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विश्व को गांधी नहीं , महायोगी गोरखनाथ और परशुराम की जरूरत है!

आदित्य जैन। अमेरिकी लेखक, दार्शनिक और इतिहासकार विल ड्‌यूरेन्ट अपनी पुस्तक ” द स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन, वॉल्यूम टू , अवर ओरिएंटल हेरिटेज” में लिखते हैं कि आधुनिक विश्व के छात्र को इससे बढ़कर लज्जा और किसी बात से नहीं होनी चाहिए कि भारत के संबंध में उसकी जानकारी बहुत कम और अधूरी है।

पॉल ब्रंटन अपनी पुस्तक ” ए सर्च इन सीक्रेट इंडिया ” में भारत के महान योगियों की खोज की यात्रा को वर्णित करते हैं। अनेक यूरोपीय वैज्ञानिक – चिंतन पद्धति और दृष्टिकोण को सीखने के लिए – उपनिषदों की महत्ता को स्वीकार करते हैं लेकिन भारतीय लोग भारत से परिचित ही नहीं होना चाहते हैं । वह आज भी मानसिक रूप से गुलाम बने रहना चाहते हैं। इस वैचारिक गुलामी के जाल से ही भारत रूपी सोने की चिड़िया को विदेशियों ने  अपने चुंगल में फसा लिया ।

भारत ” सोने की चिड़िया ” था , इसीलिए आक्रान्ताओं द्वारा लूट लिया गया , शिकार कर लिया गया। आज भारत को ” सोने का शेर ” बनने की आवश्यकता है । जिसकी खाल में आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक उत्कर्ष की इतनी मोटाई हो कि कोई भी तीर , गोली उसका शिकार न कर सके ; बल्कि उसकी गर्जना से साम्राज्यवादी , उपभोक्तावादी , राष्ट्र विरोधी शक्तियों की रूह कांप जाए ।

इसके लिए भारतीय शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल रूपांतरण की आवश्यकता है। एक ऐसी शिक्षा जो विद्यार्थी को रचनात्मक, सृजनात्मक चिंतन के लिए प्रेरित करे। विद्यार्थी नया सोचे। समाज के हित हेतु नए समाधानों और दृष्टिकोणों को प्रस्तुत करें। विद्यार्थियों में बहुआयामी चिंतन के विकास के लिए हमे उन्हें विभिन्न व्यक्तियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से परिचित कराना होगा। इसीलिए उनके अध्ययन में विविधता को शामिल करना होगा। उनसे कहना पड़ेगा कि मोहन दास करमचंद गांधी जी को भी पढ़ो और नाथ परंपरा के महायोगी गोरखनाथ जी को भी पढ़ो।

गांधी के साथ गोरख को पढ़ो । कालिदास के साथ कृष्ण को पढ़ो। राजा पृथु के साथ परशुराम को पढ़ो। “सभी विषयों की जननी” दर्शनशास्र के साथ “सभी विषयों के पिता” इतिहास को पढ़ो। गांधी देश की चेतना में अहिंसा व शौर्यविहीन नपुंसकता लाएंगे तो कृष्ण उस अर्जुन रूपी नपुंसकता को शौर्य में बदलेंगे। गोरखा रेजिमेंट का नाम सुना है? कई देशों के सैनिक थर – थर कांपते हैं गोरखाओं का नाम सुनकर ! गोरखा रेजिमेंट आज भी पूरे विश्व में अदम्य साहस व शक्ति का प्रतीक मानी जाती है। गोरखा महायोगी गोरखनाथ के वंशज हैं। इसलिए गोरख को पढ़ो।

कालिदास मानव के एहसासों को सभी प्रकार के रस देंगे तो परशु उन रसों को यथार्थ प्रतिशोध की अग्नि में भाप बनाकर उड़ा देंगे । महर्षि रमण के साथ चार्वाक को पढ़ो। एक भीतर गहरा जाएगा। एक बाहर लंबा जाएगा। जब न पढ़ो तो चिंतन करो या शून्य में स्थित रहो जैसे बुद्ध के शिष्य नागार्जुन रहते थे और जिसे विवेकानंद डायनमो ऑफ़ एनर्जी कहते थे। बस घर में यूं ही आलस में पड़े मत रहो । यूट्यूब में माथा मत मारो । फेसबुक में केवल दूसरे की वैचारिक विष्ठा मत चाटो। इंस्टाग्राम की जगह मिल्टन, कीट्स, वर्डसवर्थ, अज्ञेय, टैगोर जैसे साहित्यकारों के मस्तिष्क के चित्रों को उनकी कविताओं में देखो।

