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हिन्दू घृणा और सिख–भाग 1

Sonali Misra. किसान आन्दोलन के चलते एक बार फिर से आग लगाने की तैयारी है।  किसान अधिनियम के मामले में अजय देवगन द्वारा सरकार के पक्ष में ट्वीट करने के कारण उनकी गाड़ी को रोका गया और फिर एक निहंग सिख ने उन्हें धमकाया।

इतना ही नहीं जैसा कि टूलकिट में अदानी और अम्बानी को निशाना बनाए जाने को लेकर कहा गया था, मुकेश अम्बानी के घर पर विस्फोटकों से भरी गाडी पाई गयी, जिसके मालिक की कल संदिग्ध स्थितियों में मृत्यु हो गयी।

घृणा का यह घटनाक्रम हो सकता है कि आज का हो, परन्तु इसकी नींव आज की नहीं है, इसकी नींव बहुत पहले पड़ गयी थी। अनुवाद का एक सिद्धांत है कि आप या तो स्थानीयकरण कर लीजिए या विदेशीकरण।

जब अंग्रेज यहाँ पर आए तो उन्होंने भारत के इतिहास का स्थानीयकरण अंग्रेजों के लिए किया एवं उसे यहाँ के लिए ही विदेशी कर दिया, जिसे आगे चलकर हमारे देश के नागरिकों ने पढ़ा और स्थानीय न होकर विदेशी हो गए, जड़ों से कट गए।

इसका एक उदाहरण आधुनिक सिख भी हैं। जब पूरा देश मुगलों के अत्याचार से त्रस्त था, तब संतों ने इस देश के मनोबल को सम्हालने का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर लिया और ऐसे ही एक महान संत हुए गुरुनानक देव जी, जिनके शिष्य सिख कहलाए। वह सिख और कहीं से नहीं आए थे, वह हिन्दू ही थे।

पर आज के कुछ सिख हैं, वह खुद को हिन्दुओं से अलग बताना बहुत गर्व का विषय मानते हैं। और बार बार यह कहते हैं कि हिन्दू धर्म इसलिए पिछड़ा है और इसलिए धर्मांतरण हो रहा है क्योंकि उसमें जातिवाद है। पर यह सबसे बड़ा झूठ है।

जातिवाद हर धर्म की सच्चाई है, बल्कि अन्य धर्मों में तो और भी अधिक है। जैसे जाट सिख, मज़हबी सिख, खत्री सिख, दलित सिख तथा अब एक नया ईसाई सिख भी आ गए हैं। 

इनके विषय में और चर्चा करेंगे तो पाएंगे कि दलित सिखों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और उन्हें ऊंची जाति के सिखों के गुरुद्वारों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है। 

firstpost में वर्ष 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार मनसा से एक दलित नेता सुखराज सिंह ने कई घटनाएं बताते हुए कहा है कि पुलिस ने कई बार उनकी जाति के साथ हुए अत्याचारों के खिलाफ न केवल रिपोर्ट लिखने में आनाकानी की है, बल्कि कई बार तो पीड़ित के ही खिलाफ ही रिपोर्ट लिखता है। इसी में लिखा है कि देहाती मजदूर सभा के राज्य वित्त सचिव माहीपाल के अनुसार दलित और ऊंची जातियों के लिए अलग अलग कब्रगाह हैं।

जब ऐसा है तो क्या यह नहीं होना चाहिए था कि बजाय इसके कि जो खालिस्तानी समर्थक हिन्दुओं को गाली दे रहे है, वह अपने समुदाय के दलित सिखों की स्थिति सुधारने का प्रयास करते?  पर वह उस जाल में फंस रहे हैं या कहें फंस गए हैं, जो ईसाई मिशनरी ने भारत आते ही बुनना शुरू कर दिया था। 

HINDU-SIKH RELATIONSHIP में राम स्वरुप लिखते हैं कि  अंग्रेज अपने युद्ध कौशल के कारण भारत में बस तो गए थे, परन्तु वह इस विशाल देश में केवल सैन्य शक्ति के कारण रुके नहीं रह सकते थे, इसलिए उन्हें हर हाल में बांटों और शासन करो की नीति पर कदम बढाने थे।

वह लिखते हैं कि चूंकि इस्लामी शासन के उत्तराधिकारी अब उनके साथ आ चुके थे इसलिए अब उन्हें हिन्दू एकता को तोड़ना था। इसलिए उन्होंने हिन्दुओं के सबसे बड़े साथी अर्थात सिखों की ओर दृष्टि डाली।

