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‘ऑपरेशन बस्तर: प्रेम और जंग’– (पुस्तक समीक्षा )–एक रोमांचक उपन्यास

“हाँ, लाशें भी अपना वज़न रखती हैं, यह बात हमसे और उनसे बेहतर भला कौन समझ सकेगा?” उपन्यास के पहले पृष्ठ पर छपी इस पंक्ति से ही उपन्यास के कथावस्तु की झलक मिलती है।

इक्कीसवीं सदी के भारत का सुविधाविहीन और अत्यंत बीहड़-जंगली-इलाका ‘बस्तर’ सुरक्षाबलों और नक्सलियों के बीच होने वाले मुठभेड़ों का गवाह है, जिसका वर्णन लेखक ने कलात्मक तरीके से इस उपन्यास में किया है। यहाँ के पिछड़ेपन का चित्रात्मक वर्णन देखिए……….

” यहां गाँव में अब भी गाँव की महक है, इटों की मजबूती अब भी नहीं पहुंची……….”

“पैरों में चमड़े का चप्पल……बस्तर के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि…..किसी विलासिता से कम नहीं..….”
ऐसी हीं कितनी सारी बातों का ऐसा दृश्यात्मक लेखन है कि पाठक को बस्तर देख लेने का भान होता है।

इसी बस्तर में दोनों ख़ेमों के बीच का संघर्ष और इस संघर्ष में सिर्फ वहाँ की आम जनता ही नहीं पिसती, बल्कि दुर्गा माँ भी पीसती दिखाई देती हैं………
यथा – ” मजेदार बात है,

एक ही मंदिर में नक्सली और पुलिस दोनों मन्नत मांगते है, दोनों के अपने उद्देश्य अपने – अपने तर्क…….. माता किसकी सुने…वे न्यूट्रल रह जाती हैं कि आपस में तय कर लो।”
सुरक्षाबलों की कार्यशैली को जितने अनुभव से लेखक ने वर्णित किया है कि पाठक उनके बीच ही कहीं खो सा जाता है।

जंगलों में नक्सलवादियों को पकड़ने के लिए विशेष एहतियात बरतते हुए फूँक-फूँक कर कदम रखना ..बिना आवाज़ के ही, टॉर्च होते हुए भी बिना रौशनी के चलना, एंबुश का ख़तरा,

नक्सलियों के प्रहार से लेकर कीड़ों-मकोड़ों और मच्छरों के प्रकोप से बचना, अपनी पहचान छिपाने के लिए स्थानीय वेशभूषा में रहना, स्थानीय लोगों का दिल जीतने जैसे कार्य भी करना अत्यंत रोमांचक है।

इसके साथ ही, ‘शेरा’ जैसे वफादार कुत्ते से लेकर इलियट, हीरा, बबीता के मदद से एरिया कमांडर नक्सली विशु को मार गिराना…सब कुछ ऐसा प्रतीत होता है मानो नज़रों के सामने कोई रोमांचक फिल्म चल रही हो।

कब किसका पलड़ा भारी हो जाए– कहना मुश्किल। दो पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं–
“बीच के किस कलवट, किस पुलिया पर आपकी गाड़ी उड़ जाए…कहा नहीं जा सकता….”
“बस्तर जैसे जंगल में तो गोली और बारूद की गंध भी खाने के गंध में कब मिल जाए…कहा नहीं जा सकता…”

नक्सलियों के जीवन-संघर्ष और पीड़ा को भी लेखक ने साथ-साथ ही उकेरा है। किन परिस्थितियों में ‘दा’, हेमा, सुरेखा, विशु, हीरा, बबीता जैसे लोग उच्च-शिक्षित होते हुए भी नक्सली बन जाते हैं और इससे बाहर भी आते हैं

इसका भी वर्णन मिल जाता है।–” ऐसा नहीं है, कोई शौक़ से नक्सली नहीं बनता।”
कथावस्तु में सुरक्षाबलों और नक्सलियों के जीवन और मृत्यु के बीच के क्षणभर की दूरी का वर्णन तो लेखक ने किया ही है, पर रोमांच और बढ़ जाता है