मोहन दास करमचंद गांधी , एक ऐसे संशयग्रस्त अर्जुन थे ; जिन्हें पूरे जीवन भर कोई कृष्ण नहीं मिल पाया और न वे अपने संशय को और अपनी दुर्बलता को समझ पाए । इसीलिए पूरे जीवन भर नवजीवन, हरिजन, अमृतबाजार पत्रिका आदि में जो सैकड़ों की संख्या में लेख लिखे, उसमे अपने दृष्टिकोणों , रणनीतियों को बदलते रहे और अपने को सामाजिक रूप से संतुलित भी नहीं रख पाए। 

आज भारत में सबसे अधिक कोई अप्रासंगिक व्यक्तित्व हैं तो वे गांधी हैं जिन्होंने हिन्दुओं को अहिंसा से  कायर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी  और अगर अहिंसा को ही समझना है तो महावीर के जिन सूत्रों को पढ़ना , जानना , समझना अधिक श्रेयस्कर रहेगा। आज गांधी की नहीं ” गोरख ” की जरूरत है । आज गांधी के बंदरों की नहीं , गायत्री मां के सिंहो की जरूरत है। भारत देश के विद्यार्थियों को गांधी जी के बारे में सभी दृष्टिकोणों से परिचित कराना आवश्यक है। गांधी के साथ सभी महापुरुषों के जीवन को समग्रता पूर्वक देखने की कला हमारे विद्यार्थियों में आनी चाहिए। गांधी से ज्यादा समग्र दृष्टि योगी गोरखनाथ में है।

शास्त्र के साथ शस्त्र, माला के साथ भाला, योग के साथ युद्ध, प्रेम के साथ परशु , शास्त्रार्थ के साथ अखाड़ा , सहयोग के साथ संहार, प्रार्थना के साथ पुरुषार्थ की परंपरा को मानने वाले गोरखनाथ के चरित्र में अद्भुत संतुलन मिलता है। वह भीतर से पूर्ण शांत तथा बाहर से पूर्ण सक्रिय रहने की बात करते हैं। वह अरिहंत बनने के बाद ही अहिंसा धारण करने की बात स्वीकार करते हैं। अरिहंत अर्थात जिसने अपने सभी शत्रुओं ( अरि ) का हनन ( हंत ) कर दिया हो। जब तक शत्रु है, तब तक अहिंसा को अपनाना अयथार्थ दृष्टि को ही पोषित करता है ।

क्या भारत में अहिंसा के खाल में छुपी हुई कायरता को इतना महत्व दिया गया था ? भारत के प्रत्येक आदर्श , महापुरुष , देवी – देवता की प्रतिमाएं पराक्रम का प्रतीक हैं। राम जी के हाथों में धनुष हैं । कृष्ण के पास सुदर्शन चक्र है ।परशुराम के पास परशु है । महादेव के पास त्रिशूल है । शस्त्र के साथ शास्त्र भी है। राम के हाथों में धनुष शस्त्र भी है और उन्होंने योग वाशिष्ठ नामक शास्त्र भी रचवाया है। । कृष्ण ने सुदर्शन चक्र भी चलाया है और उपनिषदों के सार को  गीता नामक शास्त्र के रूप में उपदेश भी दिया है ।

परशुराम के गुरुकुल में वैदिक संहिता को कंठस्थ भी करवाया जाता है और विभिन्न शस्त्र विद्याओं की भी शिक्षा दी जाती है।  महादेव त्रिशूल भी चलाते हैं ; तांडव भी करते हैं, शिव सूत्र भी देते हैं  और विज्ञान भैरव तंत्र के रूप में दुर्लभ शास्त्र भी प्रदान करते हैं। भारत के साहस को नपुंसक बनाने में बुद्ध की शिक्षाओं की ग़लत व्याख्या और गांधी जी की अहिंसा की ग़लत व्याख्या ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। गांधी को राजनेताओं ने अपनी स्वार्थ – सिद्धि के लिए इस्तेमाल किया और उनकी अहिंसा रूपी कायरता को प्रत्येक भारतवासी के मन में बैठाने का प्रयास किया । 

