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अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष… संभोग, उपभोग और वामपंथी औरतें!

Sonali Misra. एक बात को लेकर स्वयं से प्रश्न करें कि आपको बच्चे क्यों चाहिए? यह बहुत ही मूल प्रश्न है, आपको बच्चे क्यों चाहिए और आपको विवाह क्यों करना है? यह जो सिंगल मदर की बहस है या प्रश्न है, उसका उत्तर इन्हीं दो प्रश्नों के समवेत उत्तर में है.

इस मुद्दे पर Sandeep Deo और Sonali Misra का Video

आप किसी से भी बात कीजिए, विवाह किसलिए? और किससे? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर देने में आज भी कई लोग हिचकिचा जाएंगे, लगभग सभी का उत्तर होगा, घर वालों ने कहा शादी कर लो, कर ली!” पर विवाह का कांसेप्ट आपके दिल में क्या क्या है और कैसी लड़की या लड़के से आपका विवाह करने का मन है?

विवाह को लेकर दो तीन अवधारणाएं स्पष्ट होनी चाहिए. पहला तो यदि विवाह कामेच्छा एवं संतानोत्पत्ति के लिए है या फिर आजकल क्या विवाह आपकी सामजिक स्थिति को सुधारने के लिए है? फिर से प्रश्न आता है कि विवाह क्यों और किससे? दैहिक सम्बन्ध क्यों और किससे? जब आप किसी पुरुष की ओर आकर्षित होती हैं, जिसके लिए सर्वस्व समर्पित करने की इच्छा भीतर से जागृत होती है, उसमें ऐसा क्या आप देखती हैं? आपको क्यों लगता है कि इसके साथ एक रात भी बिताई जाए? और उस रात में क्या विशेष आपकी देह और आत्मा के साथ होगा? या फिर आप जैसे बर्गर खाती हैं वैसे ही किसी के भी साथ रात बिता सकती हैं या सकते हैं.

मैं इसे भी बहुत सहज मानती हूँ, कोई बुराई नहीं है, यदि कांसेप्ट क्लियर है. जैसे आपने बर्गर खाया, उसका स्वाद लिया और उसका रैपर फेंका और घर चले गए, जीभ पर एक संतुष्टि के साथ! वैसे ही एक रात आप किसी से मिले, आपको वह अच्छा लगा, आपने एक रात बिताई और एक संतुष्टि के साथ आप घर चली गईं. जहाँ तक संतुष्टि की बात है वहां तक यह ठीक है. परन्तु क्या इस सम्बन्ध ने आपकी उस चाह को पूर्ण किया? क्या आपकी आत्मा को तृप्त किया? सारा प्रश्न और उत्तर यहीं पर है.

ऐसे ही जब विवाह होता है, तो आजकल मोलभाव होता है जिसे हम लोग बहुत निर्लज्जता के साथ दहेज़ कहते हैं. जब लड़के को बेचा जा रहा होता है और लड़की वाले खरीदते हैं. इसमें लड़की वालों का भी दोष होता है, वह अपने पैसे के दम पर अपनी बेटी के लिए वर खरीदते हैं, उसके लिए कथित आर्थिक सुरक्षा खोजते हैं, पर लड़की के लिए प्रेमिल परिवार नहीं खोजते. और खोज कैसे पाएंगे? क्योंकि प्रेम तो उनकी सूची में है ही नहीं, है तो केवल बेटी ऐसी जगह चली जाए जहाँ के आर्थिक स्टेटस को बताकर वह अपने दोस्तों के बीच कालर उठा कर चल सकें. इसमें बेटी और प्रेम कहाँ है?

सत्यवान से जब सावित्री ने विवाह के लिए हठ की थी, और निश्चय किया था, तब उनके पिता ने आर्थिक सुरक्षा नहीं देखी? द्रौपदी ने जब अर्जुन का वरण किया तब नहीं देखी आर्थिक सुरक्षा. जैसे ही आप अपनी बेटी के लिए आर्थिक सुरक्षा खोजने लगते हैं, आप प्रेम को मार देते हैं, आप अग्नि के सम्मुख अपनी बेटी किसे देते हैं, यह आप ही जानें! और जब लाखों रूपए का दहेज़ लेकर लड़की ससुराल आती है तो यह वस्तु और उपभोग का सम्बन्ध है, सम्भोग का नहीं!

