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लंपट वामपंथियों, पंच मक्कारों से निपटने का यौगिक तरीका : कृष्ण नीति की नींव और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का संदेश!

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आदित्य जैन। आज जीवन के प्रत्येक पहलुओं पर पंच मक्कारों ने अपना प्रभाव छोड़ रखा है । यदि कोई युवक – युवती कॉलेज जाते हैं तो ये सबसे पहले इनके शिकार बनते हैं। कहानी – उपन्यासों के लेखक , फिल्मों – वेब सीरीज के पटकथा लेखक इनके ही एजेंडे को आगे बढ़ाते हैं । फेसबुक , इंस्टाग्राम , ट्विटर पर भी इनकी पक्की नेटवर्किंग होती है ।

प्रशासनिक सेवा के अधिकांश युवा भी अवचेतन मन से इन मक्कारों को ही सही मानते हैं । ऐसे में एक सनातनी हिन्दू परेशान हो सकता है । उसे अपनी शक्ति पर शक हो सकता है । कृष्ण नीति कहती है कि पहले स्वयं को आंतरिक रूप से और वाह्य रूप से मजबूत करो और फिर समाज व राष्ट्र का हित चिंतन करो ।स्वयं को मजबूत कैसे करें ? इसके लिए श्री कृष्ण स्पष्ट संदेश देते हैं कि –

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।6.46।।

भगवान श्री कृष्ण युद्ध में निराश खड़े अर्जुन से उपर्युक्त श्लोक कहते हैं । श्री कृष्ण सत्य के प्रतिनिधि हैं । प्रकृति के प्रतिनिधि हैं। ब्रह्माण्ड की ऊर्जा के प्रतिनिधि हैं। अर्जुन संशय ग्रस्त , स्वयं को बलहीन मानने वाले मानव के मन का प्रतिनिधि है । बहुत सारे प्रश्न और उत्तरों के बाद श्री कृष्ण अर्जुन को जो संदेश देते हैं ; वह वर्तमान समय में संपूर्ण मानव जाति के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है ।

कृष्ण कहते हैं – क्योंकि योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है और योगी केवल शास्त्र के ज्ञान वालों से भी श्रेष्ठ माना गया है तथा कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है, इसलिए हे अर्जुन तुम योगी बनो।।श्री कृष्ण भी योगी बनने के लिए कह रहे हैं और स्वामी रामदेव भी यही कह रहे हैं। योगी ना बनो तो कम से कम योग तो कर लो। जो योगी होगा , वह उद्योगी भी बन सकता है ।

क्योंकि उसका चित्त शांत होगा और मन एकाग्र होगा तो वह व्यापार के सभी पहलुओं पर विचार करके सही निर्णय ले सकेगा । जो योगी होगा वह समाज के लिए भी उपयोगी होगा क्योंकि उसके अंदर कोई दुर्व्यसन नहीं होगा । उसके अंदर सद्गुण ही होंगे , जिससे समाज में सामंजस्य व सौहार्द्र आएगा । जो योगी होगा , वह निरोगी भी होगा । जिससे उसके पास समय , श्रम , संसाधन और धन चारों की बचत होगी । जो योगी होगा , वह नवाचारी होगा क्योंकि उसका मस्तिष्क तनाव – दबाव आदि से रहित होगा । इसीलिए हे अर्जुन ! , हे भारतवासी ! तुम सब योगी बनो । उपयोगी बनो । निरोगी बनो। उद्योगी बनो और सब लोगों के सहयोगी बनो।

आप आईएएस हैं , प्रोफेसर हैं ; वकील हैं ; नेता हैं ; पुलिस विभाग में हैं ; अमीर हैं ; बहुत बड़े व्यापारी हैं ; आप क्या करते हैं इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । लेकिन यदि आप अष्टांग योग और सप्तांग योग नहीं करते हैं तो आगामी 10 वर्षों में आप रोगी होने वाले हैं ; परेशान होने वाले हैं ; डिप्रेशन में जाने वाले हैं ; प्राण अंत करने वाले हैं । संपूर्ण विश्व वर्तमान में महामारी की चपेट में है ।

इस महामारी में धन , वैभव , शक्ति , पद कुछ भी काम न आया । बड़े नेता , बड़े पत्रकार , बड़े डॉक्टर से लेकर बड़े व्यापारी आदि भी महामारी की गिरफ्त में आकर पंच तत्व में विलीन हो गए । लेकिन जो कोई भी व्यक्ति योगासन , प्राणायाम , ध्यान आदि नियमित रूप से करता था । ऐसे व्यक्तियों को या तो कोई गंभीर बीमारी हुई नहीं और यदि इस महामारी की चपेट में आए तो वे सभी व्यक्ति जल्दी ही स्वस्थ हो गए । इसीलिए हे अर्जुन ! , हे भारतवासी ! तुम सब योगी बनो । उपयोगी बनो । निरोगी बनो। उद्योगी बनो और सब लोगों के सहयोगी बनो। कुछ करो ना करो ; लेकिन योगासन , प्राणायाम और ध्यान जरूर कर लो।