जब विरोधी खेमे की लड़की से सुरक्षाबल के अधिकारी का प्रेम परवान चढ़ता है। लेखक ने इन दोनों पात्रों के माध्यम से प्रेम को सिर्फ क्षणिक मनोरंजक रूप में नहीं दिखाया है;

बल्कि विवाह की परिणति तक भी पहुँचाया है। हीरा-बबीता, विशु-सुरेखा का प्रेम और अंत में इलियट का गर्भवती सुरेखा से विवाह कर लेना तो समाज में आदर्श स्थापित करता हुआ नजर आता है, जो वर्तमान में क्षीण होते रिश्तों की महत्ता को एक दिशा देने का काम करता है।

उपन्यास में सभी नारी पात्र अपनी सशक्तता का परिचय कराती नजर आ रही हैं जिनपर अलग से अध्ययन या शोध किया जा सकता है। शिक्षिका इला का विवाह पूर्व माँ बनने ख़बर सुनकर जब सौवीर सिंह इसे क्षणिक भूल कह बैठता है; तो वह कहती है …” मेरे पास अब आपका जो भी है वह मेरा है…

केवल मेरा, आपका रंचमात्र भी नहीं!”.. कितनी दृढ़ता थी उस विपरीत परिस्थिति में भी।

सुरेखा का पटेल के सामने ना झुकना और भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए नक्सली बनने का उसका निर्णय भी तो उसकी सबलता का ही परिचायक था। बबीता द्वारा एरिया कमांडर का विरोध कर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर देना ..।

हेमा, ईला का उस पिछड़े क्षेत्र में रहते हुए भी उच्च शिक्षा पा लेना, आत्मनिर्भर होना। सभी नारी पात्र तो ‘स्त्री-विमर्श’ के उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में ही नजर आ रही हैं।

डायरी शैली में लिखे इस उपन्यास में लेखक ने जिस भावनात्मकता का चित्रण किया है, वह पाठकों को बांधे रखती है। कई सारे छोटे-छोटे रूपक वाक्य दिल को गहरे तक छू जाते हैं, यथा–

” महज हौसले से क्या जान बचनी थी?”
” पर जिंदगी दिन की नहीं वर्षों की होती है”
” हमारे कंधों पर बोझ होती है कुछ उम्मीदें “
” वनलता का होना ही तब है, जब वह पेड़ से लिपटकर जी उठे”

शिल्प की चर्चा करें, तो भाषा की सरलता और सहजता घटनाओं के वर्णन और बहाव में कहीं भी रुकावट नहीं बनती। भाषा के स्तर पर भी लेखक ने अपना कौशल दिखाया है। पात्रानुकूल और विषयानुकूल भाषा पाठक को बाँध कर रखती है।

कुल मिलाकर पुस्तक एक पूर्णता के साथ पाठकों के सामने है, जिसमें रोमांच तो है ही, सुरक्षाबल के अधिकारी का वर्दी के प्रति फ़र्ज और कोमल हृदय में उपजे प्रेम का अनोखे सामंजन के साथ चित्रण हुआ है।

साथ ही, स्त्री मनोभावों का दिल की गहराई तक छू लेने वाला भावनात्मक चित्रण, सुविधाविहीन बीहड़ जंगली क्षेत्र बस्तर की ‘सल्फी’ से लेकर वहाँ की मिट्टी तक की ख़ुशबू को पाठक वर्ग बख़ूबी महसूस कर सकता है।

एक रोचक तथ्य है कि इस किताब के साथ यह ऑफर है कि अगर किसी को पसंद न आए, तो उसके पूरे पैसे बिना कुछ पूछे वापस होंगे। भाषा-विज्ञानी, वैयाकरण एवं पुलिस अधिकारी कमलेश कमल के इस पहले उपन्यास का प्रीतिमा वत्स द्वारा बनाया गया आवरण अत्यंत आकर्षक है।

यश पब्लिकेशन्स द्वारा प्रकाशित 150 रु मूल्य के इस #1 बेस्टसेलर उपन्यास को सामान्य तौर पर पाठक एक ही बार में बैठकर पढ़ सकते हैं।

डॉ रश्मि रानी..✍️

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