जी हाँ! सम्भोग नहीं हो पाएगा! उपभोग तो हो जाएगा! सम्भोग से क्या तात्पर्य है? सम्भोग जिसमें एक ही धरातल पर खड़े हुए दो भिन्न व्यक्ति अपने मध्य के समस्त अंतर भुलाकर एक दूसरे की देह के माध्यम से आत्माओं को जानते हैं एवं स्वयं का आत्मिक विकास करते हैं. उपभोग में वह केवल दैहिक रह जाता है, ऊपर ऊपर संतुष्टि हुई, जैसे बर्गर खाने के बाद हुई थी और आपके भीतर एक कुंठा भर गयी. क्षण भर की जिह्वा या देह की संतुष्टि और फिर शून्य बटे सन्नाटा!

सम्भोग के लिए जब ऋषि अगस्त्य ने अपनी पत्नी लोपामुद्रा से कहा तो लोपामुद्रा ने स्पष्ट कहा “यदि आपको मुझसे सम्भोग करना है, संतान प्राप्त करनी है तो जैसे आज तक मैंने आपका जीवन अपनाया है, वैसे ही सम्भोग के समय आपको मेरे लिए वही सुविधाएं लानी होंगी जिनकी आदी मैं अपने पिता के घर पर थी, अर्थात महल में. एवं आपको यह अपनी विद्वता के बदले में दान में नहीं लानी हैं, श्रम करके लानी हैं.” जिस सम्भोग के लिए श्रम किया जाता है, जब कामेच्छा के पूर्ति के लिए पति और पत्नी परस्पर श्रम करते हुए, उस क्षण में प्रवेश करते हैं जब वह दो नहीं रहते तब उससे उत्पन्न सन्तान कभी भी इस विमर्श का हिस्सा नहीं हो पाती कि “महंगाई बहुत बढ़ गयी है, बच्चे भी कितने खर्चीले हो गए हैं.”

यह जो बच्चों को बोझ मानने की प्रवृत्ति है यह उसी क्षण से उत्पन्न हो जाती है जब आप अपने ससुराल से प्राप्त डबल बेड पर आराम से अपनी पत्नी के शरीर का उपभोग कर रहे होते हैं और पत्नी आपके! आपने सम्भोग तो किया ही नहीं, तो बच्चे तो खर्चीले लगेंगे ही. और जब आपने सम्भोग नहीं किया, उपभोग किया तो सम्बन्ध समाप्त होंगे ही.

उन उपभोग के क्षणों से उत्पन्न बच्चा आपको बोझ लगेगा और जब आप उस उपभोग वाले सम्बन्ध से बाहर होंगे तो आप सिंगल मदर का राग गाएंगी क्योंकि आपने एक क्षण के लिए भी सम्भोग नहीं किया. यदि आपने एक क्षण के लिए उस सम्बन्ध में सम्भोग किया होता, देह से आत्मा तक की यात्रा की होती, तो विश्वास मानिए आप उस सम्बन्ध से बाहर अवश्य आ जाएँगी परन्तु वह बच्चा आपको उस एक संतुष्ट क्षण का स्मरण कराता रहेगा. वह आपकी संतुष्टि के रूप में आपके साथ रहेगा, उपभोग की स्मृति के रूप में नहीं!

वस्तु और उपभोक्ता का एक टाइम पीरियड होता है, हर वस्तु एक कार्ड के साथ आती है. तो हाई फाई स्टेटस देखकर प्रेम करने वाली लडकियां और ट्रक भरकर दहेज़ लेकर खुद को बेचने वाले लड़के जल्द ही उस कार्ड की तरह एक्सपायरी की तरफ बढ़ने लगते हैं. मगर तब तक तो बच्चे आ गए, इन्वेस्टमेंट! जिससे आगे जाकर उन्हें भी वसूलना है.

