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ऋषि कहते हैं, मेरी वाणी मेरे मन में ठहर जाए!

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जो हम चारों तरफ बोलते रहते हैं, वह धीरे— धीरे हमारा व्यक्तित्व बन जाता है। आपको भी बिना गवाह के पक्का नहीं हो सकता कि आप जो बोल रहे हैं वह सही है या झूठ। ऋषि कहता है, मेरी वाणी मेरे मन में स्थिर हो जाए मेरी वाणी मेरे मन के अनुकूल हो जाए, मेरे मन से अन्यथा मेरी वाणी में कुछ न बचे। जो मेरे मन में हो, वही मेरी वाणी में हो। मेरी वाणी मेरी अभिव्यक्ति बन जाए। मैं जैसा हूं भला और बुरा।

मैं जो भी हूं वही मेरी वाणी से प्रकट हो। मेरी तस्वीर मेरी ही तस्वीर हो, किसी और की नहीं। मेरा चेहरा मेरा ही चेहरा हो, किसी और का नहीं। मैं आथेंटिक, प्रामाणिक हो जाऊं। मेरे शब्द मेरे मन के प्रतीक बन जाएं। बहुत कठिन बात है। अपने को छिपाना हमारी जीवनभर कोशिश है, प्रकट करना नहीं। और जब हम बोलते हैं तो जरूरी नहीं कि कुछ बताने को बोलते हों।

बहुत बार तो हम कुछ छिपाने को बोलते हैं, क्योंकि चुप रहने में कई बातें प्रकट हो जाती हैं। अगर आप किसी के पास बैठे हैं और आपको उस पर क्रोध आ रहा है, अगर आप चुप बैठे रहें तो प्रकट हो जाएगा। अगर आप पूछने लगें, मौसम कैसा है? तो वह आदमी आपकी बातचीत में लग जाएगा और आप भीतर सरक जाएंगे। अगर आप चुपचाप बैठे हैं, तो आपकी असली शकल ज्यादा देर छिपी नहीं रह सकती।

अगर आप बातचीत कर रहे हैं, तो आप धोखा दे सकते हैं। बातचीत एक बड़ा पर्दा बन जाती है। और जब हम बातचीत मै कुशल हो जाते हैं, जब हम दूसरे को धोखा देने में कुशल हो जाते हैं, तो अंतत: हम अपने को धोखा देने में सफल हो जाते हैं।

ऋषि कहता है, मेरी वाणी मेरे मन में ठहर जाए।

मैं जो हूं वही मेरी वाणी में हो, अन्यथा नहीं। कठिन होगी साधना। इसीलिए तो प्रार्थना करता है; क्योंकि वह भी जानता है, यह साधना कठिन है। परमात्मा साथ दे तो शायद हो जाए। अस्तित्व साथ दे तो शायद हो जाए। समस्त शक्तियां अगर साथ दें तो शायद हो जाए। अन्यथा कठिन है।

फिर दूसरी बात कहता है कि… मेरी वाणी मेरे मन में ठहर जाए; दूसरी बात कहता है, मेरा मन मेरी वाणी में ठहर जाए। यह और भी कठिन है। मन का वाणी में ठहरने का अर्थ यह है कि जब मैं बोलूं तभी मेरे भीतर मन हो! और जब मैं न बोलूं तो मन भी न रह जाए। ठीक भी यही है। जब आप चलते हैं तभी आपके पास पैर होते हैं। आप कहेंगे, नहीं, जब नहीं चलते हैं तब भी पैर होते हैं।

लेकिन उनको पैर कहना सिर्फ कामचलाऊ है। पैर तो वही है जो चलता है। आंख तो वही है जो देखती है। कान तो वही है जो सुनता है। तो जब हम कहते हैं अंधी आंख, तो हम बड़ा गलत शब्द कहते हैं, क्योंकि अंधी आंख का कोई मतलब ही नहीं होता। अंधे का मतलब होता है, आंख नहीं। आंख का मतलब होता है आंख, अंधे का मतलब होता है आंख नहीं। लेकिन जब आप आंख बंद किए होते हैं तब भी—आप आंख का उपयोग अगर न कर रहे हों तो—आप बिलकुल अंधे होते हैं। आंख का जब उपयोग होता है तभी आंख आंख है। functional हैं, सब नाम functional , उनकी क्रियाओं से जुड़े हुए हैं।

