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सच्चाई का ‘सुई धागा’ लेकर मन से ‘तुरपाई’ करते हैं निर्मल आनंद!

हमें आदत सी हो गई है अपने प्रिय कलाकार को आलीशान कपड़ों में देखने की, न्यूज़ीलैंड और ग्रीस के लोकेशंस के बैकग्राउंड में डिजाइन किये गए गीत देखने की, फिल्म के हीरो को सर्वशक्तिमान देखने की। सिनेमा को ‘लार्जर देन लाइफ’ देखने की लत इतनी भारी पड़ी है कि आम आदमी का किरदार फिल्म में देखते ही हम नाक भौ सिकोड़ लेते हैं। परदे पर साइकिल चलाते आम आदमी की जद्दोज़हद हमारे महंगे कोक और पॉपकॉर्न का लुत्फ़ बिगाड़ देती है। ‘सुई धागा’ ऐसी फिल्म है जो निश्चित रूप से आपके पॉपकॉर्न का मज़ा बिगाड़ेगी क्योंकि इसमें सुंदर लोकेशंस नहीं है और न नायिका के भूगोल को नापते कैमरा एंगल हैं। इसमें तो वास्तविकता की पथरीली ज़मीन पर उग आए सपने की कहानी है।

मौजी एक प्रतिभावान दर्जी है। मौजी के दादा सिलाई का काम करते थे मगर आर्थिक हालात बिगड़ने से काम बंद हो गया। इस कारण मौजी और उसके पिता को नौकरी करनी पड़ती है। मौजी की पत्नी उसे खुद का व्यापार करने के लिए प्रेरित करती है। जब मौजी अपनी सिलाई मशीन लेकर बाहर निकलता है तो हालात और बिगड़ते हैं। नौबत यहाँ तक आ जाती है कि मौजी की अपनी सिलाई मशीन भी उससे छीन ली जाती है। विपरीत परिस्थितियों में मौजी और ममता कैसे कामयाब होते हैं, यही सुई धागा की कहानी है। लेखक और निर्देशक शरत कटारिया ने अपनी कहानी के रेशे वास्तविकता के महीन धागों से बुने हैं। इस कहानी में कोई ‘उलटफेर’ नहीं है, कोई ‘ट्विस्ट’ नहीं है। ये आम कहानी है जो सीधी पगडण्डी पर चलकर अपने घर पहुँच जाती है, बिना किसी आडंबर, बिना किसी लाग-लपेट के।

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अनुष्का शर्मा ने सामाजिक सरोकार वाली इस फिल्म को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ दिया है। अनुष्का इससे पहले कभी किसी फिल्म में इतनी तीव्रता से अभिनय करती नहीं दिखाई दी है। ममता के चरित्र को उन्होंने इस कदर अपने भीतर ढाला है कि कोई चूक, कोई कसर बाकी नहीं रहती। उनका ‘अंडरप्ले’ कमाल का रहा है। एक गंवई महिला की भूमिका निभाते हुए वे ओवरएक्ट का शिकार नहीं होती। वे आँखों से बोलती हैं। वे चलती हैं तो अनुष्का नहीं ‘ममता’ होती हैं। इस बार अभिनय का राष्ट्रपति पुरस्कार और फिल्म फेयर उन्हें नज़रअंदाज़ कर पाए, ये मुश्किल लगता है।

वरुण धवन ने जब अपने साथी सिद्धार्थ मल्होत्रा के साथ कॅरियर की यात्रा शुरू की थी, तब लगता नहीं था कि उनके भीतर एक स्वाभाविक अभिनेता छुपा बैठा है। हालांकि ‘बदलापुर’ में उन्होंने साबित किया कि वे लम्बी रेस के घोड़े हैं। ‘सुई धागा’ में मौजी का किरदार उनके निभाए गए किरदारों में गिना जाएगा। एक दर्जी कैंची कैसे पकड़ेगा, मशीन कैसे चलाएगा, कैसे कपडा काटेगा, इसके लिए उन्होंने बाकायदा प्रशिक्षण लिया है। वरुण धवन इस फिल्म में अनुष्का से कुछ पीछे रह गए हैं लेकिन फिर भी प्रभावित करते हैं। मौजी के पिता की भूमिका में रघुवीर यादव कमाल करते हैं। नामित दास और गोविन्द पांडेय ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।

निर्देशक शरत कटारिया बधाई के पात्र हैं। उन्होंने ये फिल्म प्रधानमंत्री के महत्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को समर्पित की है। सुई धागा गहराई से बताती है कि इस देश में एक गरीब आदमी को स्टार्टअप खड़े करने के लिए आग का दरिया पार करना पड़ता है। फिल्म का सकारात्मक पक्ष ये है कि ये बेहद सच्चाई के साथ आम आदमी की कहानी को दर्शक के सामने रखती है। केवल मनोरंजन चाहने वालों को इसमें कुछ नहीं मिलने वाला है। ये फिल्म गंभीर विषयों को पसंद करने वाले दर्शकों के लिए ही बनाई गई है।

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सुई धागा का बजट मात्र तीस करोड़ हैं और यशराज फिल्म्स इसके संगीत व सेटेलाइट अधिकार बेचकर पहले ही मुनाफा खड़ा कर चुका है। अब फिल्म जितनी भी चलेगी, लाभ ही कमाएगी। पहले दिन का हाल यूँ है कि पहले शो में केवल तीस प्रतिशत दर्शक मौजूद थे लेकिन बाद के शो में दर्शकों की संख्या बढ़ती चली गई। फिल्म देखकर निकले दर्शक अच्छी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इससे समझ आता है कि फिल्म को दर्शक ने स्वीकार कर लिया है, ख़ास तौर से युवा दर्शकों ने।

फिल्म में एक दृश्य बहुत सुंदर संकेत देता है। कपडा फैक्टरी से मौजी और ममता बाहर निकल रहे हैं। फैक्टरी में अँधेरा है और वे बाहर उजाले की ओर बढ़ते चले जा रहे हैं। पहली बार मौजी की उँगलियों ने ममता की उँगलियों को थामा है। मौजी ने संकल्प ले लिया है कि वह इस लड़ाई को जीतकर रहेगा। ममता ये सोचकर खुश है कि आज पहली बार पति ने उसे प्यार से छुआ है। बैकग्राउंड में गीत की पंक्तियाँ बजती हैं जो इस दृश्य को और भावभीना बना देती हैं। ‘बर्बाद दिन ने जो फेंकी यहाँ, हमने वो कतरन उठाई है, कतरन का पोला सा तकिया बना उसपे ही नींदें चढ़ाई है।’

सुई धागा निश्चित रूप से आपके पॉपकॉर्न का स्वाद बिगाड़ देगी। सच्चाई के धागों से बुनी ये फिल्म आपको मनोरंजन तो कतई नहीं देगी लेकिन आनंद के निर्मल आनंद में जरूर डूबा देगी। बर्फ से ढंके पहाड़ों के लोकेशंस तो हरगिज नहीं मिलेंगे लेकिन वास्तविकता के कठोर धरातल देखकर आपके आंसू जरूर उमड़ पड़ेंगे। ये तो आपको निर्णय लेना है। आप न देखें तो भी ये एक बेहतरीन फिल्म है और जबरदस्त ढंग से हिट है।

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URL: Sui Dhaga Movie Review-Anushka Sharma and Varun Dhawan award winning performance

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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