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डॉ. शैलेन्द्र कुमार की पुस्तक, ‘ईसावाद और पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक संहार’ ईसावाद की गहरी कब्र खोदती है।

यह समाचार सुर्ख़ियों में बना हुआ है कि केरल की एक अदालत ने बहुचर्चित नन रेप केस में कैथोलिक चर्च के जालंधर सूबा के बिशप फ्रैंको मुलक्कल को 14 जनवरी 2022 को निचली अदालत ने बरी कर दिया। आये दिन देश दुनिया में ईसाई पादरियों और उनकी चर्च संबंधी सनसनीखेज खुलासे होते रहते हैं। जबकि मेरे जैसे साधारण नागरिक के लिए ‘इन दा नेम ऑफ़ गॉड’ के नाम पर चमत्कार करने वाले ये लोग कुछ और ही प्रतीत होते हैं। खैर इनकी ऐसी छवि निर्माण के पीछे अतीत में देखी गयी बॉलीवुड की फिल्मों का भी हाथ है। कुछ दिन पहले एक हिंदी पुस्तक हाथ लगी। उसका शीर्षक देखकर लगा कि क्या सच में ऐसा शीर्षक सम्भव हो सकता है? पुस्तक का शीर्षक है ‘ईसावाद और पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक संहार’ (गरुड़ प्रकाशन), लेखक डॉ. शैलेन्द्र कुमार
हमने तो बचपन से ही इस ईसावाद के उदारपन के ही किस्से कहानियां पढ़े हैं और फिल्मों में लम्बा सा सफेद कोट पहने और गले पर बड़ा सा क्रॉस लटकाये सीधा साधा पादरी ही देखा है। थोड़ा बहुत जानकारी ईसा के चेलों से भी कभी कबार मिलती रहती थी कि उनके येशु हमारे गुनाहों के लिए सूली पर चढ़े थे। पर यह पुस्तक तो ‘सांस्कृतिक संहार’ की बात कर रही थी। ये अलग बात है कि आजकल थोड़ा बहुत सोशल मीडिया के माध्यम से ‘इन दा नेम ऑफ़ गॉड’ के नाम पर चमत्कार होने वाली इनकी सभाओं के वीडियो भी देखे हैं। खैर! ‘ईसावाद और पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक संहार’ पढ़ने से पहले का पूर्वपक्ष यही है। परन्तु जैसे ही इस पुस्तक की प्रस्तावना का पहला पैरा पढ़ा उसी क्षण दिमाग में बिजली सी दौड़ गयी। उस पहले पैरे में ही संदर्भ संख्या1 लिखी हुई है। मुझे उसी क्षण आभास हो गया कि यह पुस्तक लेखक की कल्पना से निकली हुई कृति नहीं है प्रत्युत शोधपूर्ण कृति है। यह समझाने के लिए वह संदर्भ संख्या 1 वाली प्रस्तावना की पहली पंक्ति यहाँ लिखता हूँ, “अंग्रेज ईसाइयों की तथाकथित कंपनी सरकार की छत्रछाया में उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ से पूर्वोतरीय भारत पर ईसाई मिशनरियों का आक्रमण आरंभ हुआ।1” आक्रमण शब्द मेरे दिमाग में विद्युत् तरंगे पैदा करने वाला शब्द था। दूसरा संदर्भ भी इसी पैरा में है.” स्पष्ट है कि चाहे वह ईसावाद2 (ईसाइयत) हो या मोहम्मदवाद (इस्लाम) दोनों के प्रसार का सर्वप्रमुख कारण राजसत्ता ही रहा है।” ईसावाद हो या मोहम्मदवाद का राजसत्ता के साथ क्या सम्बन्ध हो सकता है? यह प्रश्न भी दिमाग में उठा। ये हो सकता है की भारत के विद्वान लोग इस प्रश्न का उत्तर जानते होंगे, परन्तु मेरे जैसे फिल्मों से सीखने वाले लोगों के लिए ये ‘आक्रमण’ और ‘राजसत्ता’ जैसे शब्द झकझोरने वाले हैं। इसलिए यहाँ ऐसा उल्लेख कर रहा हूँ, कारण भारत की बहुसंख्यक कहलाने वाली हिन्दुओं की पीढियां मेरे जैसे ही हैं।

