। ‘टिक टॉक जब तक भारत में चल रहा था, जन-जागरण के लिए बहुत उपयोगी हो सकता था। विशेष रूप से देश के किसान वर्ग के लिए बहुमूल्य जानकारियों से भरा डाटा बेस बनाया जा सकता था। लेकिन हम देख रहे हैं कि ये माध्यम भारत में गीतों पर रिकार्ड एक्शन वीडियो डालने या अभिनेताओं के मशहूर संवादों पर अभिनय करने का माध्यम बनकर रह गया।

 ये तो चीनी एप्प है लेकिन यदि हम स्वदेशी एप्स पर नज़र डाले तो वहां भी ऐसी ही मौज-मस्ती चल रही है। सोशल मीडिया का अध्ययन करने वाले अच्छी तरह जानते होंगे कि नब्बे प्रतिशत यूज़र्स के लिए ये केवल मस्ती करने का माध्यम है, जबकि वे जानते ही नहीं कि उनकी जेब में एक पूरा ‘मीडिया संस्थान’ यानि इंटरनेट युक्त मोबाइल पड़ा हुआ है। इस शक्तिशाली माध्यम का दस प्रतिशत उपयोग भी भारत में नहीं हो पा रहा है।

निश्चय ही टिक टॉक की कमी पूरी करने के लिए कोई न कोई बड़ी आईटी कंपनी या कोई धन कुबेर ऐसा या इससे भी बेहतर एप्प बाजार में ला सकता है। लाना ही चाहिए, क्योंकि भारत में इसके 120 मिलियन यूज़र्स हैं, जो ठेठ गाँवों तक फैले हुए हैं। होना तो यही चाहिए कि हमारा बनाया एप्प दुनिया के अन्य देशों में यूज़ किया जाए। एप्लिकेशन के इस बाज़ार में आखिर उत्कृष्टता की ही तो क़ीमत होती है। काश एक एप्लिकेशन ऐसी भी होती जो मौलिकता भरी रचनाओं को प्रमोट करती। वहाँ न नकलची रिकॉर्ड एक्शन चलते, न उटपटांग प्रेंक। काश कि ऐसा हो पाता।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Avatar Bipin Kumar Sinha says:

    सोशल मीडिया जहाँ अभिव्यक्ति का आसान मंच देता है, वहीं इसकी विद्रूपता भी सामने आती रहती है। आपने ठीक कहा कि यह सिर्फ मनोरंजन, वह भी फूहड़ का साधन मात्र नहीं रह जाना चाहिए, ज्ञान भी इसमें मिलता है, खास कर मेरे जैसे लोगों के लिए ,यह रेफरेंस का भी काम देता है।

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