अंग्रेजी पत्रकारों को हिंदी समझ में नहीं आती, इसलिए अर्थ का अनर्थ करने में माहिर हैं!



Posted On: November 11, 2018 in Category:
Sandeep Deo
Sandeep Deo

अंग्रेजी लेखकों और पत्रकारों की सबसे बड़ी दिक्कत है कि वह हिंदी ठीक से समझ नहीं पाते, इसीलिए अर्थ को अनर्थ करने में भी देर नहीं लगाते। इतिहासकार और प्रसिद्ध लेखिका मीनाक्षी जैन की बहन संध्या जैन के साथ भी यही दिक्कत है। संध्या जैन और उनके भाई सुनील जैन दोनों अंग्रेजी पत्रकार हैं। इन दोनों ने अमेजन के एक आम पाठक के रिव्यू को आधार बनाकर अयोध्या पर लिखी हेमंत शर्मा की पुस्तक युद्ध में अयोध्या को लेकर आरोप लगाया है कि यह पुस्तक उनकी बहन मीनाक्षी जैन की पुस्तक को चुरा कर लिखी गई है। इनकी गंभीरता देखिए कि इन्होंने इतिहास के घटनाक्रम पर अपना दावा प्रस्तुत करते हुए कह दिया है कि यह घटनाक्रम उनकी बहन ने पहले खोजे? जबकि यह सारा दस्तावेज भारतीय अभिलेखागार में तो मौजूद है ही, इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा अयोध्या पर आए फैसले और गजिटियर में भी मौजूद है। साहित्यिक चोरी तब मानी जाती है जब एक लेखक दूसरे लेखक के विषय और विषय वस्तु दोनों को यथावत उठा ले? जबकि मैं अपने पिछले लेख में स्पष्ट कर चुका हूं कि मीनाक्षी जैन और हेमंत शर्मा की पुस्तक का विषय भले अयोध्या हो, लेकिन दोनों के विषय वस्तु में कहीं कोई साम्य नहीं है। मीनाक्षी जैन की किताब में ‘एकेडमिक अयोध्या’ है, तो हेमंत शर्मा की पुस्तक में ‘जन-अयोध्या’।

चूंकि मैंने दोनों ही पुस्तक पढ़ी है और दोनों के विषय वस्तु में कहीं से कोई साम्य नहीं है, इसलिए एक पत्रकार और लेखक के नाते समाज के प्रति मेरी यह जिम्मेदारी है कि मैं सच पाठकों समक्ष रखूं और वही मैंने अपने एक लेख में किया। लेख का लिंक मैं पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं, ताकि पाठक एक बार पढ़ कर यह तय कर सकें कि क्या मेरी भाषा में कहीं कोई अभद्रता है? लेकिन संध्या जैन का दावा है कि मैंने उनके परिवार के खिलाफ ‘अब्यूजिव लैंग्विज’ का प्रयोग किया है।

संध्या के इस आरोप के बाद मेरा यह विश्वास और अटल हो गया है कि सामने के लिखे को भी झुठलाने और फिर ट्वीटर के जरिए प्रोपोगंडा फैलाने में अंग्रेजी पत्रकारों को महारत हासिल है। हिंदी के लेखक या पत्रकार इसमें उनका मुकाबला शायद ही कर पाएं। मैं इस विवाद से मीनाक्षी जैन को अलग रखता हूं, क्योंकि वह बेहद सम्मानित लेखिका हैं और मैं उनके लेखन को बहुत पसंद करता हूं। अपने पिछले लेख में भी मैंने मीनाक्षी जी को बेहद सम्मान देते हुए लिखा है।

संध्या जैन ने सबसे पहले ट्वीटर पर गिरोहबंदी कर हेमंत शर्मा के मौलिक लेखन पर साहित्यिक चोरी का आरोप लगाते हुए प्रोपोगंडा फैलाया, फिर यह प्रोपोगंडा फैलाया कि इंडिया स्पीक्स डेली ने उनके परिवार के खिलाफ ‘एब्यूजिव लैंग्विज’ का उपयोग किया, जबकि दोनों में कहीं कोई सच्चाई नहीं है। उसके बाद उन्होंने पी.गुरु वेब पर अंग्रेजी में एक लेख लिखकर अपने झूठ को सच प्रमाणित करने के लिए लेख लिखा, फिर मुझे व्हाट्सअप और मेल किया, और मुझ पर हमलावर होने का आरोप जड़ दिया। संध्या जैन ने मेल में मुझ पर जो आरोप लगाया है, पहले मैं उसका बिंदुवार जवाब दे देता हूं। दूसरे लेख में मैं इतिहास के घटनाक्रम पर उनके काॅपी राइट के दावे की पोल खोलूंगा।

संध्या जैन के आारोप-

Dear Mr Sandeep Deo
It has come to my attention that your web portal, IndiaSpeaks, carried an attack on my family at the instance of Mr Hemant Sharma, that you are based in Delhi as we are, but did not have the courtesy to contact us for our side of the story. In essence, there is no substance, in the attack, and merely tries to project Sharma as a victim because he is a former Hindi journalist, who incidentally has a very controversial personal history.

