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आगम और निगम की व्याख्या !

तंत्र शास्त्र उपयोगी भी, विज्ञान सम्मत भी भारतीय अध्यात्म का गौरवशाली साहित्य दो भागों में विभक्त है-’आगम’ और ‘निगम’
सामान्यतया आगम तंत्र के लिए और निगम वेदों के लिए प्रयुक्त होता है।

वेदों की महत्ता तो सर्वविदित है ही, तंत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण उच्चकोटि के साहित्य में गिने जाते हैं। इसका प्रमाण इसी तथ्य से मिलता है कि आगम शब्द पहले वेदों के लिए प्रयुक्त किया जाता था, परंतु जब तंत्रों का आविर्भाव हुआ तो वेद निगम और तंत्र आगम के अंतर्गत आ गये। जिस तरह वेद ईश्वर की वाणी माने जाते हैं, उसी तरह तंत्र भी भगवान विष्णु, शिव, देवी की वाणी हैं और उन्हीं देवताओं के नाम से वे जाने भी जाते हैं।

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वेदों के कर्म, उपासना और ज्ञान के तीन विषय प्रसिद्ध हैं, किंतु इनमें यह विषय संक्षिप्त और गुँथे हुए रूप में वर्णित हैं। इन्हें ही सरल रूप में युगानुसार विस्तारपूर्वक तंत्रों में पाये जाते हैं। तंत्रों की महत्ता प्रकट करते हुए ‘मत्स्य-सूक्त में लिखा है कि जिस तरह वर्णों में ब्राह्मण, देवियों में दुर्गा, देवताओं में इन्द्र, वृक्षों में पीपल, पर्वतों में हिमालय, नदियों में गंगा और अवतारों में विष्णु हैं।

उसी तरह शास्त्रों में तंत्र श्रेष्ठ हैं।’ इस तरह अध्यात्म साहित्य में ‘तंत्र की एक विशिष्ट स्थिति है। यह अध्यात्म विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसका अवलंबन करके सर्वथा सामान्य व्यक्ति भी साँसारिक स्तर से ऊपर उठकर क्रमशः उच्च जीवन में प्रविष्ट कर सकता है। तंत्र का उद्देश्य साधक को निम्नगामी प्रवृत्तियों में उलझाना नहीं है, वरन् उसे एक ऐसा सुव्यवस्थित मार्ग सुझाना है जिससे वह जीवन में कुछ श्रेष्ठ एवं आदर्शवादी कार्य कर सके।

यद्यपि यह सत्य है कि जिस प्रकार से प्रत्येक उच्च और उपयोगी सिद्धाँत एवं संप्रदायों में कालाँतर में अनेक विकार और दोष उत्पन्न हो जाते हैं, उसी प्रकार तंत्र मार्ग का भी अधिकांश में रूपांतर हो गया है और साधारण लोगों ने उसे मारण, मोहन, वशीकरण जैसे निकृष्ट, दूषित कार्यों का ही साधन समझ लिया है। पर अपने मूल रूप में उसका उद्देश्य यही रहा है कि जो लोग घर-गृहस्थी को त्याग करके दीर्घकालीन तप और वैराग्य द्वारा आत्म साक्षात्कार करने में असमर्थ हैं, वे अपने साँसारिक जीवन का निर्वाह करते हुए भी आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नति कर सकें।

इस बात को स्पष्ट करते हुए तंत्रशास्त्रों में कहा गया है कि “जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं है और जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं है, किंतु जो मनुष्य भगवती महाशक्ति की सेवा में संलग्न हैं उनको भोग और मोक्ष दोनों ही सहज साध्य हैं।” जब कभी तंत्र-साधना का प्रचार उच्चशिखर पर था, साधक इससे अनेकों प्रकार की असाधारण सिद्धियाँ प्राप्त करते थे, जो आज सर्वथा असंभव दृष्टिगोचर होती हैं।

प्राचीन काल के साधक इससे बड़े-बड़े लाभ उठाते थे। रावण और अहिरावण हजारों मील की दूरी से बिना वैज्ञानिक यंत्रों के आपस में वार्तालाप करते थे। नल-नील ने पानी पर तैरने वाले पत्थरों से पुल बनाया था। हनुमान मच्छर की तरह छोटा बन सकते थे और बृहदाकार पर्वत खंडों को उठाने की सामर्थ्य भी रखते थे। सुरसा अपने शरीर को विशालतम बना सकती थी।