वर्तमान विश्व में कई विचारधाराएं चल रही हैं । पूंजीवाद , साम्यवाद , राष्ट्रवाद , समाजवाद , अधिनायकवाद आदि विचारधाराओं को मानने वाले विश्व में कई देश हैं । लेकिन एक विचारधारा योग की भी है । योग सभी विचारधाराओं की हितपूर्ण , सार्वभौमिक , वैज्ञानिक , न्यायपूर्ण पक्षों को स्वीकार करता है तथा समन्वयवाद का मार्ग चुनकर भी विशिष्ट बना रहता है । आप मार्क्स को माने या सावरकर को ; आप गांधी को माने या सुभाष चन्द्र बोस को ; आप शंकराचार्य को मानें या जीसस को ; आप महावीर को मानें या बुद्ध को : आप मोदी की बढ़ाई करें या ममता की ; इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है । आप अपने जीवन में क्या कर रहे हो , यह महत्वपूर्ण है ।

आपसे आपके गुरु , आपके आदर्श पहचाने जाएंगे । आपसे आपके  आदर्श मार्क्स , सावरकर , गांधी , बोस आदि की पहचान होगी । यदि आप इनमें से किसी को भी मानते हो और यौगिक जीवन शैली अपनाते हो तो निश्चित रूप से आप अपने जीवन में अधिक सफल होगे । एक योगी समग्रता में सोचता है । एक योगी पूर्णता में सोचता है । एक योगी की दृष्टि बहु आयामी होती है । इसीलिए यदि आपको मार्क्स पसंद है तो सावरकर पढ़कर देखो । पूंजीवाद श्रेष्ठ लगता है तो साम्यवाद की उपयोगिता को भी जानो ।

आस्तिक हो तो भगत सिंह के तर्कों को भी पढ़ लो। कविता लिख लेते हो तो एक लघु कहानी भी लिख लो। अरे! शक्तिमान , बलशाली , विवेकवान मानव ! काहे इतना जकड़े हो एक ही विचार लेके, एक आदत लेके, एक भावना लेके? सनातन तो कहता है कि “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः”। अर्थात कल्याणकारक, न दबने वाले, पराभूत न होने वाले, उच्चता को पहुँचाने वाले शुभ कर्म , शुभ विचार चारों ओर से हमारे पास आयें।   रोमिला थापर , आर एस शर्मा जैसे कहानी बनाने वालो की काल्पनिक इतिहास की पुस्तके पढ़ी है तो सूर्य कांत बाली को भी पढ़ लो ।

मनोज सिंह कि पुस्तक ‘ मैं आर्यपुत्र हूं ‘ पढ़ लो। धूप अच्छी लगती है तो बारिश में भी भीगकर देखो। योग कर्म में कुशलता भी है और कर्म में कुशलता तभी आती है, जब हम निष्पक्ष होकर सभी दृष्टिकोणों को जानें, समझें और फिर उसे अपने जीवन में स्थान दें। इसीलिए हे अर्जुन !, हे भारतवासी ! तुम सब योगी बनो। उपयोगी बनो। निरोगी बनो। उद्योगी बनो और सब लोगों के सहयोगी बनो। कुछ करो ना करो ; लेकिन योगासन , प्राणायाम और ध्यान जरूर कर लो।

जीवन बहुत विशिष्ट है । इसके विविध रंग हैं , विभिन्न स्वाद हैं । दर्द की अलग आह है और सुख की अलग वाह है । भारतीय परंपरा में योग के साथ आयुर्वेद को भी समान महत्व दिया जाता है । योग व आयुर्वेद आपस में घनिष्ठ रूप में जुड़े हुए हैं।  ” मर्दनम् गुणवर्द्धनम्यह आयुर्वेद का सिद्धांत है भस्म और रसरसायन की विधि पूर्वक जितनी घुटाईकुटाई करेंगे उतनी ही उसकी गुणवत्ता बढ़ेगी उसी प्रकार चाहे व्यक्ति के अंहकार का मान मर्दन करो या हठयोग की विशिष्ट क्रिया अंगमर्दन !! गुण , ऊर्जा आदि का वर्द्धन तो होगा ही ।इसीलिए एक योगी को अपने जीवन में मर्दन जरूर करते रहना चाहिए बिना मर्दन के विध्वंस भी नहीं होगा और बिना मर्दन के सृजन भी नहीं होगा सृजन और विध्वंस दोनों ही मर्दन के कोख से उत्पन्न होते हैं । इसीलिए योगी अर्जन और मर्दन दोनों ही क्रियाओं में निष्णात होता है ।

