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यह उनका सदा का रूप था। अभी— अभी तो खूब खिल गया था, निखार आ गया था। लेकिन मुझे बचपन से याद है।

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जब उनके पास बहुत सुविधा भी नहीं थी तब भी लुटाने में उन्हें रस था। उनकी जो मेरे मन में यादें हैं पुरानी—पुरानी से पुरानी यादें— लुटाने की हैं। वे कोई बहुत धनी व्यक्ति नहीं थे। अति गरीबी से उठे थे। लेकिन लुटाने में उनका कोई मुकाबला न था। ऐसा कोई दिन न जाता जिस दिन मेहमानों को वे इकट्ठे न करते रहते हों। 

गांव भर उनकी प्रतीक्षा करता था। जो वहां से निकलता, वह जानता था कि वे बुलाएंगे भोजन के लिए। महीने, पंद्रह दिन में एकाध भोज—कि जिसमें सारे मित्रों को इकट्ठा कर लेना है। नहीं थी सुविधा। चाहे उधार भी लेना पड़े तो भी बांटना तो था। बांटने में उन्हें रस था। एक बार उन्हें बहुत नुकसान लग गया। मैंने उनसे पूछा कि इतना नुकसान झेल पाएंगे? उन्होंने कहा कि नुकसान मुझे लग ही नहीं सकता, क्योंकि मेरे पिताजी मुझे केवल सात सौ रुपया दे गए। 

जब तक सात सौ मेरे पास हैं तब तक तो मुझे डर ही नहीं। तब तक बाकी लेने—देने में मुझे कुछ हर्ज नहीं, क्योंकि अगर कहीं पिताजी से मिलना हो गया— पिताजी तो जा चुके थे—तो सात सौ रुपये, कह दूंगा कि तुमने जितने दिए थे उतने मैंने बचाए हैं, उससे ज्यादा का सवाल भी नहीं है। 

इसलिए जब तक सात सौ हैं तब तक मुझे चिंता नहीं है। बाकी सब खो जाएं तो कोई फिकर नहीं— आए और गए! न अपने थे, न रोक रखने का कोई सवाल था।और वे कहने लगे इतना पक्का है कि सात सौ नहीं जाएंगे। इतने तो बच ही जाएंगे। उस हालत में भी जब बहुत नुकसान था, मैं सोचता था कि शायद अब यह भोज और लोगों को बुलाना और लोगों को खीर खिलाना और मिठाइयां बुलवाना, यह बंद हो जाएगा। मगर वह बंद नहीं हुआ। 

मैंने उनसे कहा कि अब थोड़ा हाथ सिकोड़े। उन्होंने कहा कि छोटे—मोटे नुकसान के लिए कोई बड़ा नुकसान उठाऊं? ये छोटे—मोटे नुकसान हैं, लगते रहते हैं। लेकिन बांटने की जो प्रक्रिया है वह चलती रहे।जो है वह हम बांटते रहें। फिर इधर तो निखार बहुत आया था, क्योंकि इधर दस वर्षों से निरंतर वे ध्यान में गहरे से गहरे उतर रहे थे।

कुछ बातों में उनका रस प्रथम से था। मुझे जो उनकी पहली याद आती है, वह यही कि वे मुझे सुबह तीन बजे उठा लेते थे।  जब मैं बहुत छोटा था, जब तीन बजे सोने का वक्त, जब आंखें बिलकुल नींद से भरी होतीं, उठने का बिलकुल सवाल न उठता, जो उठाता वह दुश्मन मालूम पड़ता, वे मुझे तीन बजे उठा लेते और ले चले मुझे घुमाने।

वह उनकी मुझे पहली भेंट थी—ब्रह्ममुहूर्त। पहले—पहले तो बहुत परेशानी होती थी। जबरदस्ती घिसटता हुआ मैं जाता था, क्योंकि आंखों में नींद का खुमार। मगर धीरे— धीरे सुबह के सौंदर्य से संबंध जुड़ा। धीरे— धीरे समझ में आया कि वे सुबह की घड़ियां खोने जैसी नहीं हैं। उन सुबह की घड़ियों में परमात्मा जितना निकट होता है पृथ्वी के, शायद फिर कभी और नहीं होता। 

सुबह जब सारी प्रकृति जागती है, पौधे जागते हैं, पक्षी जागते हैं, पशु जागते हैं, सूरज जागता है— वह जागरण की वेला है। उस घड़ी को खो देना ठीक नहीं। उसी घड़ी तुम भी जाग सकते हो। जब सारा अस्तित्व जाग रहा है, तो जागने की उस बाढ़ में तुम्हारे भीतर का अंत: जागरण हो सकता है। उनकी भेंट भूल नहीं सकूंगा, यद्यपि कठिन थी बहुत। जो भी इस जीवन में सुंदरतर है, श्रेष्ठतर है, शिवतर है, सत्यतर है, वह पहले—पहले कड़वा होता है, पीछे—पीछे मिठास होती है। और जो भी असत्य है, अशिव है, असुंदर है, ऊपर—ऊपर मीठा होता है, अंततः जहर। 