पुस्तक की प्रस्तावना में आगे लेखक ईसावाद को एक आंदोलन के रूप में मार्क्सवाद, साम्यवाद, समाजवाद या लेनिनवाद-माओवाद के सदृश मानते हैं और पूर्वोत्तर भारत में ईसावाद के फैलाव को दुनियाभर में ईसावादियों द्वारा किये गए हर प्रकार के संहार की प्रक्रिया में पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक संहार की प्रक्रिया का स्वाभाविक विस्तार मानते हैं।

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इस पुस्तक को एक बार में पढ़कर समाप्त करना है इसके पीछे की प्रेरणा भी पुस्तक की इसी प्रस्तावना में है। जहाँ लेखक लिखते हैं कि पूर्वोत्तर के संदर्भ में सामान्यतः हमारे देश के बौद्धिक एक बात को लेकर एकमत दिखते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में ईसाई मिशनरियों की उपलब्धि उल्लेखनीय रही है। क्या यह बात सच है? इस विषय में सबसे महत्वपर्ण प्रश्न यह है कि यदि ईसाई मिशनरी नहीं आते तो क्या पूर्वोत्तर के लोग शिक्षित नहीं होते? और यदि ये लोग ईसाई मिशनरियों के द्वारा शिक्षित हो भी गए तो वे कितना लाभान्वित हुए हैं?
ऐसे प्रश्न तो मेरे मन में कभी न उठे थे। प्रस्तावना का एक पुस्तक के लिए कितना महत्व होता है यह इस पुस्तक की प्रस्तावना को पढ़कर समझ आया।
पुस्तक में कुल 11 अध्याय हैं और 258 पृष्ठ। पहले अध्याय का शीर्षक इतना रोचक और पढ़ने के लिए आकर्षित करने वाला है कि पाठक स्वयं को नहीं रोक पायेगा। शीर्षक है. ‘भारत में ईसावाद की प्रयोगशाला: जलालद्दीन (अकबर) का दरबार‘- क्या? अकबर का दरबार और ईसावाद की प्रयोगशाला? ये कैसे संभव हो सकता है? अकबर तो मुस्लिम था उसके दरबार में ईसाईयों के कैसे प्रयोग हुए होंगे? ऐसे अनेक जिज्ञासापूर्ण प्रश्न मेरे मन में उठे। निःसंदेह इन प्रश्नों के उत्तर मुझे इस अध्याय में मिले। बल्कि ईसा मसीह द्वारा दूसरे भोले भाले लोगों को ईसावाद में मतांतरित करने की योजना भी इस अध्याय में मिली। इसके लिए पहले अध्याय के 15-18 तक के पृष्ठ बहुत ध्यान से पढ़ने होंगे। ईसावाद के भोले भाले लोगों को ‘कन्वर्ट’ (मतांतरित) करने की योजना पाठक को इस अध्याय में मिलेगी। मैं तो ये तक लिखूंगा की स्वयं पाठक ईसावाद के चंगुल में न फसे, इसका तोड़ उसे यहाँ मिलेगा। यह विश्लेषण लेखक की विद्वता को दर्शाता है। इस तरह का विश्लेषण समान्य लेखक शायद नहीं कर सकता। लेखक इसी अध्याय में सनातन हिंदुत्व की ईसावाद पर श्रेष्ठ्ता कुछ इस तरह सिद्ध करते हैं.” यहाँ ध्यातव्य है कि ईसावाद की बातों पर टोका-टोकी अर्थात प्रश्न करना, संदेह व्यक्त करना आदि खुदाई कानून की बेअदबी या अपमान करना है। इस प्रकार ईसायत के विषय में आप केवल श्रोता हो सकते हैं, प्रश्नकर्ता नहीं। इससे सिद्ध होता है कि ईसावाद कितना खोखला मजहब है, क्योंकि इसके पास किसी भी प्रश्न का उत्तर नहीं होता है।”

