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हर्षद मेहता और नब्बे के दशक का सिस्टम एक ही सिक्के के दो पहलू थे

मूवी रिव्यू

हिन्दी फिल्मों के इतिहास में स्कैम 1992 -द हर्षद मेहता स्टोरी जैसी फिल्म आज तक नहीं बनी थी। शेयर बाज़ार के उतार-चढ़ाव और जोखिम पर ये फिल्म एक सर्च लाइट डालती है। इस सर्च लाइट की रोशनी में हम नब्बे के दशक में घटे एक महाघोटाले की कथा को सिलसिलेवार ढंग से घटते देखते हैं। इस महाघोटाले के कई पहलू थे, जो वक्त की तहों में कहीं दबे रह गए थे।

निर्देशक हंसल मेहता की ये फिल्म दो कथानकों के ब्रिज पर खड़ी दिखाई देती है। एक कथानक शेयर बाज़ार के बेताज बादशाह हर्षद मेहता के जीवन पर आधारित है, तो दूसरा भारत के सिस्टम की सड़ांध को सतह पर लाकर दिखाता है। इस तरह ये फिल्म दो कथानकों को एक ही पुल पर ला खड़ा करती है क्योंकि हर्षद और नब्बे के दशक का सिस्टम एक ही सिक्के के दो पहलू थे।

चालीस पार हो चुके दर्शकों के लिए हर्षद मेहता और सूटकेस काण्ड नया नहीं है लेकिन युवा दर्शकों के लिए ये बिलकुल ही नया विषय है। हर्षद मेहता मुंबई के घाटकोपर के छोटे से फ़्लैट में रहने वाला एक गुजराती युवा था। उसको मन में ये विश्वास था कि वह शेयर बाज़ार में अपना कॅरियर बना सकता है।

मन में सफल होने का विश्वास लेकर हर्षद स्टॉक मार्केट की सीढ़ियां चढ़ जाता है। तीक्ष्ण बुद्धि और व्यापारिक दिमाग के बल पर वह कम वक्त में शेयर बाज़ार की बड़ी ताकत बनकर उभरता है। 1990 तक उसकी स्थिति इस मार्केट में बहुत मजबूत हो जाती है।

उस दौर में कहा जाता था कि हर्षद पत्थर को छू ले तो सोना बन जाता था। हर्षद कम समय में भारतीय बैंकिंग सिस्टम की खामियां जान गया था। इन खामियों का लाभ उठाकर उसने चार हज़ार करोड़ के घोटाले को अंजाम दिया था।

वह हर्षद मेहता ही था, जिसने मीडिया के सामने तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव पर आरोप लगाया था कि उसने राव को एक करोड़ रुपये के नोटों से भरा सूटकेस पहुंचाया था। निश्चित ही उस दौर के कई नेता हर्षद के साथ शामिल थे लेकिन केवल हर्षद को ही जेल हुई।

ये शुभ संकेत है कि स्तरीय निर्देशक ओटीटी पर फ़िल्में बना रहे हैं। इसका लाभ ये हुआ है कि एकता कपूर की भद्दी नीली फिल्मों की अपेक्षा इस प्लेटफॉर्म पर अच्छी फ़िल्में देखने को मिल रही हैं। हंसल मेहता की दस किश्तों की ये पेशकश फिल्म निर्माण के सारे पहलुओं पर खरी उतरती है।

एक स्मूद स्क्रीनप्ले को उन्होंने तन्मयता के साथ परदे पर पेश किया है। हर्षद मेहता की निजी ज़िंदगी के साथ-साथ ट्रेक पर स्टॉक मार्केट की कहानी भी चलती है। मुझे ये देखकर आश्चर्य हुआ कि शेयर मार्केट जैसे जटिल विषय को उन्होंने सुंदर ढंग से दर्शकों को समझाया है।

एक बोरिंग विषय पर होने के बावजूद फिल्म कहीं बोर नहीं करती, कहीं नहीं अटकती। फिल्म की ग्रिप ऐसी है कि एक बार शुरु करने के बाद आप इसके अंत पर जाकर ही थमेंगे। फिल्म मेकिंग के विद्यार्थियों को ये फिल्म देखनी चाहिए, ताकि वे जान सके कि किसी नीरस विषय को सुरुचिपूर्ण कैसे बनाया जा सकता है।

फिल्म के सभी कलाकारों ने स्तरीय अभिनय किया है। हर्षद मेहता का किरदार निभा रहे प्रतीक गाँधी हिन्दी सिनेमा के लिए भविष्य में एक थाती बन सकते हैं। उन्होंने स्वाभाविक अभिनय किया है। अधिकतर गुजराती फिल्मों में अभिनय कर चुके प्रतीक की हिन्दी सिनेमा में ये पहली प्रभावी प्रस्तुति है।

वे बोर्न एक्टर हैं। उन्हें आँखों से अभिनय करते आता है। उनका अंडर प्ले भी निखरा हुआ है। फिल्म में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्टर की भूमिका में श्रेया धन्वंतरि ने कमाल ही किया है। इससे पहले वे मनोज वाजपेयी की फैमिली मैन में दिखाई दी थी लेकिन नोटिस नहीं की गई थी।

सुचेता दलाल की भूमिका में उन्होंने जान फूंक दी है। एक निष्ठावान पत्रकार के चरित्र को उन्होंने बखूबी निखारा है। एक भ्र्ष्ट कारोबारी को जेल नहीं पहुंचा पाने की बेचैनी को वे स्वाभाविक ढंग से दिखाती हैं। निखिल द्विवेदी, सतीश कौशिक और विशेष रुप से रजत कपूर ने परदे पर आग ही लगा दी है।

के माधवन के किरदार में रजत कपूर जब परदे पर आते हैं तो कोई भी कलाकार उनकी प्रखरता के आगे टिक नहीं पाता। यूँ तो वे अपना हर किरदार शानदार ढंग से निभाते हैं लेकिन इस फिल्म के किरदार से उन्होंने मील के पत्थर पर अपना नाम लिखाया है। सिस्टम में रहते हुए, सिस्टम से नाराज ये सीबीआई अधिकारी दर्शक के मन में घर बना लेता है।

ये फिल्म युवा दर्शकों को और विशेष रुप से युवा पत्रकारों को अवश्य देखनी चाहिए। ये देखकर वे जान सकेंगे कि पत्रकारिता की राह कितने संघर्षों से भरी है। उन्हें इस फिल्म से ये अनुमान लगाने में सफलता मिलेगी कि क्या उनके भीतर भी सुचेता की तरह कोई चिंगारी भड़क रही है, जो सिस्टम की सड़ांध को जलाकर राख कर देना चाहती है।

ये एक मुकम्मल फिल्म है। फिल्म मेकिंग के लिहाज से इसमें गलतियां बहुत कम की गई हैं। आर्ट डायरेक्शन इतना सुंदर है कि कई दृश्यों में हम खुद को उस बीते हुए दशक में खड़े महसूस करते हैं। यदि आप वास्तविक विषयों और चरित्रों पर बनी ऑफबीट फ़िल्में पसंद करते हैं तो ये फिल्म आपके लिए ही बनाई गई है। विशुद्ध मनोरंजन की तलाश करने वालों को इसमें कुछ नहीं मिलेगा।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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