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Movie Review :रॉकेट बॉय्ज’ दर्शक के ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित हो जाती है

ओटीटी मंच : Sony liv

विपुल रेगे। निर्देशक अभय पन्नू की वेब सीरीज ‘रॉकेट बॉय्ज’ के आठ एपिसोड भारतीय सिनेमा की अमूल्य थाती बन गए हैं। स्वतंत्र भारत में विज्ञान के पहिये को गति देने वाले दो महान वैज्ञानिकों विक्रम साराभाई और होमी जहांगीर भाभा की कथा को सेल्युलाइड पर उतारना बड़ा ही दुरुह कार्य रहा होगा। उस बीते गौरवशाली कालखंड को सिनेमा की रील में ‘फ्रिज’ कर दिया गया है।

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इसकी फिल्म मेकिंग इतनी परफेक्ट है कि दर्शक मानो टाइम मशीन में बैठकर परतंत्र और स्वतंत्र भारत के बीच की सुखद और भावुक यात्रा कर लेता है। जैसे चाँद में कुछ दाग होते हैं, वैसे ही कुछ कमियों के बावज़ूद  ‘रॉकेट बॉय्ज’ दर्शक के स्पेस ऑर्बिट में सफलतापूर्वक स्थापित हो जाती है।इस वेब सीरीज की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि ये युवा दर्शकों से बखूबी संवाद करती है।

ये उन देशभक्ति की फिल्मों जैसी नहीं है, जिनमे हमारे महानायकों को सदा ही शिखर पर बैठा दिखाया जाता है, उनकी कमियों को छुपा लिया जाता है। वर्तमान पीढ़ी को भारत के अतीत की जानकारी होना इसलिए आवश्यक है क्योंकि इसी अतीत के आधार पर वे भारत का भविष्य रचेंगे। आज भारत नाभिकीय ऊर्जा में सतत विकास कर रहा है । आज भारत का स्पेस प्रोग्राम अमेरिका और रुस के साथ प्रतियोगिता करता है।

हमारी समस्त वैज्ञानिक उपलब्धियों के इस गगनचुंबी भवन की नींव में साराभाई, भाभा, रमन और कलाम के नाम के बहुमूल्य पत्थर जड़े हुए हैं। ‘रॉकेट बॉय्ज’ सन 1966 के कालखंड पर खुलती है और यहाँ से और पीछे परतंत्र भारत में जाती है। फिल्म हमें वह दौर दिखाती है, जब ब्रिटिश सरकार हमारे युवा वैज्ञानिकों को न अवसर देती थी और न ही वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए धन उपलब्ध करवाती थी।

कैम्ब्रिज में पढ़ रहे विक्रम साराभाई भारत वापस आते हैं और अपना कॅरियर शुरु करने का प्रयास करते हैं।  यहाँ उनकी भेंट एक अन्य वैज्ञानिक होमी जहांगीर भाभा से होती है। ये दोनों ही युवा भविष्यदृष्टा हैं और भारत को वैज्ञानिक उपलब्धियां देना चाहते हैं। विक्रम और होमी एक दिन इंस्टीट्यूट की छत पर ब्रिटिश ध्वज उतारकर भारतीय ध्वज लहरा देते हैं। इसका परिणाम बुरा होता है।

उनकी लैब को ब्रिटिश शासन सहायता देना बंद कर देता है और दोनों पर कोर्ट में प्रकरण भी चलाया जाता है। ‘रॉकेट बॉय्ज’ के हर एपिसोड के प्रसंग इतने कसे हुए हैं कि देर तक दर्शक के जेहन में दौड़ते रहते हैं। एक एक दृश्य पर निर्देशक की मेहनत दिखाई देती है। निर्देशक ने युवा दर्शकों को मनोरंजनक शैली में भारत का इतिहास बताया है, जो कि वर्तमान युवा पीढ़ी के लिए उचित शैली है। 

निर्देशक के सम्मुख ये चुनौती थी कि भौतिकी और नाभिकीय विज्ञान का सरलीकरण कर दर्शकों के सामने प्रस्तुत करे। विज्ञान के इस गाढ़े घोल को वे सरस शरबत नहीं बना सके हैं। फिल्म के तीस प्रतिशत संवाद अंग्रेजी में रखे गए हैं। चूँकि ये कहानी की मांग थी कि ऐसा किया जाए। यदि वहां अंग्रेजी न होती, तो वैज्ञानिक समुदाय का सही चित्रण नहीं हो सकता था।

