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जीवन के क्षुद्रतम तथ्य भी अव्याख्य हैं। जब मैं कहता हूं जीवन अतर्क्य है, तब मैं कह रहा हूं कि जीवन अव्याख्य, इनडिफाइनेबल है।

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आप उसकी व्याख्या नहीं कर सकते। जी सकते हैं, कह नहीं सकते, क्या है। और जब भी कहने जाएंगे, तो ऐसी ही गलती हो जाएगी, जैसी इस सूत्र का ऋषि कहकर पड़ गया गलती में। कहता है, पूर्ण से पूर्ण निकल आता है, पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। यह तो पहेली हुई।

यह तो पहेली ऐसी हुई, जैसा कि एक झेन फकीर था रिंझाई। और ये फकीरों को बड़ा मजा आता है पहेलियां खड़ी करने में। क्योंकि उनसे इशारे किए जा सकते हैं।

जब भी कोई उसके पास आता सत्य की खोज करने, तो वह कहता, सत्य पीछे खोज लेना। मैं जरा एक मुश्किल में पड़ा हूं। पहले वह तुम मेरी हल कर दो। तो कोई भी पूछता कि क्या मुश्किल है? जो सत्य खोजने आया था, वह भी यह भूल जाता कि मैं सत्य खोजने आया हूं मैं दूसरे की मुश्किल क्या हल करूंगा!

लेकिन जब रिंझाई कहता कि तुम जरा पीछे पूछ लेना, मेरी जरा एक मुसीबत है, वह तुम हल कर दो। तो वह भी आदमी पूछता कि आपकी क्या मुश्किल है? शिष्य बनने आया आदमी भी गुरु बनने की कोशिश करता है। वह भूल ही गया कि हम पूछने आए थे। कहना था कि हम पूछने आए हैं, हम तुम्हारी मुश्किल क्या हल करेंगे!

हम खुद मुसीबत में पड़े हैं। लेकिन रिंझाई ने लिखा है कि जिंदगी में हजारों लोगों से मैंने यह कहा और हर बार यही हुआ कि उस आदमी ने पूछा, कौन सी मुश्किल है, बोलिए? कि यह आदमी खोजने मेरे पास आया। पर उसने तरकीब बना रखी थी। मुश्किल ऐसी थी कि वह हल होने वाली नहीं थी।

असल में तो सभी मुश्किलें ऐसी हैं कि हल होने वाली नहीं हैं। कोई मुश्किल हल होने वाली नहीं है। क्योंकि मुश्किल कोई आदमी की बनाई हुई नहीं है, एक्सिस्टेंशियल है, अस्तित्व में है। आदमी की बनाई हुई हो, तो हम हल कर लें। पहेलियां आदमी की बनाई हुई हों, तो हम हल कर लें। बच्चों की किताब होती है गणित की, तो ऊपर सवाल लिखा रहता है, पन्ना उलटाकर पीछे जवाब लिखा रहता है।

जिंदगी में ऐसा कहीं किताब उलटाने का उपाय नहीं कि उलटा लो जिंदगी की किताब, पीछे देख लो कि उत्तर क्या है। इसीलिए तो जिंदगी में नकल नहीं चलती। जिंदगी में नकल का कोई उपाय नहीं है। करिएगा कहां? किसकी नकल करिएगा? और उलटाकर देखने की कोई स्थिति नहीं है कि जिंदगी की किताब को उलटा लो और देख लो कि उत्तर क्या है! प्रश्न ही हैं, उत्तर कुछ है नहीं।

उसने एक सवाल बना रखा था। वह कहता कि सुनो, मेरी तकलीफ हल कर दो, तो मैं तुम्हारी कर दूंगा। आदमी आश्वस्त होता कि चलो ठीक है, एक आदमी तो मिला, जो कहता है, मैं तुम्हारी हल कर दूंगा। लेकिन उसे पता नहीं कि वह एक बड़ी कंडीशन साथ में रख रहा है कि पहले तुम मेरी तकलीफ हल कर दो, तो मैं तुम्हारी कर दूंगा।

तकलीफ यह थी, रिंझाई कहता है कि मैंने एक बोतल में एक मुर्गी का अंडा रख दिया था। अंडा फूट गया। मुर्गी बड़ी होने लगी। मैं उसको बोतल के मुंह से खाना खिलाता रहा। अब मुर्गी बहुत बड़ी हो गई है। बोतल का मुंह छोटा है। मुर्गी को बाहर निकालना है और बोतल को तोड़ना नहीं है। कुछ रास्ता बताओ।

बोतल तोड़नी नहीं है, बोतल कीमती है। और मुर्गी बड़ी हो गई है, फंस गई है बोतल में बिलकुल। और मुंह बड़ा छोटा है। मुंह से निकल नहीं सकती, ध्यान रखना। मुंह बहुत छोटा है। वह हम सब कोशिश कर चुके, इसलिए यह मत कहना कि मुंह से निकाल लो। मुंह से निकलती नहीं है, बोतल तोड़नी नहीं है। और मुर्गी अगर ज्यादा देर रह गई तो मर जाएगी, जिम्मेदार तुम रहोगे। है कोई उत्तर? वह आदमी कहता कि आप कैसी बातें कर रहे हैं!