अंग्रेजों ने सिखों को मुस्लिमों और ईसाइयों के जैसे एक अलग विशेष धार्मिक अल्पसंख्यक के रूप में परिवर्तित कर मूल हिन्दू धर्म से अलग करने का षड्यंत्र रचना आरम्भ कर दिया।

सिख धर्म के विद्वानों के हृदय में यह बार बार भरा गया कि जैसे ईसाई जुडिज्म से अलग है, वैसे ही सिख हिन्दू धर्म से एकदम अलग है। इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ईसाई मिशनरी के कार्यकर्ता और पश्चिमी इंडोलोजी के लेख सम्पूर्ण मनोयोग से लग गए।

उन्होंने सबसे पहले ब्राह्मणों पर निशाना साधा और उसे खलनायक बनाया एवं यह स्थापित किया कि जैन एवं बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म के पंडितों/ब्राह्मणों के अत्याचारों के विरुद्ध एक विद्रोह था तथा जिसके विरुद्ध बाद में भक्ति आन्दोलन आरम्भ हुआ और इसी की श्रृखंला में इस ब्राह्मणवाद के विरुद्ध सिख धर्म का उदय हुआ।

हालांकि जब वह यह फालतू के सिद्धांत गढ़ रहे थे, तब उन लोगों ने इस तथ्य को बिलकुल भुला दिया कि जब औरंगजेब के दरबार में गुरु तेग बहादुर अपना शीश कटा रहे थे उससे पहले तीन ब्राह्मण सिख और हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे चुके थे।

इतना ही नहीं जहांगीर अपनी आत्मकथा में सिखों के गुरु अर्जन देव को हिन्दू कहकर ही संबोधित करता है और उनका वध अपने बेटे खुसरों का साथ देने के कारण करता है, पर चूंकि औपनिवेशिक इतिहासकार मैक्स आर्थर मकौल्फ़ ने एक हिन्दू कर्मचारी चंदू शाह की गुरु अर्जुन देव की कहानी घुसेड दी है, जो कहीं भी जहांगीर की आत्मकथा में नहीं है, मगर इसे खुशवंत सिंह ने भी अपनी History of the Sikhs में लिखा है, तथा बाद में उन्होंने छोटा सा स्पष्टीकरण दिया है कि ऐसा कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं है।  और वाकई तत्कालीनकिसी भी पुस्तक में ऐसी कोई भी कहानी नहीं है, परन्तु हिन्दुओं और सिखों के मध्य दुश्मनी पैदा करने के लिए इस प्रकार की मन गढंत कहानियां रची गईं।

राम स्वरुप जी पंजाब प्रशासन की वर्ष 1851-52 की एक रिपोर्ट के हवाले से लिखते हैं कि “अमृतसर में सालाना जलसों में आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या में कमी आने लगी थी।” यह रिपोर्ट आगे कहती है कि “लोग खालसा को छोड़कर हिन्दुओं में शामिल होने लगे थे, जहाँ से वह आए थे। और अपने बच्चों को हिन्दुओं के रूप में पालने लगे थे।”

वर्ष 1854-55 की रिपोर्ट यह कहती है कि चूंकि अब सिख कॉमनवेल्थ टूट गया है, इसलिए लोग सिख धर्म को छोड़कर हिन्दुओं में वापस आ रहे हैं।” रामस्वरूप जी लिखते हैं कि इस प्रक्रिया में किसी को कोई समस्या नहीं हुई क्योंकि हिन्दू ही सिख थे और सिख ही हिन्दू थे। 

परन्तु भारतीयों के लिए अनुकूल यह विकास अंग्रेजों को पंसद नहीं आया  और उन्हें लगा कि यदि ऐसा हुआ तो उन्हें भारत से भागना होगा तो उन्होंने सिख खतरे में हैं का शोर मचाना शुरू कर दिया। 

यद्यपि इसके लिए उन्हें काफी श्रम करना पड़ा क्योंकि उन्होंने जिन डॉ। ई ट्रंप, जो जर्मनी के इंडोलोजिस्ट और मिशनरी थे, को बुलाया और जिम्मा दिया कि वह हिन्दू धर्म और सिख को अलग अलग करें, उन्हें इस विचार का समर्थन करने के लिए कोई भी उदाहरण नहीं मिला। 

(क्रमश:) *अगले लेख में इसके आगे के षड्यंत्रों पर दृष्टि डाली जाएगी 

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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