इसीलिए आज महायोगी गोरखनाथ, पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप, सुभाष चन्द्र बोस, वीर सावरकर आदि पराक्रमी पुरुषों की गाथाओं को भी प्रचारित – प्रसारित करने के महती आवश्यकता है। गोरख शांति व शौर्य, शास्त्र व शस्त्र , माला व भाला, योग व युद्ध, प्रेम व परशु , शास्त्रार्थ व अखाड़ा, सहयोग व संहार, प्रार्थना व पुरुषार्थ के एक साथ, एक समय में जीवंत प्रतिनिधि हैं। इसीलिए  विश्व को आज  महात्मा गांधी की नहीं ,  महायोगी गोरखनाथ की जरूरत है । गोरखनाथ की तरह ही महापराक्रमी परशुराम जी का भी नाम आता है ।

जैसे प्याज की कई परतें होती हैं, जैसे पृथ्वी की सतह से केंद्र तक जाने पर कई परतें मिलती हैं ; जैसे पृथ्वी की सतह से अंतरिक्ष तक जाने पर कई परतें मिलती हैं। वैसे ही मन की भी कई परतें होती हैं ।प्रथम तीन भौतिक परतें हैं और मन की परत भौतिक नहीं बल्कि सूक्ष्म है, दिखाई नहीं पड़ती है , लेकिन महसूस की जा सकती है। योग के माध्यम से मन की सारी परतों की शक्ति जागृत की जा सकती है । स्वयं का स्वयं में जागरण किया जा सकता है । पतंजलि द्वारा पुनर्जीवित की गई योग विधि से सीखिए, ओशो से सीखिए। 

महावीर स्वामी अब प्रवचन देने नहीं आएंगे और न ही कुरीतियों को दूर करने के लिए कोई सामाजिक – आध्यात्मिक आंदोलन चलाएंगे।  आप भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण के इंतज़ार में भी मत बैठे रहिए। श्री राम चन्द्र जी भी भारत के लोगों को अपने आचरण से मर्यादा , साहस , शौर्य , राज धर्म आदि  की शिक्षा दे चुके हैं । जिसकी अभिव्यक्ति भारत भूमि की लोक कथाओं , लोक संस्कृति और लोक व्यवहार में अभिव्यक्त होती है । न तो आप प्रह्लाद जैसी भक्ति रखते हैं और न ही आज हिरण्यकश्यप जैसे दुष्ट राजा हैं, इसलिए नर सिंह भगवान भी प्रकट नहीं होंगे ।

कल्कि अवतार की शब्दावली में छुपे रहस्य को हम अभी तक समझ ही नहीं पाए हैं और विष्णु भगवान अभी तक नौ अवतार ले चुके हैं तो उन्हें दसवीं बार हमें परेशान नहीं करना चाहिए। आज के लोग दुष्टता भी शिष्टता के साथ करते हैं। अपराध भी बड़ी ईमानदारी व सम्मान के साथ करते हैं। ऐसे ही अपराधों को व्हाइट कॉलर क्राइम कहा जाता है। ऐसे अपराधियों का समाज व देश के शक्तिशाली लोगों , समूहों से संपर्क होता है।  ऐसे अपराधियों के लिए परशुराम की आवश्यकता है। लेकिन परशुराम का जागरण हमें स्वयं से  स्वयं में  ही करना होगा। परशु राम शास्त्र और शस्त्र दोनों में सिद्ध हस्त थे।

