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आयशा की आत्महत्या और मुर्गी मानसिकता!

Sonali Misra. अहमदाबाद में दो तीन दिन पहले एक मुस्लिम समुदाय की लड़की आयशा (यह मैं जानबूझकर इसलिए लिख रही हूँ, क्योंकि ओवैसी ने आयशा को मुस्लिम बच्ची कहकर सम्बोधित किया है) ने अपने ससुराल द्वारा कथित रूप से सताए जाने एवं पति की बेवफाई से दुखी होकर साबरमती नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली, जिसका वीडियो उसने बनाकर अपने पिता को भेजा। 

देखते ही देखते यह वीडियो वायरल हो गया और उसके पति एवं फुफेरे भाई (दोनों एक ही हैं) (ऐसा कुछ लोगों ने कहा है, परन्तु यह बात पूर्णतया सत्य है कि वह आपस में रिश्तेदार हैं)

समुदाय और भिन्न समाज

आयशा अपने वीडियो में अपने पति की बेवफाई की बात करते हुए अपने परिवार से कह रही है कि मामला वापस ले लिया जाए। एक अत्यंत हृदय विदारक वीडियो है, यह सत्य है।

बच्ची के साथ गलत हुआ, यह भी सत्य है। पर उसके पिता का वीडियो देखकर ऐसा लगा जैसे वह सारी गलती समाज पर थोप रहे हैं।  इस बात को समझते हैं कि आखिर समाज क्या है?

एक समाज एक जैसे विचारों वाले या एक प्रकार की पूजा पद्धति और संस्कृति मानने वाले लोगों का समूह होता है। और हर स्थान पर जातियों के आधार पर, धर्म के आधार पर या कई और आधार पर समाज हो सकता है।

गिन्सबर्ग के अनुसार “समाज व्यक्तियों का समुदाय है, जो कुछ खास संबंधों या ख़ास व्यवहारों द्वारा आपस में जुड़े होते हैं, जो उन संबंधों तथा व्यवहार में बंधे नहीं होते हैं, वह उस समाज का हिस्सा नहीं होते हैं।”

दहेज़, जहेज़ और स्त्रीधन

आयशा के बहाने उस समाज को कोसने की क्या जरूरत हो गयी जो आयशा के समाज के सम्बन्धों तथा व्यवहार में बंधा हुआ ही नहीं है। आयशा के अब्बू ने अपनी बेटी की आत्महत्या के बाद इस्लाम की तारीफ़ करते हुए कहा कि इस्लाम में तो दहेज़ है ही नहीं, यह बुराई नहीं है!” 

जबकि यह बात सत्य है कि दहेज़ शब्द की उत्पत्ति ही जहेज से हुई है। जहेज का अर्थ सौगात होता है। यह बहस बहुत दिलचस्प है कि जहेज से दहेज़ शब्द आया या दहेज़ से जहेज शब्द पैदा हुआ। जहेज़ अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ सौगात के रूप में दिया गया है। 

मुस्लिम विद्वानों का कहना है कि दहेज़ से जहेज़ आया, परन्तु दहेज़ शब्द का इतिहास भारत में प्राप्त नहीं होता। भारत में स्त्री धन शब्द प्रचलित था, जिसे कन्या पक्ष द्वारा वर पक्ष को दिया जाता था। 

जिस मनुस्मृति के आधार पर हिन्दू धर्म को कोसा जाता है, जिस मनुस्मृति को स्त्री विरोधी बताया जाता है उसमें भी जो आठ विवाह वर्णित हैं, उसमें प्रथम उत्तम चार विवाहों में वह विवाह नहीं है, जिसमें जबरन धन देकर विवाह किया जाता है।

प्रथम चार जो उत्तम प्रकार के विवाह माने गए हैं, वह हैं ब्राह्म विवाह, देव विवाह, आर्ष विवाह एवं प्राजापत्य विवाह। कन्या पक्ष द्वारा अन्य बातों की उपेक्षा करके धन देकर किए जाने वाले विवाह को आसुर विवाह कहा जाता है।  मनुस्मृति में तीसरे भाग में स्त्री और विवाह के सम्बन्ध में क्या लिखा है उसे ध्यान से पढ़े जाने की आवश्यकता है:

स्त्रीधनानि तु ये मोहादुपजीवन्ति बान्धवा:

नारी यानानि वस्त्रं वा ते पापा यान्त्यधोगतिम! (3/52)

इसे बहलर ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है:

52। But those (male) relations who, in their folly, live on the separate property of women, (e।g। appropriate) the beasts of burden, carriages, and clothes of women, commit sin and will sink into hell।

