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साधारण किन्तु असाधारण ओंके ओबव्वा

“किला तो घेर लिया है, मगर उसमें अंदर नहीं घुस सकते!” हैदर अली से उसके सैनिक ने आकर कहा। हैदर अली उन दिनों दक्षिण में आतंक का नाम बन गया था। हैदर अली ने अपने हिन्दू सरदारों को समाप्त करके उनके राज्य को हड़प लिया था। हैदर अली था कौन? वह मैसूर की सेना में नायक के पद पर काम करता था, बहुत ही शातिर था। और उसने धीरे धीरे अपनी ताकत बढानी शुरू कर दी। साल 1776 में मैसूर के राजा कृष्णराज की मृत्यु के बाद हैदर ने खुद को मैसूर का सुलतान घोषित कर दिया और इस तरह एक मतान्ध व्यक्ति मैसूर का शासक बन गया और हिन्दुओं और ईसाइयों की धर्मांतरण करने के साथ ही उसकी नज़र आसपास के इलाकों पर थी।

ऐसा ही एक क्षेत्र था चित्रदुर्ग। जिस पर उस समय मदकरी नायक का शासन था। हालांकि हैदर की सेना के सामने वह अधिक समय तक टिक नहीं सकता था, मगर यह भी सत्य है कि सैनिकों को दुर्ग के भीतर कैसे प्रवेश दिलाया जाए, यह समझ नहीं आ रहा था। फिर दुर्ग में एक छेद नजर आया। जहाँ से प्रवेश किया जा सकता था। परन्तु वह छेद इतना छोटा था कि उसमें से केवल एक ही सैनिक प्रवेश कर सकता था।

हैदर की बांछे खिल गईं,  हैदर को लगा कि अबकी बार तो उसे अवसर मिल ही गया है। उसने योजना बनाई कि एक एक करके सैनिक उस छेद से भीतर जाएंगे और फिर उसके चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गयी।

उस समय वहां पर मुदडा हनुमा नामक प्रहरी पहरा दे रहा था। दोपहर का समय था और वह अपने घर भोजन करने चला गया। और उसकी पत्नी तालाब पर पानी लेने आई, जो उस छेद के नज़दीक था।

क्या यह नियति थी? उसने देखा कि उस छेद से एक मुस्लिम सैनिक भीतर आ रहा है। अब वह क्या करती? उसके पास समय नहीं था, वह अपने घर जाकर अपने पति को नहीं बुला सकती थी। उसने कई बार सोचा कि क्या करे? यदि वह सही सलामत अन्दर आ जाता तो उसे मार डालता, और उसके पीछे भी सैनिक थे।

उसने शक्ति को याद किया और फिर वह धान कूटने वाला मूसल लेकर खड़ी हो गयी।  जैसे ही वह सैनिक आगे आया, उसने उसके सिर पर मूसल जिसे ओंके कहते हैं, उससे वार किया। उसके वार करते ही वह सैनिक मर गया और उसने उस सैनिक की लाश निकाल ली। उसके बाद दुसरे सैनिक के साथ यही किया, और फिर तीसरे।

उधर उसका पति प्यास के कारण व्याकुल हो रहा था।  वह बडबडा रहा था कि आखिर पत्नी जल लेकर क्यों नहीं आई? उसे कार्य पर जाने के लिए देरी हो रही है। कोई सैनिक घुस आया तो?

और अपने तमाम संदेहों एवं गुस्से को साथ लिए वह चल पड़ा। जब वह वहां पहुंचा तो खून में लथपथ अपनी पत्नी को देखकर हैरान रह गया। और जब उसने मुस्लिम सैनिकों की लाशों के ढेर लगे देखे तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं।

वह दोनों पति पत्नी मिलकर सैनिकों को ठिकाने लगाने का काम करने लगे।

उस समय नियति कुछ सोच रही थी, सोच रही थी कि क्या आगे बढ़ना है, क्या अब उसे जीवित रखना है? क्योंकि व्यक्ति जिस कार्य के लिए आता है उसके पूर्ण होने के बाद वह क्या करेगा?  ओबव्वा एक ही दिन में साधारण स्त्री से बढ़कर साहस की मूर्ती हो गई थी, जिसने उस समय के लिए संकट टाल दिया था। उसने अपने राज्य का ऋण उतार दिया था। अपने समाज का ऋण उतार दिया था। 

उस रात ओबव्वा की निर्जीव देह पाई गयी, वह निर्जीव कैसे हुई, कोई नहीं जान पाया, या तो दिन भर में इतनी लाशें देख लीं थीं कि वह रात में स्वयं से निगाहें नहीं मिला पाई या फिर उसे शत्रुओं ने ही सुला दिया।

होल्यास समुदाय की ओबव्वा को उस समय के बाद से ओंके ओबव्वा के नाम से जाना जाता है।

और कन्नड़ में इनका नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। वह वीरता और अदम्य साहस का प्रतीक है। वह साधारण होकर भी असाधारण है। वह इस बात की पुष्टि करती हैं कि स्त्रियों में साहस और स्थिति के अनुसार कदम उठाने की शिक्षा हर युग में थी।  परन्तु एक पूरी लॉबी द्वारा आज तक यह कहा जाता है कि भारत में स्त्री को प्रताड़ित किया जाता था, स्त्री में चेतना नहीं थी आदि आदि। और इन सबकी आड़ में पूरी की पूरी भारतीय परम्परा को नकारने की कोशिश होती रहती है। ऐसा कहकर बार बार ऐसा स्त्री विमर्श बनाने की कोशिश की जाती है, जो हमारा था ही नहीं।

कहा जाता है कि जिस समाज की स्त्रियाँ शिक्षित होंगी उसी समाज के पुरुष आदर्श रच पाएंगे। और ऐसा कैसे हो सकता है कि समाज में स्त्रियों को बोलने का या कुछ कार्य करने का अधिकार ही नहीं था। यह सब मिथक हैं और इन सब मिथकों को एक घुट्टी की तरह हमें पिलाया गया है।  और फिर अचानक से कोई उदाहरण हमारे सामने आ जाता है तो हम हक्के बक्के रह जाते हैं। और हमें हक्का बक्का करती हैं वह स्त्रियाँ जो साधारण थीं, सहज थीं। आइये अपना इतिहास जानने का एक तो प्रयास करें! आइये हमारे साथ जुड़कर अपनी जड़ों को जानने का प्रयास करे

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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4 Comments

  1. Jitendra Kumar Sadh says:

    वाह बहुत बढिया हमारे इतिहास को जानना अत्यंत सूखदायक है।

  2. Ravi Sharma says:

    Thanks for this wonderful factual information. Doordarshan once telecasted Film actor Sanjay Khan – Tipu Sultan and later we came to know the false narration propoganda of Islamic forces.

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