इसी अध्याय में लेखक डॉ. शैलेन्द्र कुमार आज तक दुनियाभर में ईसावाद को फैलाने का तरीका भी बताते हैं। जिसके तहत पादरी शहीद होने के लिए उद्यत रहे हैं और लोगों की भावनाओं को क्यों भड़काते हैं और क्यों पीड़ित होने का नाटक करते हैं? पुस्तक के इस अध्याय में ‘पूरा पर्दाफास‘ किया गया है ऐसा लिखने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है। इसी अध्याय में ईसावाद के साथ मोहम्मदवाद के चरित्र को समझाने का उत्कृष्ट यत्न किया गया है।
इस देश में अकबर महान था, अजीमों शान शहंशाह था ऐसा अनेक इतिहासकारों ने लिखा है और बॉलीवुड ने तो इस पर फ़िल्में भी बनाई है लेकिन इस पुस्तक के लेखक डॉ. शैलेन्द्र कुमार अपने इस शोधपूर्ण प्रयास में अकबर को दुर्बल और अदूरदर्शी सिद्ध करते हैं
पुस्तक के अगले अध्याओं में लेखक ने ईसावाद के विरुद्ध भारत के लोगों ने कैसे और कितना लंबा संघर्ष किया है उस पर विस्तृत प्रकाश डालने का प्रयास किया हैं। लेखक अपने इस शोध में यह मानते हैं कि इस लंबे संघर्ष का ही परिणाम है कि ईसाई आज तक अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सके हैं।
यह पुस्तक ईसावाद और 1857 के महासंग्राम पर विस्तृत रूप से वर्णन करती है और 1857 के महासंग्राम को हमारे धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए हमारे पर्वूजों के बलिदानों का अप्रतिम योगदान मानती है। 1857 के महासंग्राम को लेकर लेखक विशेष जोर देकर लिखते हैं कि सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस महासंग्राम में हमारी विजय हुई। भले ही राजनैतिक स्वतंत्रता न मिली हो, परंतु धार्मिक एवं सांस्कृतिक स्वतंत्रता अवश्य मिली। यह घटना हमारे इतिहास का स्वर्णिम अध्याय है। हमारा दुर्भाग्य इतना ही है कि हममें से कम ही लोग इससे परिचित हैं।
ईसावाद के चेलों में हीबर का एक बड़ा स्थान माना जाता है उसने बहुत से भजन लिखे है जो आक्रामक रूप से आत्मविश्वास से परिपूर्ण मिशनरियों के लिए लड़ाई का नारा बने।

हीबर के भजन का संदर्भ लेकर पुस्तक के लेखक ने ईसावाद के पाखंड की कब्र खोद दी है ऐसा लिखना कोई अतिश्योक्ति नहीं है। हीबर के एक भजन ग्रीनलैंड के बर्फीले पहाड़ों से….. पर टिप्पणी करते हुए लेखक लिखते हैं,’ क्या किसी भजन में ऐसी बातें हो सकती हैं! ‘हर चीज वहाँ की सौम्य है सिवाय लोगों के जो दुष्ट हैं।’ और आप उन्ही दुष्ट लोगों को ईसाई बनाना चाह रहे हैं। और जब एक बार वे ईसाई बन जाएँगे, तो वे दुष्ट नहीं रहेंगे। कौन सा जादू है ईसावाद में! जब तक कोई इससे बाहर है वह दुष्ट है और जब वह ईसाई बन जाएगा, तो उसकी दुष्टता दूर हो जाएगी। और वह दुष्ट क्यों है, क्योंकि ‘मूर्ति पूजक अपने अँधेपन में लकड़ी और पत्थर के सामने ही झुकता है।’ वह लोग जब ईसा की मूर्ति या चित्र के आगे सर झुकाने लगेंगे, तो वे अच्छे हो जाएँगे। यह कैसी मूर्खतापूर्ण बात है।’