Anyway, I have penned a factual response to his calumny and will appreciate if you could carry the same on your web portal. It could be carried as it is in English, or your staff me do a translation, respecting the integrity of the original. I leave that to you.

I do hope you will do me this courtesy and will respond regarding your decision either way.

Thanks and warm regards
Sandhya Jain
Columnist, The Pioneer

मेरा जवाबः

संध्या जैन जी शायद आपको हिंदी समझने में दिक्कत होने की वजह से आपने मीनाक्षी जैन जी के लेखन के प्रति मेरे लेख में सम्मान को अटैक समझ लिया है। आपने लिखा है कि मैंने आपके परिवार पर अटैक किया, जबकि पूरा लेख पढ़िए, मैंने कहीं कोई अटैक नहीं किया है। हां, आपके और आपके भाई साहब सुनिल जैन, जो कि खुद भी एक प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, यह जरूर लिखा है कि आपको एक अनाम से अमेजन रिव्यूअर के कमेंट के आधार पर इतना बड़ा अरोप लगाने से पहले अपनी बहन और हेमंत शर्मा, दोनों की पुस्तक जरूर पढ़ लेनी चाहिए थी। रिव्यूअर न कोई साहित्यकार है, न इतिहासकार और न पत्रकार कि आप उसके आरोप को शब्दशः उठाकर ट्वीटर पर किसी के खिलाफ अभियान चलाएं। और चलाएं भी तो कम से कम जिस पर आरोप लगा रही हैं, उस लेखक की बात को भी सामने रखें, लेकिन आपने तो पत्रकारिता की इस छोटी-सी बात को भी ताक पर रखकर एक तरफा अभियान चला दिया। आपने उस रिव्यूअर को टैग करते हुए ट्वीट भी किया कि मैंने आपके परिवार के लिए अब्यूजिव लैंग्विज का उपयोग किया है। संध्या जी मैं चाहता हूं कि यदि आपको हिंदी पढ़ने में दिक्कत हो रही हो, तो किसी हिंदी के जानकार से मेरा लेख पढ़वा कर वह वाक्य अंडर लाइन कर सार्वजनिक करें, जिसमें मैंने आपके परिवार के लिए अब्यूजिव लैंग्विज का प्रयोग किया हो। मैं भाषा की मर्यादा जानता हूं।

आपका दूसरा आरोप है कि मैं दिल्ली में रहता हूं, लेकिन स्टोरी लिखने से पूर्व आपका पक्ष या बयान नहीं लिया। संध्याजी क्या एक अनाम रिव्यूअर के आरोप के आधार पर हेमंत शर्मा को साहित्यिक चोर कहने से पूर्व आपने उनका पक्ष लिया था? वह भी दिल्ली-एनजीआर में ही रहते हैं। क्या आपने उनसे संपर्क कर अपने ट्वीट या अभी पीगुरु पर लिखे अपने लेख में उनका पक्ष छापा है? आप और आपके भाई साहब बड़े पत्रकार हैं और पत्रकारिता का यह साधारण सा नियम है कि जिस पर आरोप लगाया जाए, उसका पक्ष भी पाठकों के समक्ष रखा जाए, लेकिन आप दोनों भाई-बहन ने तो एक लेखक को साहित्यिक चोर कह दिया, और उनका बयान तक नहीं लिया? आपके द्वारा उनका बयान लेना ज्यादा जरूरी था, क्योंकि आप उन पर सीधे-सीधे साहित्यिक चोरी का आरोप लगा रही हैं। लेकिन आपने तो बिना उनका बयान लिए ही उन्हें चोर सााबित करने का अभियान ट्वीटर और अब एक अंग्रेजी वेबसाइट के जरिए चला दिया! फिर आप दूसरों से यह उम्मीद कैसे कर सकती हैं? क्या यह पाखंड नहीं है?