अर्थात  कन्या के धन पर जो पुरुष लालच लगाकर उन्हें हडपने की फिराक में रहते हैं, वह अधोगति को प्राप्त होते हैं।

एक नहीं कई उदाहरण यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि दहेज़ जैसी कुप्रथा भारत में नहीं थी, स्त्री धन का प्रचलन था, एवं वह इसलिए क्योंकि बेटी का विवाह दूर होता था एवं संपत्ति के एक हिस्से को अपनी बेटी को व्यक्ति स्त्री धन के रूप में देता था।  

हाँ बाद में जब यह कुप्रथा बनी तो क़ानून बनाकर उसे दूर करने में हिन्दू समाज आगे बढ़ा और हर कुरीति के खिलाफ आगे बढ़ रहा है। स्पष्ट है कि एक तरफ कथित जहेज़ वाला समाज है, जिसमें जहेज़ ही केवल नहीं है बल्कि चार निकाह भी किए जा सकते हैं।

एक समुदाय एक ओर जिसमें दो लोग एक सामजिक समझौते के अंतर्गत एक रिश्ते में आते हैं एवं एक ओर बहुसंख्यक समाज है जिसमें विवाह को संस्कार माना जाता है, जिसे अपनी सुविधानुसार अहंकार के चलते तोड़ा नहीं जा सकता है।

अत: दोनों को एक ही कसौटी पर नहीं रखा जा सकता एवं तुलना नहीं की जा सकती है। आयशा की दुखद आत्महत्या के लिए वह समाज तो कतई भी लज्जित नहीं अनुभव कराया जाना चाहिए जिसमें विवाह को एक संस्कार माना जाता है।

दहेज़ विरोधी क़ानून: मुस्लिमों पर लागू नहीं:

आयशा के अब्बू ने बहुत भावुक होकर कहा कि हम हर मामले पर हिन्दू मुस्लिम करते रहते हैं, यहाँ पर सभी बेटियों की बात हो रही है।  यह सच है कि हर मामले पर हिन्दू मुस्लिम होता है, तो इस पर होगा ही, क्योंकि यह मामला पूरी तरह से मुस्लिम पहचान और मुस्लिम कुरीति से जुड़ा मामला है। 

आयशा के अब्बू ने कहा कि जहेज़ पर कोई क़ानून क्यों नहीं बनता? तो वह यह भूल गए कि भारत में एक दहेज़ विरोधी क़ानून पहले से ही है। और आज से नहीं है वह, तो काफी पहले से है, पर हाँ चूंकि मुस्लिम समाज भारतीय क़ानून के स्थान पर अपने पर्सनल लॉ बोर्ड पर विश्वास करता है।

तो शायद वह इस दायरे में नहीं है। 1961 में बना भारतीय दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम कहता है कि यह क़ानून उन व्यक्तियों पर लागू नहीं होगा जो मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दायरे में आते हैं।

क्या आयशा के अब्बू को यह नहीं पता कि उनकी आयशा को मारने वाले और कोई नहीं खुद उनके समुदाय के ही आदमी हैं? 

अब आते हैं ओवैसी के भावुक भाषण पर जिस पर हमारी पत्रकार बिरादरी टूट कर गिर पड़ी है, क्या वह नहीं जानते कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में आने वाले मुस्लिम समाज को दहेज़ विरोधी अधिनियम में शामिल नहीं किया जा सकता है? जब वह यह अपील कर रहे थे तो क्या वह माँग नहीं कर सकते कि जैसे हिन्दुओं में दहेज प्रथा को रोकने को  लेकर क़ानून आया है, वैसे ही मुस्लिमों के लिए भी आए? भावुकता बहुत सही चीज़ है, राजनीति के लिए ठीक है, आयशा के अब्बू के आंसू दिखाने के लिए ठीक है, पर समाधान के लिए भावुकता नहीं होती।

आखिर मुस्लिम समाज के युवकों से या युवतियों से इस जहेज के खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठती? आखिर क्यों जब कुछ मुस्लिम महिलाओं की माँग पर तीन तलाक के खिलाफ क़ानून बनाया था तो यही ओवैसी साहब कुछ और बोल रहे थे? 

यह जैसे धमका रहे थे कि हमारे पर्सनल लॉ में छेड़छाड़ न की जाए? क्योंकि उन्हें आयशा जैसी लड़कियों के आंसू नहीं दिखते। यदि कोई दोषी हैं तो वह है, तुष्टिकरण करने वाले नेता जिन्होनें आज तक उस समाज को उसी कुँए में रहने दिया,  बल्कि पर्सनल लॉ बोर्ड बनाकर और भी गहरे कुँए में डाल दिया।

अब प्रश्न आयशा के अब्बू से, वह कह रहे हैं कि इस्लाम में जहेज़ नामकी कोई चीज़ नहीं होती! सही है नहीं होती और मेहर होती है। जिसमें लड़की को तलाक के समय मिलने वाली रकम होती है। यदि जहेज़ नहीं है इस्लाम में, तो क्या आपने इस्लाम विरोधी काम किया? 