पुस्तक में भारत के स्वयंभू चर्च, भ्रष्ट आचरण और मतांतरण, पुर्वोत्तरीय पर्यटन पर ईसावाद का ग्रहण, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा और आसाम का ईसावादियों द्वारा कितना भयाभय सांस्कृतिक संहार किया गया है उसको लेकर लेखक ने शोधपूर्ण तरीके से इस पुस्तक के माध्यम से ईसावाद के शिक्षा और सेवा के नाम पर चलने वाले पाखंड और षड्यंत्र का पर्दाफास करने का एक साहसी प्रयास किया है। साथ ही साथ क्या जापान और भारत में ईसावाद असफल रहा? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए एक पूरा अध्याय भी लिखा है। जो इस पुस्तक को अंग्रेजी भाषा में लिखूं तो ‘आईकैचिंग’ बनाता है।

पुस्तक का अंतिम अध्याय अब क्या किया जाए? इस पुस्तक की आत्मा है क्योंकि साधारणतः इतिहास संबंधी शोधपूर्ण पुस्तकों में यह बताने की चेष्टा की जाती है कि ऐसा हुआ, जिसके कारण आज यह हो रहा है। ये सही है कि लेखक ने इस पुस्तक में इसी परम्परा का पालन किया है लेकिन अंतिम अध्याय अब क्या किया जाए? लिखकर परंपरा का नवीनीकरण करने का सफल प्रयास किया है। इस अध्याय में लेखक ने पाठक के लिए ईसावाद के षड्यंत्र से उत्पन्न समस्यायों का शोधपूर्ण समाधान प्रस्तुत किया है। भारत के बहुसंख्यक हिन्दू सामज को इस सत्तालोलुप षड्यंत्र से कैसे मुक्ति मिल सकती है इस अंतिम अध्याय में बताने का उत्कृष्ट प्रयास लेखक द्वारा किया गया है। मेरी बात अगर हिन्दू संगठन और जागरण करने वाले संगठनों तक पहुंचे तो उनको डॉ शैलेन्द्र कुमार की इस साहसिक और अनुपम कृति,’ईसावाद और पूर्वोत्तर का सांस्कृतिक संहार’ पुस्तक को प्रसाद की तरह बांटना चाहिए। यह कार्य सबसे पहले ईसावाद के चपेट में आने वाले वर्तमान क्षेत्रों में जितनी जल्दी शुरू किया जाए उतना अच्छा। संक्षेप में लिखूं तो मानवता के प्रति विद्वेष रखने वाले ईसावादियों द्वारा पिछली पांच शताब्दियों से चलाये जा रहे सांस्कृतिक संहार अभियान का पर्दाफास यह पुस्तक पूर्ण रूप से करती है और साथ ही दुनियाभर की मूल सभ्यताओं को संग्राहलयों में पहुँचाने वाले ईसावादियों के कुटिल और मानवता विरोधी घातों से बचने के तरीके भी पाठकों को बताती है। कुम्भकर्ण निद्रा में सोये हिन्दू समाज को जगाने का काम यह पुस्तक करेगी, वहीं ईसावाद या मोहम्मदवाद के अनुयायियों को आत्मचिंतन और आत्मनिरीक्षण के लिए विवश करेगी।

यह पुस्तक निम्नलिखित लिंक से प्राप्त की जा सकती है :

https://garudabooks.com/eesawad-aur-purvottar-bharat-ka-sanskritik-sanhar-

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Dr. Mahender Thakur

The author is a Himachal Based Educator, columnist, and social activist. Twitter @Mahender_Chem Email mahenderchem44@gmail.com

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2 Comments

  1. Mukesh Kumar says:

    Thanks Mahender ji for insights of the book and the expansive strategies of abrahamic religions. Yes their hqnds are soaked in red bl00d.

  2. Aparna Jha says:

    बहुत ही बेहतरीन पुस्तक समीक्षा। पुस्तक के परत दर परत, एक बर्क की मानिंद उल्लेख किया गया है इस समीक्षा में। एक अनमोल शोध आधारित पुस्तक की उतनी ही पुष्टि करती दुरुस्त समीक्षा

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