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सफ़ेद पश्चिम का काला दाग है डायन प्रथा

Sonali Misra. झारखंड के साथ साथ आपको कई ऐसे स्थानों पर बार बार डायन और चुड़ैल का उल्लेख आता है जहाँ पर मिशनरी अभी तक भोले भाले वनवासियों को ईसाई नहीं बना पाई हैं और धर्मांतरण का धंधा जोरो पर है।

डायन प्रथा, जिसके आधार पर भारत को वामपंथी लेखक पिछड़ा बताते हैं, और जिसके आधार पर वामपंथी लेखक हिन्दुओं को गाली देते हैं, वह प्रथा भारत में तब तक थी ही नहीं जब तक इन पिछड़े यूरोपियों ने कदम नहीं रखे थे। भारत भूमि पर शक्तिस्वरूपा स्त्री हुआ करती थी, डायन शब्द ही नहीं था।

मुगल काल तक, जब इतने अत्याचार भारत की महिलाएं झेल रही थीं, वह धर्म के नाम पर या तो संघर्ष कर रही थीं या फिर वह लिख रही थीं, वह  अपने ही समाज के विरोध में कभी नहीं थी, वह पुरुषों से कंधा मिलाकर संघर्ष कर रही थीं, फिर डायन कब से होने लगीं? क्या यह हमारे समाज के प्रति कोई और षड्यंत्र था? क्या यह हमारे धर्म के विरुद्ध कोई कदम था? नहीं तो 1857 से पूर्व या कहें मिशनरियों के वनवासियों में प्रवेश के बाद ही क्यों आया?  एक प्रश्न किया जाना चाहिए, कि भारत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए एवं हिन्दू धर्म को बदनाम करने के लिए यह एक बड़ा षड्यंत्र रचा गया।  

THE ACADEMIC JOURNEY OF WITCHCRAFT STUDIES IN INDIA नामक पेपर में शमशेर आलम और आदित्यराज अपने कई तर्कों से यह प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं कि भारत में यह कुप्रथा वास्तव में पश्चिम से आई थी। और वह यह गलत नहीं कहते हैं। क्योंकि पश्चिम का इतिहास जहाँ एक ओर अंधविश्वासों से भरा हुआ है, तो वहीं हमारा इतिहास विज्ञान एवं धर्म दोनों को व्यक्त करता है।  

पश्चिम का काला इतिहास और स्याह हो जाता है जब हम उसके डायन वाले मामलों को देखते हैं।  WITCH HUNTING AND WITCH TRIALS में C। L’ESTRANGE EWEN लिखते हैं कि विचक्राफ्ट अर्थात डायन और काले जादू के कई और चरण इंग्लैण्ड में काफी समय से प्रचलित रहे हैं।

हर समय काले जादू को जनता के लिए बहुत खतरनाक माना जाता रहा था और इन्हें धार्मिक और न्यायिक अदालतों में दण्डित किया जाने लगा था। बाइबिल की ओर से चर्च आँख मूँद कर यह कहता है कि डायनों की हत्या को परमात्मा की मर्जी से करनी चाहिए।

यूरोप का तेरहवीं शताब्दी का पूरा इतिहास डायनों से भरा हुआ है। इसी पुस्तक में आगे लिखा है कि तेरहवीं शताब्दी में किसी भी संदिग्ध चुड़ैल को गिरफ्तार किया जा सकता था और किसी लौकिक (चर्च को न मानने वाली) या धार्मिक (चर्च से जुड़ी संस्था) के पास यह अधिकार था कि दोषी पाए जाने पर उसे दंड दिया जा सके। यही कारण है कि चर्च के पास ही सबसे ज्यादा मामले आए।

तो वहीं THE WITCH-HUNT IN EARLY MODERN EUROPE नामक पुस्तक में BRIAN P। LEVACK इसके इतिहास के विषय में लिखते हैं कि 1470 से लेकर 1750 के मध्य हज़ारों व्यक्तियों, जिनमें से अधिकतर औरतें थीं, पर डायन होने का मुकदमा चलाया गया।