यह सवाल हर उस मुस्लमान से है जो बार बार यह कहता है कि इस्लाम में तो जहेज नहीं है। तो यदि आप जहेज़ ले रहे हैं तो क्या आप अपने ही खुदा का अपमान कर रहे हैं? क्योंकि आज जहेज़ हर निकाह का हिस्सा है। 

मुद्दा जहेज़ नहीं है:

आयशा के मामले में जहेज़ दूसरी बात है, पहली जो बात है जिसने उसे इस हद तक जाने पर मजबूर कर दिया, वह थी अपने पति की बेवफाई। वह किसी हिन्दू परिवार की बेटी या बहू नहीं थी जहाँ पर परस्त्रीगमन के लिए उसे परिवार या कानून से दंड मिले।

वह जिस समुदाय का हिस्सा है वह अपने ही पर्सनल लॉ बोर्ड से संचालित होता है, जिसमें कानूनन चार निकाह की अनुमति है। जिस समुदाय में चार निकाह की अनुमति है, उसमें पति बेवफा कैसे हुआ?  

किसी भी ऐसे समुदाय में कोई लड़की बेवफाई की बात कैसे कह और कर सकती है जब उनका पर्सनल लॉ बोर्ड ही चार निकाह के पक्ष में है?  पति की बेवफाई कैसे और कौन साबित कर सकती है?

हाँ यदि चार निकाह हो जाते और चारों के होते यदि पांचवा निकाह पति करता तो जरूर यह मामला बेवफाई का हो सकता था। यदि आयशा के लिए इन्साफ की बात हो रही है तो दोषी कौन है, यह तो तय कीजिए?

इसमें मुद्दा है चार निकाह का! एक से ज्यादा निकाह का। जहेज़ तो दूसरी बात है!  कई ऐसे परिवार हैं जिनमें जहेज़ लिया जाता है और लड़की को खुश रखा जाता है।

पर यहाँ पर तो जहेज़ से ज्यादा पति का आयशा के सामने गर्लफ्रेंड से बात करने वाला मामला है। जो कानूनन एक समय में चार औरतें रखने की इजाजत देता है, वह महज़ एक और औरत के आने को गलत क्यों ठहराएगा? और पर्सनल लॉ बोर्ड तो अपने कानूनों में किसी भी तरह के बदलाव न करने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा चुका है।

ऐसे में जो लोग फेसबुक पर आयशा के लिए आंसू बहा रहे हैं, उन्हें यह तो बताना होगा न कि वह आंसू किसके खिलाफ बहा रहे हैं। जिस समुदाय में बच्चा यह देखकर बड़ा होगा कि वह चार निकाह कर सकता है, तो क्या एक बीवी के आने के बाद वह दूसरी बीवी क्यों नहीं रख सकता? और जब जहेज़ के खिलाफ फ़तवा तक जारी हुआ है तो जहेज़ क्यों लिया?

आयशा की मौत एक दुखद हादसा है, पर वह कई सवाल पैदा करती है? यह ओवैसी जी से यह सवाल करती है कि कब तक उसके समुदाय की औरतें चार निकाहों के बीच दबकर रहती रहेंगी? कब तक वह उसी काले क़ानून में रहेंगी?

मुद्दा जहेज़ नहीं है, मुद्दा औरत के अधिकार का है, जिसमें वह केवल और केवल एक ही सवाल पूछ रही है, सभी से अपने अब्बू से और ओवैसी जैसे नेताओं से कि कब आप औरत को इंसान समझेंगे?

कब तक वह केवल संख्याओं में गिनी जाती रहेगी?  जहेज़ के खिलाफ तो फतवा भी जारी किया गया है:

जो हुआ उसके लिए समग्र या बहुसंख्यक समाज कैसे दोषी?

