आंतकवाद का मानवाधिकार बनाम मानवाधिकार का आतंकवाद!

बाबू बेरागी। भीमा कोरेगांव से लेकर सुदूर बस्तर के सुकमा जिले तक, प्रधानमंत्री मोदी की राजीव गांधी की तरह हत्या के षड्यंत्र से लेकर माओवादियों द्वारा सुरक्षा बलों के जवानों के साथ निरीह आदिवासियों की नृशंसतापूर्वक हत्याओं तक, गला रेत कर जन अदालतें लगाकर सैकड़ों लोगों के बीच क्रूरतापूर्वक एक और एक से अधिक जीवित इंसानों को लाठी-डंडों से पीट-पीटकर मार डाला, इन हत्यारों ने मासूम बच्चों तथा छात्रों पर भी रहम नहीं किया। तब कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता सामने नहीं आया, किसी को दर्द नहीं हुआ और अब इनके पकड़े जाने पर देश के तमाम मानव अधिकार संगठनों की सक्रियता आम भारतीयों के समझ से परे है।

भीमा कोरेगांव की घटना में पकड़ाए अधिकांश आरोपियों का एक समुदाय विशेष से ताल्लुक रखना भी बेहद ही चिंता का विषय है। हालांकि मानव अधिकार शब्द का अर्थ प्रत्येक मानव के नैसर्गिक अधिकारों की रक्षा कर उसके सम्मान पूर्वक जीवन जीने में मदद करना है। लेकिन भारत के मानवाधिकार संगठनों का मात्र माओवादियों तथा आतंकवादी या सरकार विरोधी गतिविधियों में लिप्त देश के लिए खतरा बनें अपराधियों के पक्ष में किंचित मात्र में विलंब किए बिना सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच जाना वहीं दूसरी और आम गरीब जनता आदिवासी मजदूर दूरस्थ अंचलों में रहने वाले ग्रामीण जन अपने प्रकृति प्रदत्त अधिकारों के लिए लड़ते लड़ते सारा जीवन गुजार देता है कभी-कभी तो उसकी कई पीढ़ियां न्याय पाने के लिए तमाम हो जाती है लेकिन ऐसे लोगों की मदद भारत स्थित मानव अधिकार संगठनों द्वारा किया गया हो ऐसा आज तक सुनने औऱ न ही देखने में आया, यह सब बातें ही हमारे देश के मानव अधिकार संगठन और उनके कार्यकर्ताओं की क्रिया कलापों को संदिग्ध बना रही है कि आखिर यह संगठन मानव के लिए है या आतंकवादी रूपी दानवो के लिए?

प्रश्न यह उठता है कि आखिर यह मानव अधिकार संगठन चीज क्या है?

बेहद ही दुख के साथ यह कहना पड़ता है कि अमेरिकी दिमाग का उपज ये संगठन बेहद ही शातिराना तरीके से सफेदपोश का चादर ओढ़कर दुनिया के अनेक देशों में आतंकवादी गतिविधियों को प्रोत्साहित तथा आर्थिक मदद करने में सलंग्न पाया गया है ।उससे भी आश्चर्यजनक बात यह है कि यह संगठन केवल चुनिंदा मामलों में ही सक्रिय रहता है वहाँ आम लोगों के द्वारा जमीन से जुडड़ी सभी शिकायतों पर इन संगठनों के पदाधिकारी गौर करना भी लाजमी नहीं समझते लेकिन माओवादि या आतंकवादियों को मक्खी के द्वारा काट लिये जाने पर भी समूचे भारत का मानव अधिकार संगठन “ऑनलाइन” हो जाता है।

भारत की जनता के लिये एक दुःखद स्थिति यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट शहरी नक्सलियों के लिये सुरक्षा की ढाल बनती जा रही है। अयोध्या का राम मंदिर विचाराधीन है, और भी लोकहित से जुड़े कई मामले कोर्ट में लम्बित हैं किंतु उग्रवादी संगठनों को बौद्धिक कवरेज देने वाले लोगों के मामले में शिकायत और सुनवायी एक ही दिन में हो जाती है। कल मामला पेश हुआ और कल ही उस पर सुनवायी भी हो गयी। साध्वी प्रज्ञा के मामले में वर्षों तक विचारण होता रहा । क्या यह मान जाय कि माननीय शीर्ष न्यायालय की दृष्टि में उग्रवादियों से सम्बंधित मामले अधिक प्राथमिकता से सुने जाने योग्य हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने लोकतंत्र की सुरक्षा के लिये विरोध और असहमति को सेफ़्टी वॉल्व की तरह आवश्यक माना है। यह सही भी है, किंतु इस सिद्धांत को सिलेक्टिव नहीं होना चाहिये। उग्रवादियों के मामले में इनके बौद्धिक धड़े के प्रति सुप्रीम कोर्ट की त्वरित कार्यवाही आम जनता के लिये एक सपना ही है । क्या वर्षों से लम्बित उसके मामलों में भी कोई कोर्ट इतनी ज़ल्दी सुनवायी करेगी ? न्याय पाने का अधिकार हर किसी को है किंतु किसी को तुरंत और किसी को वर्षों बाद भी नहीं, लोग मर जाते हैं! केस चलता रहता है। यह विसंगति और पक्षपात अदालतों के प्रति आम आदमी को संदेह से भर देती है। कहीं ऐसा न हो कि आम आदमी भी अपना विरोध प्रकट करने का मन बना ले और माननीय न्यायालयों की कार्यप्रणाली के विरोध में सेफ़्टी वॉल्व बन जाय!

साभार: बाबू बेरागी, बस्तर

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