मारीच मनुष्य शरीर को पशु-शरीर में परिवर्तित कर लेता था। बिना पेट्रोल के आकाश में उड़न वाले वायुयान उपलब्ध थे। वरुण-अस्त्र से जल की वर्षा कराई जाती थी, आग्नेयास्त्र से चारों ओर अग्नि की लपटें उठने लगती थीं, नागपाश की जकड़ लोहे की मोटी रस्सियों से भी अधिक सुदृढ़ थी। सम्मोहनास्त्र से व्यक्ति को मूर्छित कर दिया जाता था। आज यह विद्या लुप्त हो गयी और उसे मात्र ग्रंथों में ही पढ़ा जा सकता है। तंत्र-साधनाओं का लक्ष्य बड़ा विस्तृत है।

वशीकरण, मारण, मोहन, उच्चाटन, दृष्टिबंध,

परकाया प्रवेश, सर्पविद्या, प्रेतविद्या, अदृश्य

वस्तुओं को देखना, भविष्य ज्ञान, संतान, सुयोग, आकर्षण, मोहन मंत्र, घात-प्रतिघात आदि की क्रियायें इससे संचालित की जा सकती है। इस साधना द्वारा दूसरों के मन को प्रभावित किया जा सकता है और उसकी गतिविधियों को अपनी इच्छानुसार मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। निर्बल मन व शरीर वाले व्यक्तियों को स्वस्थ बनाया जा सकता है।

बिच्छू एवं सर्पदंश तथा विषैले फोड़ों का समाधान भी तंत्र द्वारा मिलता है। अनिष्टग्रह, भूतोन्माद, नजर लगने आदि के उपचार तंत्र द्वारा होते हैं। मानसिक उद्वेग, असहनीय वेदना व अन्य शारीरिक अव्यवस्थाओं में तंत्र सहायक सिद्ध होता है। मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म द्वारा भी कुछ ऐसे ही कार्य कर लिये जाते हैं।

तंत्रों द्वारा इनकी अपेक्षा कहीं अधिक शक्ति उपार्जित की जा सकती है और उनसे महत्वपूर्ण लाभ उठायें जा सकते हैं। किसी समय तंत्रों के इतने विशाल साहित्य का निर्माण किया गया था जिसकी आज कल्पना भी नहीं की जा सकती। तंत्रों में ही वर्णन है कि प्राचीनकाल में चौदह हजार तंत्र ग्रंथ प्रचलित थे जिनमें सभी विद्याओं का समावेश था।

ये अभ्यास और व्यावहारिक ज्ञान के शास्त्र माने जाते हैं जो जीव की परतंत्रता को समाप्त करके स्वतंत्रता का द्वार खोलते हैं, वह जिन सुदृढ़ बंधनों में जकड़ा हुआ है उनको ढीला करते हैं और ईश्वरीय सत्ता के सर्वोच्च स्थान पर लाकर खड़ा कर देते हैं। तंत्र के लक्ष्यों की ओर संकेत करते हुए मनीषियों ने कहा है-’ईश्वर की सृजनात्मक शक्ति का जागरण, इन शक्तियों को खोजकर कार्य करना, अपने देवत्व को पहचानना और अपने चारों ओर दृष्टि में विशालतर देवत्व का आलिंगन करना ही वह आदेश है जिसे समस्त आगम उद्घोषित करते हैं।

आत्मिक विज्ञान के सिद्धाँतों को क्रिया रूप देना ही वस्तुतः तंत्रशास्त्र का कार्य है। विभिन्न प्रकार की साधनाओं के विधि-विधान का मार्गदर्शन ही इनका मुख्य कार्य है।’ तंत्रों में पंचमकार की साधना की जाती है। इन साधनाओं में मद्य, माँस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन के प्रयोग का निर्देश किया गया है।

अलंकारिक भाषा में प्रयुक्त इन शब्दों को साधारण कोटि के साधक न समझ सके और इनका प्रत्यक्ष प्रयोग करके इस उच्चस्तरीय साधना क्षेत्र को भ्रष्ट कर दिया, जिससे बौद्धिक क्षेत्र में इनके प्रति घृणा के बीज उत्पन्न हो गये। परंतु वास्तविकता कुछ और ही है। जहाँ ‘मद्य’ के प्रयोग का आदेश है वहाँ नशा उत्पन्न करने वाले पेय से अभिप्राय नहीं है, वरन् वह दिव्य ज्ञान है जिससे साधक बाहरी जगत से नाता तोड़कर आँतरिक क्षेत्र में प्रवेश करता है।

