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वट सावित्री के बहाने कुछ बातें! क्यों सावित्री को पिछड़ा बताता है फेमिनिज्म?

Sonali Misra. सोमवार को ही भारत में एक विशाल पर्व मनाया गया। यह पर्व हिन्दू स्त्रियाँ मनाती हैं और इसी पर्व के कारण वह कथित फेमिनिस्ट के निशाने पर रहती हैं। वट सावित्री अर्थात अपने पति, अपने जीवन साथी के लिए यमराज तक से लड़ जाना, और पति के लिए ही नहीं बल्कि ससुराली जनों के लिए भी। ससुर के लिए भी वरदान लेना।

इसे हाल ही के एक उदाहरण से समझ सकते हैं। कुछ दिन पहले एक अभिनेत्री दीप्ति ध्यानी की गंजी, बिना बिना बालों वाली तस्वीर वायरल हुई थी। उन्होंने लिखा “सूरज थापर- तेरे नाम!” दरअसल अभिनेता सूरज थापर पिछले वर्ष कोरोना से पीड़ित हो गए थे और उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा था। सूरज थापर की हालत में सुधार नहीं दिख रहा था। उस समय उनकी पत्नी दीप्ति ध्यानी ने यह मनौती माँगी कि अगर उनके पति ठीक हो जाएंगे तो वह अपने बाल तिरुपति बालाजी को दान कर देंगी।

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आधुनिक फेमिनिस्ट इस बात पर ध्यान दें कि दीप्ति स्वयं एक अभिनेत्री हैं तो ऐसे में उनके पति को बहुत चिता थी। उन्हें लगता था कि दीप्ति स्वयं अभिनेत्री हैं, तो ऐसा कैसे हो सकता है? परन्तु दीप्ति ने इस बात की परवाह नहीं की कि आखिर उनका लुक कैसा दिखेगा? बस उनके दिल में उनके पति के लिए प्यार इस सीमा तक था कि उन्होंने अपने पति के ठीक होते ही अपना मुंडन करा दिया।

यह होती है पति के लिए किसी भी सीमा तक जाना!

परन्तु फेमिनिज्म इसी प्रेम पर प्रहार करता है। उसकी दृष्टि में यह समानता के सिद्धांत के विपरीत है। वह कहेगा कि क्या पति ऐसा करता? क्या पति अपनी पत्नी के लिए व्रत रखता है? क्या पति अपनी पत्नी के लिए मंगलसूत्र पहनता है? क्या पति सिन्दूर लगाता है? आदि आदि!

इन प्रश्नों की आड़ में वह इस प्रेम और इस व्रत को नीचा प्रमाणित करती हैं। बिना यह जाने कि यह प्रेम की शक्ति है। यहाँ पर मैं आपको फिर से उसी सिद्धांत की ओर ले जाऊंगी कि इन औरतों का विमर्श कहाँ से आरम्भ होता है? इन फेमिनिस्ट को दो ही सिद्धांतों से हवा मिलती है! पहली कि औरतें आदमियों की खेती होती हैं, उन्हें चाहे जैसा प्रयोग किया जाए और दूसरा औरतें आदमियों की पसली से बनी हैं और आदमी ही उनका मालिक है!

तो जब वहां से उपजा हुआ विमर्श उनके दिमाग में होता है तो वह समझ ही नहीं पाती हैं कि आखिर प्रेम का वह स्वरुप क्या है, जिसके कारण पत्नी अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत रख रही है। वह कौन सी भावना है जिसके आधार पर एक पति 19 महीने तक अपनी पत्नी को खोजते रहे। जैसे प्रभु श्री राम अपनी सीता को खोजते रहे थे, राजस्थान के विजेंद्र भी अपनी लीला को खोजते रहे।

केदारनाथ आपदा में उनकी पत्नी को मृत घोषित कर दिया था। परन्तु विजेंद्र का दिल नहीं माना था, और वह यह सोच ही नहीं पाए कि उनकी पत्नी ऐसे मर सकती हैं। फिर उन्होंने खोज आरंभ की। जंगल जंगल भटकते, कभी इधर जाते, कभी उधर,

मगर हिम्मत नहीं हारी और फिर 19 महीनों बाद उन्हें उनकी लीला मिल गईं!