अगर कोई आदमी कहता कि मैं कोशिश करूंगा, सोचता हूं विचारता हूं तो रिंझाई कहता कि बगल के कमरे में चले जाओ। ध्यान करो — मेडीटेट। मुर्गी बंद है, जान संकट में है, देर मत लगाना। ध्यान तेजी से करना, गहरा करना। क्योंकि जान संकट में है, मुर्गी किसी भी क्षण मर सकती है। मुंह छोटा है, बोतल तोड़नी नहीं है! ध्यान करो।

कमरे के उस तरफ भी उसने एक दरवाजा रख छोड़ा था। जब आधा घंटे बाद वह दरवाजा खोलता, तो दूसरे दरवाजे से आदमी भाग गया होता। उनकी भी मजबूरी है।

लौटकर रिंझाई दूसरों से कहता, दि गज इज आउट। मुर्गी भाग गई। मुर्गी बोतल के बाहर निकल गई। बोतल खाली पड़ी है सिर्फ एक आदमी ने रिंझाई को एक दफा उत्तर दिया। लेकिन वह आदमी वह नहीं था, जो रिंझाई से कुछ पूछने आया हो। एक दिन सुबह एक आदमी आकर बैठ गया रिंझाई के पास। रिंझाई ने कहा, कुछ पूछना है? उस आदमी ने कहा कि तुम्हें कुछ बताना है?

रिंझाई थोड़ा डरा। उसने कहा, हमें कुछ नहीं पूछना। हम तो उस आदमी की तलाश में हैं, जो कोई कुछ बताने को उत्सुक हो तो बता दे। रिंझाई डरा, यह आदमी खतरनाक है। या तो मुर्गी मार डालेगा या बोतल तोड़ देगा। फिर भी कोई उपाय न था। रिंझाई की इतनी पुरानी आदत थी कि उसने कहा, नहीं, कुछ बताना नहीं है। हम खुद एक मुसीबत में हैं। उसने कहा, बोलो! कही अपनी कथा उसने पूरी।

जब पूरी कह चुका, तो उस आदमी ने रिंझाई की गर्दन पकड़ ली। रिंझाई ने कहा कि मुर्गी मेरे भीतर नहीं है, मुर्गी बोतल के भीतर है। उस आदमी ने कहा, मैं मुर्गी को निकाले देता हूं। उस आदमी ने कहा, मुर्गी बोतल के बाहर है, बोलो! रिंझाई ने कहा, है।

जीवन कोई पहेली नहीं है। जो उसे पहेली बनाते हैं, वे ही मुश्किल में पड़ जाते हैं। जिंदगी कोई प्रश्न नहीं है। जो प्रश्न बनाते हैं, उन्हें उत्तर खोजना पड़ता है। सब उत्तर उलझाते चले जाते हैं। जीवन एक खुला रहस्य है — ओपन सीक्रेट। ध्यान रहे, दोहरे शब्द उपयोग करता हूं ओपन सीक्रेट — खुला रहस्य। जीवन बिलकुल खुला है, आंख के सामने है, चारों तरफ। कहीं भी छिपा नहीं है। कोई पर्दा नहीं है। फिर भी रहस्य है।

रहस्य और पहेली में फर्क होता है। पहेली का मतलब होता है, जो खुल सकती है। रहस्य का मतलब होता है, जो खुला हुआ है और फिर भी — फिर भी खुला हुआ नहीं है। रहस्य का मतलब है, जो बिलकुल खुला हुआ है और फिर भी इतना गहरा है कि तुम अनंत—अनंत यात्रा करो, फिर भी पाओगे कि सदा शेष रह गया। पूर्ण से पूर्ण बाहर भी निकल आए, तो भी पीछे पूर्ण शेष रह जाता है। पूर्ण में पूर्ण लीन भी हो जाए, तो भी, तो भी पूर्ण उतना ही रहता है, जितना था।

इस रहस्यमयता, इस मिस्टीरियसनेस की सूचना देने वाला यह सूत्र है। यह इशारा है। यह इशारा है इस बात का कि जो इस सूत्र को राजी हो जाएगा, वह जीवन में प्रवेश कर सकता है। जो इस सूत्र को कहेगा कि नहीं, यह नहीं हो सकता, वह दरवाजे के बाहर ही रह जाएगा। वह दरवाजे के भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।

रहस्य है जीवन। रहस्य का मतलब है तर्कातीत। तर्क के नियम आदमी ने अपनी बुद्धि से खोजे हैं। तर्क के नियम कहीं प्रकृति में लिखे हुए नहीं हैं। प्रकृति तर्क के नियम सप्लाई नहीं करती। प्रकृति कोई तर्क का नियम नहीं देती। तर्क के नियम आदमी निर्मित करता है। कामचलाऊ हैं। लेकिन भूल जाते हैं हम कि कामचलाऊ हैं।

ओशो
ईशावास्य उपनिषद13

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