परमात्मा को सर्वस्व समर्पित करना ही तो ‘माँस’ का सेवन कहलाता है। ‘मत्स्य’ का अभिप्राय उस स्थिति से है जब सभी तरह के सुख-दुख एक समान हो जाते हैं। दुर्गुणों के त्याग को ‘मुद्रा’ कहते हैं। सहस्रार में शिव-शक्ति का कुँडलिनी के साथ मिलन ‘मैथुन’ कहलाता है। उच्चकोटि के साधक इन्हीं भावनाओं से ओत-प्रोत होकर साधना करते हैं।

विषयी प्रकृति के व्यक्ति अपनी वासनाओं को तृप्त करने के लिए एक प्रकार का षडयंत्र करते हैं और तंत्रशास्त्र को बदनाम करते हैं जिससे यह व्यावहारिक रूप में जनसाधारण से दूर चला गया है। इसकी वास्तविकता को समझना और तद्नुरूप आचरण करना ही अभीष्ट है जिससे जीवन विकास में इस विज्ञान का लाभ उठाया जा सके।

तंत्र पद्धति में छिपे हुए अर्थों को बताते हुए महर्षि अरविंद ने कहा है कि-”भारत भूमि की आत्मा के क्रमशः विस्तारशील राज्य में यह एक महत्वपूर्ण विकास शिखर था। वैदिक ऋषियों ने एक आँतरिक अनुशासन और धर्म विकसित किया और इसे पूर्ण बनाया जो मूल रूप में सहज बोध पर आश्रित और प्रतीकात्मक था और उस युग की अकृत्रिम विशुद्ध मानवता के अनुरूप था।

उपनिषद् में इस प्रारंभ के प्रयास का उल्लेख है जिसमें मानव अपने विभिन्न स्तरों को आलोकित बुद्धि के उच्च स्तर से लेकर नीचे तक के स्तरों को ऊँचा उठा ले जाता है, उन पर आत्मा की ज्योति का प्रकाश डालता है। यह एक प्रणाली है जो कि स्मृतियों के युग से होते हुए आगे बढ़ी और दर्शन में अपनी पूर्णता को पहुँची। ताँत्रिक साधना भगवान के विषय में और भी गंभीर दावा करती है।

यह मानव के संवेदनशील और सक्रिय भागों, हृदय, संकल्प और जीवन सत्ता को भी लेती है और उन्हें आत्मा के ढाँचे के अनुरूप विकसित करने का यत्न करती है। इसलिए तंत्र राष्ट्र के प्रगतिशील तथा आत्म–विस्तारशील आध्यात्मिक आँदोलन में एक महत्वपूर्ण और यहाँ तक कि एक अनिवार्य सोपान रहा है।”

वस्तुतः तंत्र एक स्वतंत्र विज्ञान है। प्रकृति की शक्तियों पर काबू पाकर उन्हें अपनी इच्छानुकूल वशवर्ती बनाना इस विद्या का प्रधान कार्य है। परमाणुमयी प्रकृति के आकर्षण-विकर्षण से जगत के पदार्थों में परिवर्तन होता रहता है, उत्पत्ति, स्थिति और लय के परिणाम उपस्थित होते हैं। विज्ञान द्वारा परमाणु की इस स्वाभाविक प्रक्रियाओं को बदल कर अपने अनुकूल बना लिया जाता है।

तंत्र विज्ञान के द्वारा अपने अंतर की विद्युत शक्ति को इतना विकसित कर लिया जाता है कि प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं को अपनी इच्छानुसार ढाल सकते हैं। इसी को सिद्धि कहते हैं। तंत्र विज्ञान के अनुसार सूक्ष्म जगत में चेतना ग्रंथियाँ विचरण करती रहती हैं। जिस उद्देश्य से साधना की जा रही है, उसके अनुसार उन्हीं प्रकार की चेतना ग्रंथियों को जाग्रत किया जाता है, ताकि वह क्रियाशील होकर अनुकूल परिणाम प्रस्तुत शरीर से अपने स्वामी को सभी आज्ञाओं का पालन करता है वैसे ही अप्रत्यक्ष शरीर से वह चेतना ग्रंथियाँ सदैव उसके साथ रहती हैं और अपनी शक्ति के अनुसार साधक की आज्ञाओं को पूर्ण करती हैं।

जैसे कहा जाता है कि ताँत्रिक को भैरव, छाया पुरुष, ब्रह्मराक्षस, मसान, पिशाच, आदि सिद्ध हैं। अदृश्य लोक की चेतना ग्रंथियों की प्रक्रिया इस प्रकार से होती है कि तंत्र साधनाओं द्वारा उन्हें पकड़ा जाता है, उनको प्राणवान बनाया जाता है, जाग्रत, क्रियाशील और चैतन्य बनाया जाता है। चैतन्य होने पर वह साधक पर आक्रमण करती हैं।