एक पंखा रखा हुआ है, तब भी हम उसे पंखा कहते हैं। कहना नहीं चाहिए। पंखा हमें उसे तभी कहना चाहिए जब वह हवा करता हो। नहीं तो पंखा नहीं कहना चाहिए। तब वह सिर्फ बीज रूप से पंखा है। उसका मतलब यह है पंखा कहने का कि हम चाहें तो उससे हवा कर सकते हैं। बस इतना ही।

लेकिन अगर आप एक पुट्ठे की दस्ती उठाकर हवा करने लगें तो दस्ती पंखा हो जाती है। अगर आप एक किताब से हवा करने लगें तो किताब पंखा हो जाती है। और अगर मैं किताब फेंककर आपके सिर में मार दूं तो किताब पत्थर हो जाती है। सब चीजों का नाम functional है। लेकिन अगर हम इस तरह नाम चलाएं तो बहुत मुश्किल हो जाए। इसलिए हम फिक्स, स्थिर नाम रख लेते हैं।

जब वाणी के लिए जरूरत हो बोलने की, तभी मन को होना चाहिए बाकी समय नहीं होना चाहिए। पर हम तो ऐसे हैं कि कुर्सी पर बैठे रहते हैं तो टांगें हिलाते रहते हैं। कोई पूछे कि क्या कर रहे हैं आप, तो रुक जाते हैं। क्या करते थे आप? बैठे—बैठे चलने की कोशिश कर रहे थे या टागें आपकी पागल हो गई हैं? ठीक ऐसे ही हम बोलते रहते हैं। ठीक ऐसे ही, बाहर कोई जरूरत नहीं रहती है वाणी की तो वाणी भीतर चलती रहती है। बाहर नहीं बोलते तो भीतर बोलते हैं। दूसरे से नहीं बोलते, तो अपने से बोलते रहते हैं।

ऋषि कहता है, मेरा मन भी वाणी में स्थिर हो जाए।

यह पहली बात से ज्यादा कठिन बात है। इसका अर्थ है, जब मैं बोलूं तभी मन हो, जब मैं न बोलूं तो मन भी न हो जाए, मन भी न हो। जैसे, जब बैठूं तो पैर न चलें, जब सोऊं तब शरीर खड़ा न हो, ऐसे ही जब चुप हो जाऊं तो मन भी शांत और शून्य हो जाए। पहले से शुरू करना पड़ेगा। जिसने पहला नहीं किया, वह दूसरा न कर पाएगा। पहले तो वाणी को मन में ठहराना पड़े। उतना ही रह जाने दें वाणी को जितना मन के, स्वभाव के अनुकूल है, बाकी हट जाने दें। बाकी सब झूठ गिर जाने दें।

बहुत कम बचेगी वाणी। अगर आप मन में वाणी को घिर करें तो नब्बे प्रतिशत वाणी विलीन हो जाएगी, विदा हो जाएगी। नब्बे प्रतिशत तो व्यर्थ है। और उस व्यर्थ से कितना उपद्रव पैदा होता है और जीवन कैसा उलझता चला जाता है, उसका हिसाब लगाना कठिन है। दस प्रतिशत बचेगी, टेलीग्रैफिक बच जाएगी। जब वाणी मन में ठहरती है तो टेलीग्रैफिक हो जाती है, तो वह संक्षिप्त हो जाती है। ये उपनिषद ऐसे ही लोगों ने लिखे हैं। इसलिए बड़े छोटे में हो जाते हैं। संक्षिप्त हो जाता है सब। सारभूत रह जाता है —निचोड़।

जो भी अनावश्यक है, वह हट जाता है। यह पहले करना जरूरी है, अगर दूसरी बात करनी हो। पहले वाणी काटनी पड़ेगी व्यर्थ। जब सार्थक वाणी रह जाएगी तो व्यर्थ मन के रहने की कोई जरूरत नहीं। जब जरूरत होगी, तब आप बोल देंगे।

ओशो
निर्वाण उपनिषद01

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