तो औरतों को गुलाम या स्लेव समझने वाली मानसिकता वाली औरतें शिव और शक्ति के प्रेम को नहीं  समझ पाती हैं और शिव की प्रशंसा भी “जोरू का गुलाम” कहकर करती हैं!

प्रभु श्री राम को त्याज्य मानती हैं! उस समय वह यह भूल जाती हैं कि प्रभु श्री राम ने अपनी पत्नी के लिए विश्वविजेता रावण से युद्ध किया था।

सावित्री के बहाने वह समस्त स्त्रियों पर निशाना क्यों साधती हैं? जबकि सावित्री प्रेम और स्वतंत्रता की सबसे बड़ी उदाहरण हैं!

एक प्रश्न यह उठखड़ा होता है कि आखिर वह क्यों सावित्री के बहाने हिन्दू स्त्रियों को नीचा दिखती हैं, जबकि सावित्री तो प्रेम एवं स्वतंत्रता का सबसे बड़ा उदाहरण हैं! महाभारत में वनपर्व में जयद्रथ द्वारा द्रौपदीहरण के उपरान्त पांडवों के मनोबल को बढ़ाने के लिए महर्षि मार्कंडेय युधिष्ठिर को यह कथा सुनाते हैं। यह कथा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पांडवों एवं द्रौपदी के मध्य पसरे नैराश्य को समाप्त करती है।

युधिष्ठिर अपना दुःख व्यक्त करते हुए प्रश्न करते हैं कि यह द्रौपदी इतनी सती स्त्री है, फिर भी इसने जुए के समय में दुष्टों के हाथों से दुःख पाया और हम लोगों का उद्धार भी किया। फिर वन में जयद्रथ ने इसे बल से हर लिया। इस पर महर्षि मार्कण्डेय कहते हैं कि “हे राजन युधिष्ठिर, आप कुलीन स्त्रियों के चरित्र को सुनिए!” और फेमिनिस्ट क्या कहती हैं कि आप कुलीन स्त्रियों को साधारण बनाकर उनके चरित्र से दूर रहिये! उनकी कहानी सुनिए भी नहीं!

“क्योंकि कहानी सुनने से भारत की स्त्रियाँ भी निराशा से दूर होंगी और उनके भीतर भी अपने मूल्यों का संचार होगा! इसलिए इन कहानियों को या तो मूल में सुनाया ही न जाए और यदि सुनाया जाए तो इतने उपहासजनक तरीके से कि स्वयं के अस्तित्व से ही घृणा हो जाए!” मद्र नरेश के घर बहुत ही पूजा अर्थना के उपरान्त पुत्री का जन्म हुआ, और चूंकि वह देवी सावित्री के वर के कारण प्राप्त हुई थीं, तो उनका नाम सावित्री रखा गया।

कन्या अत्यंत रूपवती थी। गुणी थी। उसके तेज के सम्मुख कोई खड़ा ही नहीं हो पाता था। कोई सावित्री के साथ ब्याहने की इच्छा व्यक्त नहीं कर पाता था। फिर एक दिन राजा ने अत्यंत दुखी होकर अपनी रूप एवं गुणों से परिपूर्ण पुत्री से कहा कि वह उसकी योग्यता के अनुसार कोई वर नहीं चुन पा रहे हैं, तो वह स्वयं अपना वर चुनें।

वह कहते हैं कि “जो पिता अपनी कन्या का विवाह न करे वह निंदा योग्य है, जो पति स्त्री के ऋतुकाल में उसकी इच्छा को पूरा न करे वह निंदा योग्य है, पति के मर जाने पर जो पुत्र अपनी माता की रक्षा न करे वह भी निंदा योग्य है!” इसलिए हे पुत्री इस वाक्य को सुनकर तू शीघ्रता से पति को खोज! जिससे मैं देवताओं की निंदा के योग्य न रहूँ, ऐसा ही काम तुझे करना चाहिए!”

