Movie Review: ‘जर्सी’ दिल की धड़कनों के साथ दौड़ती है

विपुल रेगे। शाहिद कपूर और निर्देशक गौतम किन्नौरी की फिल्म ‘जर्सी’ का बजट क्या था और ये कितना कलेक्शन करेगी, ये प्रश्न इसके रिलीज होते मिट गए हैं। कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं, जिनका कलेक्शन और हिट-फ्लॉप का तमगा कोई मायने नहीं रखता। जर्सी एक ऐसी ही फिल्म है। ये आपके दिल की धड़कनों के साथ दौड़ती है। दशकों में ऐसी फ़िल्में आती हैं, जो चुपचाप दाखिल होती है और जाते-जाते एक तूफ़ान की शक़्ल अख़्तियार कर लेती है।

निर्देशक ने फिल्म रिलीज होने से पूर्व ही स्पष्ट कर दिया था कि जर्सी बॉयोपिक नहीं है। इसकी प्रेरणा कुछ खिलाडियों के जीवन संघर्ष से ली गई है। अर्जुन तलवार पंजाब का क्रिकेट खिलाड़ी है। वह एक धुरंधर बल्लेबाज़ है। रणजी ट्राफी में रिकार्ड बनाने के बाद भी उसका चयन आगे के लिए नहीं होता। इस कारण वह क्रिकेट छोड़ एक सरकारी नौकरी कर लेता है।

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सरकारी नौकरी में गबन का आरोप लगने के बाद वह सस्पेंड कर दिया जाता है। अब वह एक बेरोजगार और निर्वासित जीवन बिता रहा है। घर का खर्च और बेटे की जिम्मेदारी पत्नी उठा रही है। एक दिन अर्जुन के जीवन में कुछ ऐसा घटित होता है कि वह 36 वर्ष की आयु में क्रिकेट में वापसी करने का निर्णय लेता है। निर्देशक गौतम किन्नौरी इसी टाइटल के साथ इस फिल्म को तेलुगु में बना चुके हैं।

सन 2019 में प्रदर्शित हुआ इसका तेलुगु संस्करण हिट रहा था। एक खिलाड़ी का फील्ड से बाहर होना और फिर संघर्ष कर वापस लौटकर अपनी प्रतिभा को सिद्ध करना फिल्म की सेंट्रल थीम है। निर्देशक गौतम किन्नौरी ने एक मंझे हुए निर्देशक की तरह इस खेल फिल्म को प्रस्तुत किया है। शाहिद कपूर का अविस्मरणीय अभिनय, एक सशक्त स्क्रीनप्ले, पंकज कपूर के अभिनय के शहद के बल पर जर्सी दर्शक के दिल पर हक से राज करती है।

एक भी पल ऐसा नहीं आता, जहाँ फिल्म से निर्देशक की पकड़ ढीली होती हो। स्क्रीनप्ले स्वयं गौतम ने लिखा है। इस अद्भुत स्क्रीनप्ले के बिना जर्सी तो जैसे बिना आत्मा का शरीर हो जाती। शाहिद कपूर आज 41 वर्ष के हैं और अब जाकर उनका संघर्ष सफल हो रहा है। ऐसा लगता है जर्सी के नायक अर्जुन और शाहिद की कहानी मिलती-जुलती है। शाहिद ने अपना करियर ग्रुप डांसर के रुप में शुरु किया।

दिल तो पागल है और ताल में उन्होंने डांसर की भूमिका निभाई लेकिन नाम कहीं नहीं आया। एक स्थापित अभिनेता के बेटे ने नेपोटिज्म का सहारा न लेकर संघर्ष किया। सन 2003 में इश्क-विश्क से उन्हें पहला ब्रेक मिला। तबसे लेकर आज तक उन्होंने बतौर अभिनेता बार-बार खुद को सिद्ध किया है। कबीर सिंह के बाद अब शाहिद जर्सी में अभिनय का शहद बन गए हैं।

अर्जुन के कैरेक्टर को किस तमीज़ के साथ उन्होंने परदे पर उतारा है, वह देखने योग्य है। पंकज कपूर बेमिसाल रहे हैं। उनकी और शाहिद की केमेस्ट्री पर्दे पर खूब जमती है। पंकज कपूर ने एक क्रिकेट कोच का किरदार निभाया है। मृणाल ठाकुर के पैर अब अभिनय में जमने लगे हैं। सुपर 30 के बाद उन्हें ऐसी फिल्म मिल गई है, जहाँ से वे इंडस्ट्री में मजबूती के साथ जम सकती हैं।

फिल्म का सबसे सशक्त भाव ये है कि ये एक सार्थक संदेश देती है। जर्सी सिखाती है कि आयु के किसी भी दौर में आप वापसी कर सकते हैं। पहले दिन के शो में मैंने कुछ दर्शकों को फिल्म के दौरान रोते हुए पाया। यही सिनेमा की शक्ति है। जब आप सिनेमा की शक्ति को समझ जाते हैं तो आप या तो राजामौली हो जाते हैं या गौतम किन्नौरी हो जाते हैं। सिनेमा की शक्ति प्रबल है, इस बात को जर्सी सिद्ध करती है। इसका अंत झटका देने वाला और बहुत मार्मिक है। उसी अंत पर जर्सी को मुकम्मल होना था।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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