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क्षत्रिय के लिए राजपूत का उपयोग कब से?

धीरेन्द्र सिंह जादौन. रामायण और महाभारत के समय से लेकर चीनी यात्री हुएनसांग के भारत -भ्रंमन (ई0सन् 629-645 ) तक राजपूत शब्द जाति के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता था ।प्राचीन इतिहास और पुराण ग्रंथों में इस जाति के लिए “क्षत्रिय “शब्द का प्रयुक्त मिलता है तथा वेद और उपनिषद् काल में “राजन्य”शब्द का प्रयोग देखने में आता है। सूत्रकाल में कहीं -कहीं क्षत्रियों के लिए “उग्र”शब्द लिखा गया है ।

जैन -ग्रंथों व् मध्यकालीन (ई0स0600 से 1200 तक )ग्रंथों में भी राजपूत शब्द नहीं पाया जाता है।पृथ्वीराजरासो ग्रन्थ में भी -जो विक्रम की सोलहवीं शताब्दी के आस पास रचा माना जाता है ,उसमें भी “राजपूत “शब्द जाति वाचक नहीं ,किन्तु योद्धा के अर्थ में आया है।जैसे “रजपूत टूट पचासरन जीत समर सेना धनिय ” “लग्यो सूजाय रजपूत सीस ” “बुड गई सारी रजपूती “।

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उस समय राजपूत जाति कोई विशेष जाति नहीं गिनी जाती थी ।मुसलमानों के आक्रमणों तक यहां के राजा “क्षत्रिय “ही कहलाते थे ।बाद में इनका बल टूट गया और ये स्वतंत्र राजा के स्थान पर सामंत नरेश हो गये ।मुसलमानों के समय में ही धीरे -धीरे इन शासक राजाओं की जाति के लिए राजपुत्र या राजपूत शब्द काम में आने लगा ।

फिर धीरे -धीरे यह शब्द जाति सूचक होकर मुगलों के समय अथवा उससे पूर्व सामान्य रूप से प्रचार में आने लगा । “राजपूत “या रजपूत”शब्द संस्कृत के “राजपुत्र”का अपभ्रंश अर्थात लौकिक रूप है। ।प्राचीनकाल में “राजपुत्र”शब्द जाति वाचक नहीं ,किन्तु क्षत्रिय राजकुमारों या राजवंशियों का सूचक था ,क्यों क़ि बहुत प्राचीन काल से प्रायः सारा भारतवर्ष क्षत्रिय वर्ण के अधीन था ।

कौटिल्य के अर्थशास्त्र ,कालिदास के काव्य और नाटकों ,अश्वघोष के ग्रंथों ,बाणभट्ट के हर्षचरित तथा कादंबरी आदि पुस्तकों एवं प्राचीन शिलालेखों तथा दानपात्रों में राजकुमारों और राजवंशियों के लिए “राजपुत्र “शब्द का प्रयोग होना पाया जाता है । क्षत्रिय वर्ण वैदिक काल से इस देश पर शासन करता रहा और आर्यों की वर्णव्यवस्था के अनुसार प्रजा का रक्षण करना ,दान देना ,यज्ञ करना ,वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करना और विषयासक्ति में न पड़ना आदि क्षत्रियों के धर्म या कर्म माने जाते थे।

मुगलों के समय से वही क्षत्रिय जाति “राजपूत “कहलाने लगी lप्राचीन ग्रंथों में राजपूतों के लिए राजपुत्र ,राजन्य ,बाहुज आदि शब्द मिलते है। यजुर्वेद जो स्वयं ईश्वरकृत है ,में भी राजपूतों की खूब चर्चा हुई है।

ब्रध्यतां राजपुत्राश्च बाहू राजन्य कृत :।
बध्यतां राजपुत्राणां क्रन्दता मित्तेरम्।।

इसके बाद पुराणों में सूर्य और चन्द्रवंश जो राजपूतों के वंश है की उत्तपति भी क्षत्रियों से मानी गयी है । चंद्रादित्य मनुनांच् प्रवराः क्षत्रियाः स्मतः । बाण के हर्षचरित में भी राजपुत्र शब्द का प्रयोग हुआ है। बाण लिखता है अभिजात राजपुत्र प्रेष्यमान कुप्यमुक्ता कुल कुलीन कुलपुत्र वाहने । अर्थात सेना के साथ अभिजात राजपूतों द्वारा भेजे गए पीतल के पत्रों से मढे वाहनों में कुलीन राजपुत्रों की स्त्रियां जा रहीं है ।

अतः राजपूत प्राचीन आर्य क्षत्रियों की संतान है ।यदि प्राचीन इतिहास के पन्नें पलटे जायं तो स्थान -स्थान पर यह वर्णन मिलेगा कि राजपूतों ने शकों ,हूणों से अनेक बार युद्ध किये और उनसे देश ,धर्म तथा संस्कृति की रक्षा की ,किन्तु आधुनिक इतिहासकारों ने अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर उन्हें उन्हीं की संतान बना दिया ।

