Category: भाषा और साहित्य

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ऐसे समय में जब अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषा का वर्चस्व बढ़ता ही जा रहा है, हमारी हिंदी लहरों की तरह अनवरत समृद्धि की तरफ अग्रसर है!

एक डोर में सबको जो है बाँधती वह हिंदी है, हर भाषा को सगी बहन जो मानती वह हिंदी है। भरी-पूरी हों सभी बोलियां यही कामना हिंदी है, गहरी हो पहचान आपसी यही साधना...

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हिंदी कविता- इस पथ पर कौन मिलेगा?

इस पथ पर कौन मिलेगा? साथी यह तय कौन करेगा? आज मिला जो वह मेरा है, कल आशाओं का फेरा है! जीवन यह बहता दरिया है, जो साथ बहेगा याद रहेगा! इस पथ पर...

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कविता- तय कर लो, जाना किधर है…

तय कर लो! जाना किधर है एक तरफ काँटों का रास्ता पर तरफ दूसरी उजाले की चमक है सोच लो चलना किधर है एक तरफ नरम घास सा रास्ता तरफ दूसरी अँधेरे का असर...

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हिंदी कविता- ‘बुर्जुआ’

लाखों बार कुर्बान ऐसे ‘बुर्जुआ’ पर…. बाजार से गुजर रहा था, तुम आगे थी, और मैं पीछे। देखा, एक गुलाब वाला बुजुर्ग गुमशुम-सा बैठा था, उसका बेटा गुलाब समेटने की तैयारी में था, सोचा...

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हिन्दी भाषा को ‘हिन्दी दिवस’ की कोई आवश्यकता नहीं है।

हिन्दी की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि इसमें वही लिखा जाता है जो उच्चारित होता है। इसमें हर ‘ध्वनि’ के लिए अपना एक शब्द है। दूसरी भाषाएं हिन्दी जितनी धनिक नहीं है। तीन...

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कामरेड कथा…लव,सेक्स और क्रान्ति!

अतुल कुमार राय। अभी पुष्पा को जेएनयू आये चार ही दिन हुए थे कि उसकी मुलाक़ात एक क्रांतिकारी से हो गयी। लम्बी कद का एक सांवला सा लौंडा। ब्रांडेड जीन्स पर फटा हुआ कुरता...

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कविता-आज जाने का है क्षोभ बड़ा, कल आने का है विश्वास ‘अटल’ !

बिरले ही होते हैं जिनके लिए शब्द स्वत फूटते हैं, आज मन उद्वेलित है ‘अटल’ जी को मेरी तरफ से अनंत ज्योति में विलीन होने पर अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि… मृत्यु मौन किन्तु ‘अटल’ है, आती...

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कविता- दुःख नहीं स्वीकार करो, मृत्यु से भी प्यार करो!

दुःख नहीं, स्वीकार करो, मृत्यु से भी प्यार करो! एक छोर पर जीवन है, दूसरी छोर पर मौत खड़ी! जीवन जब जी भर कर जिया, मृत्यु को भी भरपूर जियो! मृत्यु एक अटल सत्य...

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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: ‘मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ’

ठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई। मौत...

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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता: ‘सुनो प्रसून की अगवानी का स्वर उन्चास पवन में’!

पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा स्थापित सचित्र साप्ताहिक अभ्युदय में प्रकाशित अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता, 11 फरवरी 1946 नौ अगस्त सन बयालीस का लोहित स्वर्ण प्रभात, जली आंसुओं की ज्वाला में परवशता...

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कहानी…सपेरा संपादक और नागिन एंकर!

सांप-छुछुंदर नचाने वाले एक ‘सपेरे संपादक’ को आज लोकतंत्र की बड़ी चिंता है! महोदय जानता हूं, कम उम्र महिला रिपोर्टरों को आप किस ‘बीन’ पर ता-थैया कराया करते थे? यह एक न्यूज चैनल के...

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हिंदी कविता : चिदाकाश!

हम चारों तरफ आकाश से घिरे हैं, जो है और जो नहीं है! है उसके लिए जो जानता है, नहीं है उसके लिए जो तर्क करता है! आकाश यानी शून्य! जीवन की गति ही...

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जिसे तुलसी, सूर का ज्ञान नहीं वह प्रकाशक है! सोचिए हमारी हिंदी के प्रति वह कितनी नफरत से भरी है!

किताबें इंसानों के लिए सबसे बड़ा दोस्त बताई जाती हैं, और हैं भी! जो भी उत्तर नहीं मिल रहा हो, वह आपको झट से किसी न किसी किताब में मिल जाएगा। आज किताबें ऑनलाइन...

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हिंदी का अक्षर बोध, ‘अ’ अज्ञान से ‘ज्ञ’ ज्ञान तक की यात्रा!

हमारे बच्चों को हम अपनी मातृभाषा हिंदी ठीक से नहीं सिखाते, क्योंकि हम स्वयं ही शुद्ध हिंदी न लिख पाते हैं, और न बोल पाते हैं! संस्कृत के सबसे निकटस्थ हिंदी ही है। इसकी...

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हिंदी कविता : विकास के पथ पर हूँ, कैसे कह दूँ?

दिल्ली जैसे महानगरों में इस तरह के दृश्य आपको कहीं न मिल जायेंगे, फुटपाथ, पार्क आदि! लेकिन दिल्ली की लाइफ लाइन बन चुकी मेट्रो की सीढ़ियों में इस बालक को देखा तो मन के...

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मैं, मेरी आस्था और नीलकंठ !

किंगफ़िशर को नीलकंठ भी कहते है। ये बात जीवन के लगभग डेढ़ दशक के बाद पता चली उसके पहले वो मेरे लिए भगवान शंकर थे, जो रूप बदल कर अपनी बनाई दुनिया में ये...

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गौरैया फिर आना मेरे अंगना।

आज विश्व गौरैया दिवस है याद है न कि भूल गए। याद इसलिए लिखा क्योंकि अब मात्र यादों में ही शेष है प्रकृति की वह अमूल्य धरोहर जो सहज एक छलांग में एक घर...

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हिंदी कविता ‘जीवन मरण के मध्य’!

मैंने बिखेरी हैं, सांसें हवाओं में थोड़ी-थोड़ी! एक उम्मीद के साथ, कि कोई तो बटोर लेगा! अंजुरी भर फिर बिखेर देगा अपने बाद फिजाओं में! ताकि जीवन चलता रहे, इस लेन-देन के मध्य आखिर!...

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न वहां मेरा घर है, न वहां मेरा गांव है।

नीले आसमान के नीचे, सुनसान छत पर, भरी दोपहरी में, एकदम से अकेला, हवा की सांय-सांय जब कानों से टकराती है, तो एहसास होता है, यह गांव है, कोलाहल से दूर, यहां सुकून की...

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सुनो कुछ तो कहता है गोधरा?

27 फ़रवरी 2002 को गुजरात के गोधरा में मानवता शर्मशार हुई, जब एक संप्रदाय विशेष ने गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में 59 रामभक्तों को जिंदा फूंक दिया गया था, जिसमें 25 महिलाएं, 19...

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