इनमे से लगभग आधे लोगों को जलाकर मार डाला गया। वह कहते हैं कि आरंभिक मध्यकाल में हजारों लोगों को यूरोप में काला जादू करने एवं डायन होने के आरोप में मार डाला गया था। 

वह आगे लिखते हैं कि डायन होने के कई मुक़दमे धार्मिक अदालतों में भी चले और मध्यकाल एवं आरंभिक आधुनिक काल में धार्मिक संस्थानों ने यूरोपीयों की धार्मिक एवं नैतिक जीवन का निर्धारण करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। और 1550 के बाद यह मुक़दमे कानूनी अदालतों या कहें राजा के दरबारों में भी हल होने लगे।

वह लोग मानते थे कि शैतान आता है और वह डायनों में शैतानी ताकत डालता है जिसके कारण वह समाज के लिए हानिकारक हो जाती हैं। यही कारण था किसोलहवीं शताब्दी के अंत तक कई शिक्षित यूरोपीय जनों का यह मानना था कि डायन न केवल खतरनाक जादू करती हैं, बल्कि वह कई प्रकार की शैतानी गतिविधियों में भी संलग्न रहती हैं। सबसे ज्यादा उनका यह मानना था कि डायन या डायन शैतानों के साथ प्रत्यक्ष संपर्क में रहती हैं। वह शैतान का आदर करती हैं।

फिर उनका यह भी मानना था कि डायनें समूहों में एकत्र होती हैं और लाशों पर नाचती हैं, लाशों पर और कई प्रकार के ईशनिंदा एवं अश्लील कृत्य करती हैं। तथा वह शैतान एवं अन्य डायनों के साथ यौन कर्म में लिप्त रहती हैं।

पश्चिम में डायन प्रथा ने विशेषकर औरतों पर ही अत्याचार किए। क्या यह इसलिए था कि वह औरतों में प्राण ही नहीं मानते थे या फिर कुछ और? या फिर उन्हें जमीन से बेदखल करने की कोई चाल थी, जैसा उन्होंने यहाँ पर खेल खेला।  क्योंकि पश्चिम में पढ़े लिखे शिक्षित लोग भी डायनों पर विश्वास करते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि चर्च की सत्ता ही सर्वोच्च थी और जो चर्च कहता था वही वह करते थे।

हालांकि यह पुस्तकें इन बातों पर विस्तार से दृष्टि डालती हैं कि इस कुप्रथा ने कितनी औरतों को शिकार बनाया, फिर भी चर्च द्वारा इनकी संख्याओं को कम किया गया। कई वेबसाइट्स इनकी संख्याओं का उल्लेख करती हैं, जैसे के अनुसार आरम्भिक आधुनिक यूरोप में विच हंटिंग अर्थात डायन पकड़ने की जो प्रक्रिया थी, उसकी दो लहरें आईं, पहली थी पंद्रहवीं एवं शुरुआती सोलहवीं शताब्दी एवं दूसरी थी सत्रहवी शताब्दी, जिसमें डायनों को पूरे यूरोप में देखा गया, परन्तु सबसे ज्यादा दक्षिण पश्चिमी जर्मनी में देखा गया, जहाँ पर 1561 से लेकर 1670 तक सबसे ज्यादा डायन पकड़ने और मारने के मामल सामने आए।  BRIAN P। LEVACK के अनुसार लगभग 90,000 से अधिक मामले सामने आए थे, जिन्हें जादू टोने के आरोप में मार डाला गया था, जिनमें से आधे से अधिक पवित्र रोमन साम्राज्य के जर्मनी क्षेत्र के थे।