सावित्री की कथा का सबसे प्रगतिशील पक्ष यही है, जिसमें एक पिता अपनी पुत्री से यह कह रहे हैं कि उन्हें स्वयं जाना है और अपना वर खोजना है। क्योंकि हिन्दू धर्म में वह पिता निंदा के योग्य है जो पुत्री का विवाह नहीं करता है! और आजकल फेमिनिस्ट यह कहती हैं कि विवाह ही न करें क्योंकि हसबैंड आपकी बॉडी का ओनर है!

उसके उपरान्त वह मंत्रियों के साथ अपनी पुत्री को वर खोजने के लिए भेजते हैं। यह स्मरण रखना होगा कि गुण महत्वपूर्ण थे। उसके उपरान्त सावित्री वृद्ध एवं मान के योग्य लोगों को प्रणाम करती हुई सब वनों में विचरण करने लगी। कुछ वर्ष उपरान्त सावित्री जब अपने पिता के पास वापस लौटीं तो नारद जी भी वहीं उपस्थित थे। उन्हें प्रणाम कर सावित्री ने बताया कि उन्होंने द्युमत्सेन नामक राजा जो अभी शत्रुओं से पीड़ित होकर वन में रह रहे थे, उनके पुत्र को अपना पति मान लिया है।

नारद ने फिर राजा को बताया कि सत्यवान में यद्यपि बहुत गुण हैं, वह जितेन्द्रिय हैं, चंद्रमा के समान मनोहर है एवं अश्विनीकुमारों के समान रूपवान एवं बलिष्ठ है। परन्तु उसके पास जीवन शेष नहीं है। उसके पास एक ही वर्ष की आयु शेष है। राजा ने फिर सावित्री से कहा कि व जाए और दूसरा वर खोजे! परन्तु सावित्री कहा कि  मन से निश्चय करने के बाद वचन से कहा जाता है, फिर वही कर्म से किया जाता है, इसमें मेरा मन ही साक्षी है।

और जब नारद जी ने कहा कि “हे नरोत्तम आपकी पुत्री की बुद्धि स्थिर है, इसलिए इसका विवाह सत्यवान से कर दिया जाना चाहिए!” सत्यवान से विवाह हुआ और फिर जब एक वर्ष उपरान्त उनका अंतिम दिन आया तो सावित्री भी उनके साथ वन में गईं!

फल काटते-काटते सत्यवान के सिर में दर्द हुआ और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। उसके कुछ ही क्षण उपरान्त उन्होंने एक पीले वस्त्र वाले सूर्य के समान तेजयुक्त तथा सिर पर किरीट पहने हुए एक पुरुष को देखा। सावित्री ने उन्हें प्रणाम किया तथा ज्ञान के कुछ वचन कहे! यमराज उनके ज्ञान के वचनों से प्रसन्न हुए और उन्हें तीन वर दिए। उन तीनों वरों में सबसे महत्वपूर्ण था सावित्री को पुत्रवती होने का वरदान देना।

यमराज उनसे अत्यंत प्रसन्न हुए एवं सत्यवान को जीवनदान दे दिया।

इस कहानी में ऐसा क्या था, जिसके कारण हिन्दू स्त्रियों के लिए यह अपमानजनक शब्द बना दिया गया और सावित्री को पिछड़ेपन का प्रतीक बना दिया गया। इस कथा ने तो निराश अनुभव हो रहे पांडवों में एक साहस और आशा का संचार किया था, इस कथा से तो पति और पत्नी के प्रति प्रीत का संचार होता है!

यह कहानी प्रेम की भी कहानी है, हिन्दू स्त्री के प्रेम की! यह लोक में बसे हुए उस विश्वास की कहानी है कि मेरे सत्यवान को कुछ नहीं होगा! यह प्रेम को चुनने की कहानी है, यह प्रेम पर अडिग रहने की कहानी है, यह सनातन की शिव और शक्ति की कहानी है!

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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