अर्जन ऊर्जा का होता है और मर्दन जड़ता का ; योग व आयुर्वेद के सम्मिलन से त्रिदोषों का भी संतुलन होता है और अग्नि भी संतुलित होती है । वह अग्नि चाहे अष्ट धातु की अग्नि हो ; पंच तत्वों की अग्नि हो ; या जठर अग्नि व प्राण अग्नि हो।  रस , रक्त , मांस , मेद , अस्थि , मज्जा , शुक्र , रज , ओज आठ धातुएं हम में हैं।पंच कर्म , षटकर्म , जल नेति , सूत्र नेति , कुंजल , शंख प्रक्षालन , स्नेहन , स्वेदन , वमन , विरेचन , शिरो धारा , अक्षि तर्पण , अभ्यंग , बस्ती आदि अलग – अलग यौगिक क्रियाएं करके हम पूर्ण स्वस्थ हो सकते हैं ।

परिवार स्वस्थ हो सकता है । समाज व राष्ट्र स्वस्थ हो सकता है तथा संपूर्ण मानवता के स्वास्थ्य को भी पाया का सकता है । योग और आयुर्वेद के द्वारा हमारी देह , इन्द्रिय , मन , आत्मा आदि की ऊर्जा का जागरण हो सकता है ; जैसे विवेकानंद , अरविंद , श्रद्धानंद , माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर गुरु जी में ऊर्जा जागृत हुई थी।इसीलिए हे अर्जुन ! , हे भारतवासी ! तुम सब योगी बनो । उपयोगी बनो । निरोगी बनो। उद्योगी बनो और सब लोगों के सहयोगी बनो। कुछ करो ना करो ; लेकिन योगासन , प्राणायाम और ध्यान जरूर कर लो। योगी बनने में लाभ ही लाभ है ।

ब्रह्माण्ड के सत्य रूपी श्री कृष्ण अर्जुन रूपी संपूर्ण मानवता से योगी होने के लिए कह रहे हैं। योग के द्वारा देह , मन , बुद्धि तथा आत्मा को पूर्ण अभिव्यक्ति मिलती है ; पूर्ण संतुलन मिलता है ; इन चारों को पुनर्जीवन मिलता है । जिसे महायोगी पतंजलि ऋषि अपने योगसूत्र में प्रति प्रसव की अवधारणा कहते हैं। एक प्रसव मां करती है , जिससे शिशु का जन्म होता है । यह जन्म देह का होता है । लेकिन जब वही देह अपनी दुर्बलताओं को त्याग कर चेतना को जन्म देती है तो इसे योग की भाषा में प्रति प्रसव कहा जाता है । यह प्रति प्रसव योग रूपी गर्भ से होता है और फिर व्यक्तियों में शक्तियों का जागरण कुछ वैसे ही होता है जैसे विभिन्न महापुरुषों में हम सब देखते हैं ।

ओशो , मंडेला , तिलक , अब्राहम लिंकन आदि में ऐसी ही शक्तियों का जागरण हुआ था। आप सभी में भी ऊर्जा का जागरण हो । इसीलिए  हे अर्जुन ! , हे भारतवासी ! तुम सब योगी बनो । उपयोगी बनो । निरोगी बनो। उद्योगी बनो और सब लोगों के सहयोगी बनो। कुछ करो ना करो ; लेकिन योगासन , प्राणायाम और ध्यान जरूर कर लो। यदि सनातनी शरीर , मन , बुद्धि और चेतना से स्वस्थ व ऊर्जावान रहेगा तो इन पंच मक्कारों के षडयंत्रों को विफल करके अपने न्यायपूर्ण , सार्वभौमिक कल्याणकारी नैरेटिव को स्थापित कर पाएगा ।

।। जयतु जय जय सनातन योग – आयुर्वेद परंपरा ।।

(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के गोल्ड मेडलिस्ट छात्र हैं। कई राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में अपने शोध पत्रों का वाचन भी कर चुके हैं। विश्व विख्यात संस्था आर्ट ऑफ लिविंग के युवा आचार्य हैं भारत सरकार द्वारा इन्हे योग शिक्षक के रूप में भी मान्यता मिली है। भारतीय दर्शन, इतिहास, संस्कृति, साहित्य, कविता, कहानियों तथा विभिन्न पुस्तकों को पढ़ने में इनकी विशेष रुचि है और यूट्यूब में पुस्तकों की समीक्षा भी करते हैं ।)

aditya jain

लेखक आदित्य जैन
सीनियर रिसर्च फेलो
यूजीसी प्रयागराज
adianu1627@gmail.com

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