परशुराम कोई एक ही व्यक्ति नहीं हैं , बल्कि शस्त्र समन्वित शास्त्र की एक परंपरा हैं ।राम ने धनुष तोड़ा तो परशुराम आए । कर्ण को धनुर्विद्या सिखाने के लिए परशुराम आए । भारतवर्ष को कई बार हिंसक क्षत्रियों से मुक्त किया । ये सारे परशुराम ; एक सिद्धपीठ की महान परंपरा के वाहक हैं । जनक कोई एक व्यक्ति नहीं हैं, बल्कि शासन समन्वित आत्म ज्ञान की एक परंपरा हैं। सीता के पिता जनक हैं। ऋषि अष्टावक्र  से संवाद करने वाले भी जनक हैं।

राम की मर्यादा पालन सभ्य समाज के लिए है । जब मर्यादा को कमजोरी समझा जाने लगे तो राम को धनुष उठाना पड़ता है और जब धनुष उठाकर भी कुछ दुष्ट लोग अपने अत्याचारों को बंद ना करें तो फिर राम को परशु भी उठाना पड़ता है । धनुष से केवल दुष्ट व्यक्ति मरता है , रावण मरता है , विभीषण व लंका बची रहती है । लेकिन परशु से दुष्ट व्यक्ति के साथ परिवार , उसका राज्य भी ख़तम हो जाता है । राम , कृष्ण , परशुराम , वामन आदि हमें युद्ध करने की तकनीक व मनोविज्ञान भी सिखाती हैं।


हमें स्वयं के अंदर के गोरख और परशु को जीवित करना होगा तभी हमारी हिन्दू सभ्यता और संस्कृति बच पाएगी।

न बुद्ध वापस आएंगे ,
न महावीर देशना देंगे ,
न कृष्ण पैदा होंगे अब ,
न राम अवतार लेंगे !
न नर सिंह की गुंजाइश है ,
कल्कि भी कहीं खो गए ,
विष्णु को भी तुमसे ही आस है ,
मानव की शक्ति पर अब विश्वास है ।
प्रकट हो प्रभु परशुराम !
कि अब देर हो जायेगी ।
हिन्दू विलाप करने लगा

आकाशवाणी से थार्राया उसका अस्तित्व
आवाज़ गूंजी
तुझमें ही परशु हैं , तुझमें ही नर सिंह
तू ही सो रहा है भाई – चारा का चारा बनकर
तू ही सो रहा है छद्म सेक्युलरवाद की चादर ओढ़कर
तूने ही आंखे मूंदी है , अत्याचारों पर
तूने ही कान बंद किए हैं , शोषण के चीत्कारों पर
तू मुझसे कहता है कि
प्रकट हो परशुराम !!
गीता की शिक्षा भूल गया तू ?
अर्जुन की टंकार भूल गया तू ?
महाकाल का त्रिशूल भूल गया तू ?

ऐ ! नपुंसक अर्जुन रूपी हिन्दू ,
भूल गया तू काली को ?
भूल गया अस्त्र – शस्त्रों को ?
चक्र , गदा , शक्ति , हल , मूसल ?
खेटक , तोमर , पाश , कुंत , शारंग धनुष ?
भूल गया रण चंडी , भैरवी , चामुंडा को ?
जो जेहादी तेरे भारत मां की अस्मिता लूटे ;
उन कट्टर जेहादियों के नर मुंडो से
भारत मां का श्रृंगार कर !
उठ खड़ा हो और प्रतिकार कर !!
जगा कालरात्रि को अपने अंदर
बुला सिद्धिदात्री को अपने अंदर
भारत की नींव अब देश भक्त जवानों से नहीं
बल्कि भारत विरोधियों के शवों से भरी जाएंगी ….
जगा भीतर की शक्ति को , ना तू अब मूरख बन !
बनना है तो परशु बन या फिर महायोगी गोरख बन !

।। जयतु जय जय नाथ परंपरा ।।
।। जयतु जय जय परशु परंपरा ।।

( लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र हैं । कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध पत्रों का वाचन भी कर चुके हैं। विश्व विख्यात संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के युवा आचार्य हैं । भारत सरकार द्वारा इन्हे योग शिक्षक के रूप में भी मान्यता मिली है । साहित्य , कविता , कहानियों तथा विभिन्न पुस्तकों को पढ़ने में इनकी विशेष रुचि है। )

लेखक आदित्य जैन
सीनियर रिसर्च फेलो
यूजीसी प्रयागराज
7985924709

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