सोलह संस्कारों को धारण करना राजपूतों के लिए अनिवार्य था ।राजपूत अपने गुणों ,वीरता ,साहस ,त्याग ,अतिथि सेवा तथा शरणागत वत्सलता ,प्रजावत्सलता ,अनुशासनप्रियता ,युद्धप्रियता आदि गुणों के साथ -साथ ब्राह्मणों के क्षमा ,दया ,उदारता ,सहनशीलता ,विद्वता आदि गुणों को भी धारण करना होता था ।इसी से भ्रांत होकर कई इतिहासकारों ने राजपूतों को ब्राह्मणों की संतान मान लिया है ,किन्तु जैसा कि इस्पस्ट हो चूका है कि ये ऋषी बाह्मण नही थे ,बल्कि वैदिक ऋषी थे और क्षत्रिय तथा ब्राह्मणों दोनों के पूर्वज थे ,क्यों कि वर्ण -व्यवस्था तो उस युग के बहुत बाद वैवस्वत मनु ने आरम्भ की थी ।

यूरोपियन विद्धवान जैसे नेसफील्ड ,इबटसन राजपूतों को प्राचीन आर्यों की संतान मानते हुए कहते है ,”राजपूत लोग आर्य है और वे उन क्षत्रियों की संतान है जो वैदिक काल से भारत में शासन कर रहे है ।” मि0 टेलवीय हीव्लर , ‘भारत के इतिहास ‘में लिखते है “राजपूत जाति भारतवर्ष में सबसे कुलीनब और स्वाभिमानी है “।कई इतिहासकारों ने ये सिद्ध किया है कि राजपूत विशुद्ध आर्यों की संतान है और उनकी शारीरिक बनावट ,गुण ,और स्वभाव प्राचीन क्षत्रियों के समान है ।कालिदास रघुवंश में लिखते है :

क्षत्रतिक ल त्रायत इत्युद्ग्र क्षत्रस्य शब्दों भुवणेषु रूढ़:।
राज्मेंन किं कादिवप्रीत वरतेः प्राणैरुप कोशमलीन सर्वा :।।

अर्थात विश्व को आंतरिक और बाह्य अत्याचारों जैसे शोषण ,भूख ,अज्ञान ,अनाचार ,तथा शत्रु द्वारा पहुंचाई गयी जन -धन की हानि से बचाने बाला क्षत्रिय है ।इसके विपरीत कार्य करने वाला न तो क्षत्रिय कहलाने का अधिकारी है और न ही वह शासन करने का अधिकारी हो सकता है ।क्षत्रियों के गुण -कर्म तथा स्वभावों का मनुसमृति में वर्णन करते हुए स्वयं मनु जी कहते है :

प्रजानों रक्षा दान मिज्याध्ययन मेथ च ।
विषयेतवन सकितश्च क्षत्रियस्य समास्त :।।

अर्थात न्याय से प्रजा की रक्षा करना ,सबसे प्रजा का पालन करना ,विद्या ,धर्म की प्रवर्ति और सुपात्रों की सेवा में धन का व्यय करना ,अग्निहोत्री यज्ञ करना व् कराना ,शास्त्रों का पठन ,और पढ़ाना ,जितेन्द्रिय रहकर शरीर और आत्मा को बलवान बनाना ,ये क्षत्रियों के स्वाभाविक कर्म है ।
श्रीमद् भगवदगीता में क्षत्रियों के गुणों और कर्मों का वर्णन करते हुये श्री कृष्ण अर्जुन को कहते है :

शौर्य तेजो धृति दक्षिर्य युद्धे चाप्याप्लायनम ।
दानमीश्वर भावस्य क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ।।

अर्थात शौर्य ,तेज ,धैर्य ,दक्षता ,और युद्ध में न भागने का स्वभाव और दान तथा ईश्वर का भाव ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण तथा कर्म है ।
देश -धर्म तथा संस्कृति की रक्षा में सर्वस्व त्याग की भावना ही राजपूतों का सबसे बड़ा गुण एवं कर्म रहा है ।इसी लिए इस जाति ने मध्यकाल में सैकड़ों साके और जौहर किये ।विश्वामित्र जैसे महामुनि .राजा हरिश्चंद्र जैसे सत्यवादी ,राजा रघु जैसे पराक्रमी ,राजा जनक जैसे राजषि ,श्री राम जैसे पितृभक्त ,श्री कृष्ण जैसे कर्मयोगी ,कर्ण जैसे दानी ,मोरध्वज जैसे त्यागी ,अशोक जैसे प्रजा -वत्सल ,विक्रमादित्य जैसे न्यायकारी ,राजा भोज जैसे विद्धान ,जयमल जैसे वीर ,प्रताप जैसे देशभक्त ,पृथ्वीराज जैसा साहसी योद्धा ,दुर्गादास जैसे स्वामीभक्त अनेक वीर इसी जाति की देंन है ।यहाँ तो पालने में जन्मघुटी के साथ ही देश भक्ति तथा त्याग का पाठ शुरू हो जाता था ।

अपने इन गुण -कर्मों ,स्वभावों तथा पवित्र परम्पराओं के कारण ही राजपूत सफल मानव ,सच्चे सेनानी ,तथा कुशल शासक बनते थे ।ये राजपूत राजा कमल के समान निर्लेप ,सूर्य जैसे तेजस्वी ,चंद्र जैसे शीतल ,तथा पृथ्वी जैसे सहनशील होते थे ,क्यों कि उनका शासन आत्मत्याग और जौहर जैसी पावन परम्पराओं पर आधारित होता था ।वे हँसते -हँसते मृत्यु का आलिंगन करना श्रेयस्कर समझते थे और युद्ध में पीठ दिखाकर भाग जाना मृत्यु से भी बदतर समझते थे।

लेखक -डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन ,गांव -लढोता ,सासनी ,जिला -हाथरस ,उत्तरप्रदेश ।

साभार: फेसबुक पेज से।

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