जैसे ही आयशा का यह वीडियो आया वैसे ही रोने वालों की लाइन लग गयी। उनमें से किसी ने भी प्रश्न नहीं उठाया कि आखिर पति ने बेवफाई क्यों की? बस यही कहा जाने लगा कि हाय आयशा, ज़िन्दगी खूबसूरत थी, नहीं जाना था।

ज़िन्दगी खूबसूरत बनाने का काम उसके समुदाय और परिवार का था, जो उन्होंने नहीं किया। उसके लिए पूरे समग्र समाज को क्यों कोसना? क्या बहुसंख्यक समाज अर्थात हिन्दू समाज इस पूरे मामले में कहीं शामिल है? आज से सदियों पहले जिन्होनें अपना मज़हब बदल लिया तो जाहिर हैं उन्होंने अपने नियम कायदे सब बदल लिए।

तो जब आप हमसे अलग हो गए, अपने नियम अलग अपना लिए, जिसमें बहुत अच्छाइयां थीं, तो ऐसे में जब आपकी संतानें उन कथित अच्छाइयों का फल देख रही हैं, तो उसके लिए समग्र समाज कैसे दोषी हुआ? समग्र समाज को आप कैसे कोस सकते हैं?

उसने दो कारणों से आत्महत्या की, पति की बेवफाई जिसके लिए कोई सजा नहीं है, बल्कि यह अपराध भी नहीं है, जबकि हिन्दू धर्म में यह अपराध है। क्योंकि फेरे लेते समय यह वचन वह अपनी पत्नी को देता है कि वह एक पत्नी धर्म का पालन करेगा।

यहाँ तक कि भारत सरकार भी हिन्दू पुरुष को एक पत्नी तक ही सीमित कर देती है। तो ऐसे में बेचारा समग्र हिन्दू समाज कैसे उसके पति की कथित बेवफाई के लिए दोषी हुआ और दूसरा जहेज़! फिर वही बात कि जब आपका समुदाय दहेज़ विरोधी क़ानून के परिदृश्य से बाहर है तो अपने ठेकेदार नेताओं को दोषी ठहराने के बजाय आप पूरे हिन्दू समाज को दोषी ठहराने लगे? यह तो हद्द है!

आत्महीनता की यह ग्रंथि कब तक हावी रहेगी भाई?  मैं उस संस्कृति से हूँ जिसमें शिव और शक्ति हैं, विष्णु और लक्ष्मी हैं, राम सीता है!  हमारे यहाँ मर्दों की पसली से औरत नहीं निकली है जो केवल उसका ध्यान रखने के लिए और मनोरंजन के लिए है!

हमारे यहाँ पर वह शक्ति है, यदि आप उस शक्ति को अनुभव नहीं करना चाहती हैं तो यह आपका अंधापन है, हमारा नहीं! यदि आप उस शक्ति स्वयं में नहीं समाहित करना चाहती हैं तो यह आपका दुर्भाग्य है, हमारा नहीं!

परन्तु, जो समुदाय अपनी कुरीतियों के लिए खड़ा नहीं हो रहा है, उसके लिए कम से कम यह उम्मीद न करें कि हम अपने परिवार और समाज को धिक्कारने लगें, नहीं कदापि नहीं!

और आत्महत्या को ग्लैमराईज करके आप अपने बच्चों को भी उसी राह पर धकेल देती हैं, हमारे हिन्दू परिवारों में यही सिखाया जाता था कि मरना किसी समस्या का हल नहीं है, क्योंकि यदि हम अपनी इच्छा से इस जगत में नहीं आते तो जा कैसे सकते हैं।

लड़ो, क्योंकि राम ने भी जीवन का युद्ध स्वयं ही लड़ा था, लड़ो क्योंकि स्वयं देवी ने भी संग्राम स्वयं किया था, लड़ो क्योंकि शिवाजी ने स्वयं ही कदम उठाया था, लड़ो क्योंकि रानी लक्ष्मीबाई ने लौ जलाई थी, लड़ो क्योंकि अर्जुन ने कृष्ण का साथ होने पर भी युद्ध स्वयं ही लड़ा था!

लड़ो क्योंकि जाना सभी को है, पर हारकर नहीं! जीतकर, चाहे जीत कितनी भी बड़ी हो! और कोई भी व्यक्ति या मामला तुम्हारे जीवन से बड़ा नहीं है, इसलिए स्वयं को जीवित रखना ही तुम्हारी जिम्मेदारी है!

जब आप ऐसे परिवार से हों, ऐसे धर्म से हों, जिसमें ऐसे महापुरुषों ने स्वयं जन्म लिया है, तो कम से कम मैं न ही आत्महत्या को ग्लोरिफाई कर सकती हूँ और न ही तरस खा सकती हूँ,

जो लोग अभी आयशा के अब्बू के साथ हैं, वही लोग “मुसलमानों के साथ अन्याय कर रही है सरकार” का बोर्ड लेकर आएँगे, यदि सरकार मुस्लिमों के एक से अधिक निकाह पर रोक का क़ानून लाती है। ओवैसी साहब जो आज भावुक होकर रो रहे हैं, वही दहाड़ेंगे और जो आज आयशा का वीडियो शेयर कर रहे हैं, उनके आंसू तो सोचियेगा भी नहीं

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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