दूसरी बात, संध्याजी बयान या पक्ष हमेशा आरोप लगाने पर लिया जाता है, लेकिन मैंने तो अपने लेख में किसी तरह को कोई आरोप न तो मीनाक्षी जैन जी पर या न तो आप सब पर लगाया है। मैंने तो केवल मीनाक्षी और हेमंत, दोनों की पुस्तक की विषय वस्तु को पाठकों के समक्ष रखा भर है। एक तरह से मैंने दोनों पुस्तकों की समालोचना की है, और समालोचना के लिए लेखक का पक्ष नहीं लिया जाता, केवल किताब की विषय वस्तु पर फोकस किया जाता है। मैं खुद 18 साल से पत्रकार हूं, इसलिए पत्रकारिता की इस मर्यादा से भली-भांति वाकिफ हूं। हां, आप और सुनील जी ने पत्रकारिता की मर्यादा को ताक पर रखा, क्योंकि आपने किसी पर एक तरफा आरोप बिना उसका पक्ष जाने ही लगा दिया! आप किसी समीक्षक, आलोचक या समालोचक द्वारा किसी पुस्तक की समीक्षा में लेखक का पक्ष जानते हुए देखा है? इसलिए मेरे लेख में न तो मीनाक्षी जैन जी का और न ही हेमंत शर्मा जी का ही कोई पक्ष है।

तीसरी बात, आपने लिखा कि मेरे लेख में कोई तथ्य नहीं है। यदि तथ्य नहीं होता, तो आप इतना विचलित होती? यह तो इंडिया स्पीक्स द्वारा सच्चाई उदघाटन के बाद ही आपने पीगुरु पर आपने अयोध्या के इतिहास पर मीनाक्षी जैन जी का दावा प्रस्तुत करने वाला लेख लिखा और इंडिया स्पीक्स के खिलाफ ट्वीटर पर अभियान चलाया है। यह इंडिया स्पीक्स में दिए तथ्यों का असर है कि आपको पूरे इतिहास के घटनाक्रम पर अपना दावा प्रस्तुत करने के लिए लेख लिखना पड़ रहा है, जो बेहद हास्यास्पद है।

चौथी बात, आपने लिखा है कि मैं हेमंत शर्मा को एक पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूं। माननीय, आपने एक लेखक के मौलिक लेखन पर अपने परिवार का दावा भी प्रस्तुत कर दिया, और आप चाहती हैं कि उस किताब को पढ़ने वाला उसका पक्ष भी न रखे? अभी तो दो लाइन पहले आप कह रही थीं कि मैंने आपका पक्ष नहीं रखा, और अभी कह रही हैं कि मैंने हेमंत का पक्ष क्यों रखा? कमाल है!

पांचवीं बात, आपने वही गलती की है, जो आपके शायद उस जानकार रिव्यूर ने की है। आपने आखिरी लाइन में हेमंत शर्मा पर निजी हमला कर दिया कि उस पत्रकार का विवादास्पद इतिहास रहा है! संध्या जी आप तय कर लीजिए कि आपको हेमंत शर्मा पर बात करनी है या फिर उनकी किताब पर। जहां तक मुझे लगता है कि एक सम्मानित लेखिका के परिवार को, जो खुद पत्रकारिता से जुड़ा है, उसे किताब की विषय वस्तु पर ही फोकस करना चाहिए। जहां आपका फोकस लेखक के निजी जिंदगी पर होगा, यह तय मान लिया जाएगा कि आपको हेमंत शर्मा से पर्सनल प्राॅब्लम है। अच्छा हो कि हम किताब की विषय वस्तु पर ही फोकस करें ताकि अयोध्या पर लिखी, दो बेहतरीन पुस्तक पर एक स्वस्थ्य बहस चल सके।

छठी बात, आपने कहा कि आपके अंग्रेजी में लिखे लेख को मैं अपने इंडिया स्पीक्स पर जगह दूं। अवश्य देता, यदि यह पहले इंडिया स्पीक्स के लिए लिखा जाता। गूगल मोनेटाइजेशन के कारण मैं इसे करने में असमर्थ हूं। यह प्राॅक्सी की श्रेणी में आ जाएगा, इसलिए क्षमा प्रार्थी हूं। लेकिन मैं अपने अगले लेख में आपके इस लेख के पूरे पक्ष को हिंदी में सामने रखूंगा, यह आपसे वादा करता हूं।

उम्मीद है कि आप मेरे इस जवाब को निजी नहीं लेंगी, क्योंकि हम एक-दूसरे को जानते भी नहीं। इसलिए हम पुस्तक के विषय वस्तु पर एक स्वस्थ्य बहस करें, यही दोनों किताबों, पाठकों और सबसे अधिक अयोध्या के हित में है। धन्यवाद!

नोट- अगले लेख में मैं आपको पीगुरु पर संध्या जैन जी द्वारा रखे गये पक्ष और उससे जुड़ी सच्चाई को परत-दर-परत सामने रखूंगा। इंतजार कीजिए…

URL: On Hemant Sharma’s book controversy, Sandeep Dev responds to Sandhya Jain

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Sandeep Deo
Journalist with 18 yrs experience | Best selling author | Bloomsbury’s (Publisher of Harry Potter series) first Hindi writer | Written 7 books | Storyteller | Social Media Coach | Spiritual Counselor.