चूंकि वह सम्भोग का परिणाम न होकर उपभोग का परिणाम है तो बच्चे आपके अस्तित्व का हिस्सा तो हैं नहीं, बच्चे तो एक ऐसी वस्तु हैं, जिन्हें आप अपने भविष्य के लिए इन्वेस्ट कर रहे हैं. फिर आती हैं बड़े बड़े स्कूल की बातें, उनके लिए बीमा योजनाओं का खर्च, उनके लिए एसआईपी का खर्च, उनका भविष्य सुरक्षित करने का खर्च! उनके लिए बड़े बड़े ब्रांड की चीज़ें लेने का अनिवार्य खर्च! और फिर बच्चे को सुनाया जाता है, “हम तुम पर इतना खर्च करते हैं और तुम नंबर नहीं ला सकते!”

इनमें बच्चा और प्रेम कहाँ है? यह तो विशुद्ध उपभोग है! फिर बच्चा भी एक एक्सपायरी कार्ड और अनुबंध वारंटी के साथ आएगा क्योंकि वह एक वस्तु ही है, और फिर जब वारंटी खत्म होगी तो आप कहेंगे आजकल बच्चे सुनते नहीं!

स्वयं के लिए सम्भोग और उपभोग की अवधारणा को स्पष्ट रखिये, विवाह का आधार मात्र प्रेम रखिये, वह प्रेम जिसके लिए कृष्ण रुक्मणि को लेने चले गए थे, वह प्रेम जिसके लिए सती अपना महल छोड़कर कैलाश में आ गयी थीं. प्रेम और पुरुषार्थ अलग अलग नहीं होते. पुरुषार्थ से पूर्ण पुरुष के प्रति लड़की आकर्षित होगी. स्वयं में इतना सामर्थ्य उत्पन्न कीजिए कि बोली न लगानी पड़े. क्या आवश्यकता है स्वयं को अपनी पत्नी की दृष्टि में वस्तु बनाने की?

सिंगल मदर और कुछ नहीं बस प्रेम रहित जीवन की एक अवस्था है, जिस जीवन में किसी के प्रति भी प्रेम नहीं है, न ही उस व्यक्ति के प्रति जिसने उसकी देह में प्रवेश किया और न ही उस बच्चे के प्रति जिसे खुद अपनी ही देह से जन्म दिया. ओह! देह से मुझे याद आया जब आपकी देह मात्र मेकअप के सामानों का स्टोर रूम बन जाता है तो आपको देह से भी कहाँ प्रेम रहा, देह भी तो दूसरों को आकर्षित करने के लिए एक वस्तु ही रह गयी. तो जब देह ही वस्तु है, तो आप स्वयं क्या हैं, उसे समझिये!

यह संघर्ष वस्तु, उपभोक्ता, उपभोग एवं तथा प्रेम एवं सम्भोग के मध्य का संघर्ष है, आप देखिये आप कहाँ पर हैं? यदि पति और पत्नी के मध्य परस्पर सम्बन्ध बिगड़ रहे हैं, तो दैहिक सम्बन्ध अवश्य बनाइए क्योंकि कई लोगों के लिए वह दाल खाने जैसा रूटीन है, मगर भगवान के लिए उन रूटीन वाले बोझिल सम्बन्धों से बच्चे पैदा मत कीजिए.

कई लोग हैं जो दिन भर ऑफिस में सेल्स टार्गेट पूरा न होने की सारी कुंठा स्त्री की देह में डाल देते हैं, और स्त्री जो दिन भर ऑफिस में खटकर आई है, और रात को रसोई समेटते समेटते उसे खुद को ग्यारह या बारह बज गए हैं, वह भी नाइटी उतार कर मशीन की तरह नीचे गिर जाती है, क्योंकि उसे भी सुबह ऑफिस जाना हैऔर मैंने कई बार मेट्रो में औरतों को बातें करते हुए सुना है कि वह इतनी थकी होती हैं कि वह सो जाती हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता कि उनका पति क्या कर रहा है? अब सोचिये, ऐसे सम्बन्धों से बच्चे उत्पन्न होंगे तो बोझ तो लगेंगे ही न?

सिंगल मदर का राग अलापने वालीं और परिवार में रहते हुए भी बार बार यह कहने वालीं औरतें कि “बच्चों के खर्चे बहुत बढ़ गए हैं.” प्रेम रहित स्त्रियाँ हैं, और प्रेम रहित परिवार हैं, क्योंकि इनके लिए बच्चे इनके अस्तित्व का हिस्सा नहीं है, बोझ हैं.

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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