तो बार बार यह कहा जाना कि डायन प्रथा भारत से उपजी यह मात्र कोरी कल्पना है और ईसाई मिशनरी का षड्यंत्र है, जैसा THE ACADEMIC JOURNEY OF WITCHCRAFT STUDIES IN INDIA शीर्षक से पेपर में शमशेर आलम और आदित्यराज तथ्यों से यह बताते हैं कि यह सब आधिकारिक स्तर पर किया गया षड्यंत्र था, तथा औपनिवेशिक काल में मिशनरी एवं औपनिवेशिक प्रशासक ही वह व्यक्ति थे जिन्होनें डायन एवं डायन का शिकार करने वाले कई मामलों को रिकॉर्ड करने एवं खोजबीन करने का प्रयास किया था।

उन्होंने यह कदम किसी सुधार के लिए नहीं उठाया था, जैसा वह दावा करती हैं। उनका उद्देश्य मात्र और मात्र भूमि पर अधिकार स्थापित करना था। और साथ ही भारत में वनों में रहने वाले वनवासियों को नियंत्रित करना एवं निगमित करना। अत: इस विषय में प्रथम सूचना 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के उपरान्त ही प्राप्त होती है, जिसे अंग्रेज सैन्य विद्रोह कहते हैं एवं भारतीय जिसे 1857 का स्वतंत्रता संग्राम कहते हैं।

उनके अनुसार इसका उल्लेख बहुत किया गया है, परन्तु वनवासी क्षेत्रों को छोड़ दिया गया है, जिस कारण छोटानागपुर की वनवासी जनजातियों के मध्य पहली वृहद डायन का शिकार वाली घटना पर ध्यान नहीं दिया गया। वह इस तर्क के लिए शशांक सिन्हा के पेपर Witch-hunts, Adivasis and the Uprising in Chhotanagpur का सन्दर्भ देते हैं, जिन्होंने इस घटना के विषय में लिखा है।

सिन्हा ने औपनिवेशिक प्रशासकों द्वारा लिखे गए पुराने ऐतिहासिक नोट, न्यायिक निर्णय, जिला गजेट, अन्य इतिहासकारों द्वारा लिखी गयी लोक कथाओं का हवाला दिया है। सिन्हा यह दावा करते हैं कि कहीं न कहीं 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के कुशासन के खिलाफ हुए नागरिक विद्रोह एवं अंग्रेजों द्वारा किए जा रहे नीति क्रियान्वयन में कुछ न कुछ स्पष्ट सम्बन्ध है। 

छोटानागपुर में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष बढ़ता जा रहा था क्योंकि वहां पर लिखित शपथ का नया नियम लागू हुआ था, कमिश्नर का बार बार दौरा किया जा रहा था तथा करों के नियमित भुगतान पर जोर दिया जा रहा था। अत: यह बार बार स्पष्ट होता है कि हर कुरीति के पीछे अब्राहमिक रिलीजन ही मिलेंगे, जैसे दहेज़, जैसे पर्दाप्रथा और डायन, छुआछूत, गुलामी प्रथा। सब कुछ!

इतिहासकारों के अनुसार, यूरोप में काले जादू के जाल में चालीस हज़ार से लेकर एक लाख हत्याएं हुईं हैं तो वहीं उनका यह भी कहना है कि यह संख्या तीन गुना तक अधिक हो सकती है। यद्यपि डायन के आरोपों में पुरुषों की भी हत्याएं हुई थीं परन्तु अधिकतर स्त्रियाँ ही थीं।

जबकि इसी कालखंड में भारत समृद्धि का इतना विराट महासागर बना हुआ था कि उसकी बूँदें लेने के लिए एक और अब्राहमिक मज़हब लूट लूट कर ले जा रहा था, और तलवारों से भूमि लाल कर रहा था, और फिर भी यहाँ के हिन्दू एक हो कर उठ जाते।

औरत को मनोरंजन मानने वाले पश्चिम ने स्त्रियों को केवल देह और कपड़ों तक सीमित कर दिया। स्त्री की सोच को सीमित किया, और जहां वह पहले सत्ता को साधती थी, बाद में बाज़ार उसे साधने लगा।

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Sonali Misra

Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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