यदि साधक इस आक्रमण से भयभीत न हुआ तो वह ग्रंथियाँ उस साधक के वश में हो जाती हैं और अप्रत्यक्ष शरीर से उसके सभी कार्य सिद्ध करती हैं। यदि वह भयभीत हो जाय तो उसे हानि की भी संभावना होती है। प्राचीनकाल में जब तंत्र अपने विशुद्ध रूप में चरमोत्कर्ष पर था तब अदृश्य लोक की इन चेतना ग्रंथियों को जाग्रत कर वह सभी कार्य कर लिये जाते थे जो आजकल भौतिक विज्ञान की शोधों से यंत्रों द्वारा किये जाते हैं।

इस विद्या द्वारा अभी भी आनंददायक परिस्थितियाँ उत्पन्न और उपलब्ध की जा सकती हैं और उनका उपयोग स्वयं के लिए तथा जनहित में किया जा सकता है। इनसे आसन्न विपत्तियों का निवारण भी किया जा सकता है। तंत्र तुरंत फल दाता है और वह परिणाम आश्चर्य जनक होते हैं। तंत्र का सीधा संबंध चेतना-चित्तषक्ति से है। यह साधना पंचकोशों को पार करने एवं षट्चक्र जागरण कुण्डलिनी उन्नयन की उच्चतम प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त करती है।

अन्नमय कोष से आनंदमय कोष की ओर बढ़ते हुए चलना इनका उद्देश्य है। तंत्र साधनायें शक्ति के स्रोत हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर में स्थित षट्चक्रों और यौगिक ग्रंथियों-उपत्यिकाओं को जगाकर साधक को एक शक्तिशाली चुँबक बना देती है। अंग-प्रत्यंग से शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और यही आकर्षण शक्ति ईश्वर की विभिन्न शक्तियों, जिन्हें देवता कहते हैं, को अपने अनुकूल बनाकर अपनी ओर आकर्षित करती हैं और मनोवाँछित सिद्धियाँ प्रदान करती हैं।

सूक्ष्म देवताओं के लिए सूक्ष्म साधनों की आवश्यकता रहती है और इस कार्य के लिए मंत्र सर्वोपरि साधन स्वीकार किये गये हैं। तंत्रों ने मंत्रों के साथ बीजाक्षरों का प्रयोग भी बताया है। इन मंत्रों की सूक्ष्म तरंगें सूक्ष्म प्रकृति में हलचल उत्पन्न करती हैं और ईथर तत्व में संव्याप्त अपने अनुकूल तरंगों के साथ मिलकर एक शक्तिपुँज के रूप में परिणित हो जाती हैं।

साधक एक चुँबक की तरह इन शक्तियों को आकर्षित करता रहता है और अपने में शक्ति के भंडार को भरता रहता है। इस तरह से मंत्र-तंत्र साधक का दिव्यशक्तियों से संबंध स्थापित कराते हैं और वह आध्यात्मिक विभूतियों एवं भौतिक सिद्धियों का पुँज बनता जाता है। ताँत्रिक आचार्यों का कहना है कि तंत्र की उच्चतम सिद्धि उसे प्राप्त होती है जिसका गुरु कृपा से सुषुम्ना में प्रवेश हो जाता है और जिसकी कुँडलिनी शक्ति का जागरण होता है।

तंत्र का मत ही है कि जो साधक इन्द्रियों और प्राणों को रोककर कुल मार्ग में सक्रिय नहीं हो जाता वह शक्ति की निकृष्ट उपासना का भी अधिकारी नहीं है। मेरु तंत्र के अनुसार जो पर द्रव्य के लिए अंधा है, पर-स्त्री के लिए नपुँसक है, पर निंदा के लिए मूक है और इन्द्रियों को सदा वश में रखता है, ऐसा ब्रह्मपरायण व्यक्ति ही वाममार्गी तंत्र साधना का अधिकारी होता है। यह अधिकार प्राप्त करने के लिए ताँत्रिक सिद्धाँतों का गंभीर अनुशीलन और साधना मार्ग का निष्ठापूर्वक अनुगमन आवश्यक है, तभी दिव्य शक्तियों का वरद् हस्त प्राप्त हो सकता है।

ज्योतिषाचार्य श्री केवलप्रसाद बुजड (राजगोर)

साभार

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