विज्ञान से वास्ता रखने वालों के लिए ये वेबसीरीज मोक्ष प्राप्ति जैसी है। जिन युवाओं ने कभी भाभा और विक्रम साराभाई के बारे में पढ़ा होगा, अब वे इन महान व्यक्तित्वों से पूर्णतः परिचित हो गए हैं। देश में आधुनिक विज्ञान की नींव रखने वालों के जीवन को माइक्रोस्कोप से देखने जैसा अनुभव है ये वेब सीरीज। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, दर्शक इन चरित्रों से प्रेम करने लगता है।

पंडित जवाहरलाल नेहरु का चरित्र पहली बार सत्यता के करीब जान पड़ता है। वे उस भारत के प्रधानमंत्री थे, जिसे अभी उठकर खड़ा होना था। कई दृश्यों में नेहरु को असमंजस की स्थिति में दिखाया गया है। एपीजे अब्दुल कलाम का प्रसंग बहुत प्रभावित करता है। साराभाई और भाभा की प्रेम कहानी बड़े ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत की गई है। विशेष रुप से साराभाई का प्रेम प्रसंग बड़ी सुंदरता से प्रस्तुत किया गया है।

मृणालिनी और साराभाई एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में मिलते हैं। विक्रम को लगता है  कि इस परंपरावादी चित्ताकर्षक नृत्यांगना में वह ‘ग्रेविटी’ है, जिसकी उन्हें तलाश थी। होमी भाभा का प्रेम प्रसंग कल्पना के कतरों से मिलकर बनाया हुआ लगता है। होमी भाभा और परवाना ईरानी का अंतरंग रिश्ता निर्देशक से स्पष्टता मांगता अनुभव होता है।

परवाना उर्फ़ पिप्सी का अध्याय भाभा के जीवन से अलग नहीं किया जा सकता। ऐसे ही साराभाई के विवाह उपरांत एक रिश्ते को भी दिखाया गया है। जबकि कथा में वह नहीं दिखाया जाता तो भी अंतर नहीं पड़ता। इस फिल्म को देखने का हठ टीनएजर्स और युवाओं के बजाय बच्चे अधिक कर रहे हैं। यहाँ निर्देशक त्रुटि कर गया है।

यदि ये प्रसंग और दो चुंबन दृश्य फिल्म में नहीं होते तो आज हम छोटे बच्चों को ये प्रेरणादायी सीरीज दिखा सकते थे। ये भी मज़े की बात रही कि दो-तीन दृश्यों के चलते अब ये सीरीज छोटे बच्चों को नहीं दिखाई जा सकती, जबकि उन्हें इस सीरीज का पहला दर्शक होना चाहिए था। कभी-कभी एक दो दृश्य फिल्म के दर्शक वर्ग को इस तरह प्रभावित कर देते हैं।

‘रॉकेट बॉय्ज’ की एक और विशेषता है इसे एक विशेष कालखंड में सेट किया गया है। सामान्य रुप से हिन्दी फिल्मों में किसी विशेष कालखंड को दिखाने के लिए निर्देशक अतिरिक्त मेहनत नहीं करते हैं। कालखंड फिल्मों में इसके लिए बहुत श्रम करना होता है। ‘रॉकेट बॉय्ज’ के हर दृश्य को देखिए, आप स्वयं को उसी दौर में पाएंगे। निर्देशक ने बहुत से दृश्यों में ‘कलर करेक्शन’ या ‘कलर गार्डनिंग’ की है।

ऐसा इसलिए किया गया है कि दृश्यावली आज के आधुनिक कैमरों से शूट हुई न लगे। सभी कलाकारों ने सहज अभिनय दिखाया है। जिम सरभ(होमी भाभा), इश्वाक सिंह(विक्रम साराभाई), रेजिना कसांड्रा (मृणालिनी), अर्जुन राधाकृष्णन (एपीजे अब्दुल कलाम) को अब सारा भारत जानने लगा है।

कल तक ये सितारे नहीं थे लेकिन भारत के गौरवशाली कालखंड को अभिनीत करने के बाद वे सितारें बन चुके हैं। युवा दर्शकों को ये वेब सीरीज अवश्य देखनी चाहिए। इसे देखकर वे जानेंगे कि होमी और विक्रम आज हमारे प्रेरणा पुरुष क्यों बने हुए हैं।

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Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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