इस सूत्र को याद रखना। नहीं तो पहली मिठास में ही लोग भटक जाते हैं। और एक बार उस मिठास में तुम गटक गए जहर को तो फिर जहर धीरे— धीरे तुम्हारे सारे शरीर को, तुम्हारे मन—प्राण को विनष्ट करने लगता है। सत्य कडुवा भी हो तो भी डरना मत, जल्दी ही मीठा हो जाएगा। मैं छोटा था तो अपने ननिहाल रहा बहुत दिनों तक। मेरे पिता और ननिहाल के बीच कोई बत्तीस मील का फासला था। न ट्रेन, न बस, न टैक्सी, उन दिनों वहां कुछ भी न था, रास्ता भी न था।

वे बत्तीस मील साइकिल चला कर मुझे देखने आते थे, मिलने आते थे। वर्षा के दिनों में तो बड़ी मुश्किल हो जाती, क्योंकि आधी दूर साइकिल को उन्हें कंधे पर खींचना पड़ता। जहां—जहां कीचड़ होती वहां साइकिल चलाना तो असंभव है, जहां कीचड़ न होती वहां साइकिल चला लेते, जहां कीचड़ होती वहां उलटे साइकिल को खुद पर ढोना पड़ता! मगर मुझे मिलने वे बत्तीस मील साइकिल से तय करके आते।

मैंने उनसे कहा भी इतना कष्ट न करें। मगर वह उनकी अंतर्भावना थी। प्रेम उनका स्वभाव था; उसके लिए कुछ भी सहना पड़े, कितना भी कष्ट सहना पड़े। उन्हें प्रेम में रस था। प्रेम के लिए कोई भी कीमत चुकाने को वे राजी थे। उसी प्रेम के पकते—पकते ही यह बुद्धत्व बन सका।  यह कुछ एक दिन में नहीं घट जाता है। धीरे— धीरे, शनै: —शनै: तुम्हारे भीतर तैयारी होती है, बीज टूटता है, अंकुर निकलते हैं, पत्ते आते हैं, फूल लगते हैं, फिर फल आते हैं। बुद्धत्व तो फल है।

तुमने जैसा उन्हें पाया उससे कुछ सीखो। ‘लवलीन हो गए थे वे परमात्म— भाव में
या उनमें वही ज्योति—रूप व्यक्त हो उठा।’
एक ही बात है, चाहे कहो बूंद सागर में गिर गई और चाहे कहो सागर बूंद में गिर गया।

कबीर कहते हैं
हेरत—हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ।
बुंद समानी समुंद में, सो कत हेरी जाइ।।

और फिर कहते हैं
हेरत—हेरत हे सखी, रह्या कबीर हिराइ।
समुंद समाना बुंद में, सो कत हेरी जाइ।।

बूंद समुद्र में समाए कि समुद्र बूंद में समाए, एक ही बात को कहने के दो ढंग हैं। तुम परमात्मा में लीन हो जाओ कि परमात्मा को अपने में लीन हो जाने दो, एक ही बात है। लेकिन सोचते ही मत रहो, विचारते ही मत रहो। कदम उठाओ।

‘सारल्य में समा गया बुद्धत्व दौड़ कर
ऐसा लगा भगवान स्वयं भक्त हो उठा।’

निश्चित ही वे सरल व्यक्ति थे। लगभग आधी सदी मैं उनके साथ रहा। सिर्फ एक बार मुझे चांटा मारा उन्होंने। बहुत मुश्किल है ऐसा पिता खोजना। उन्होंने सिर्फ एक बार मुझे चांटा मारा; वह भी कुछ खास चांटा नहीं था, एक चपत। 

फिर कभी नहीं मुझे मारा, क्योंकि वे बात समझ गए। और उन्हें बड़ा पछतावा हुआ, मुझसे क्षमा मांगी। कौन पिता अपने बच्चे से क्षमा मांगता है! वे समझ गए कि मैं उन घोड़ों में से नहीं हूं जिनको पीटना पड़ता है, कोड़े की छाया काफी है। मैं छोटा था तो मुझे बाल बड़े रखने का शौक था—इतने बड़े बाल कि मेरे पिता को अक्सर झंझट होती थी, क्योंकि उनके ग्राहक उनसे पूछते कि लड़का है कि लड़की? और उन्हें बड़ी झंझट होती बार—बार यह बताने में कि भई लड़का है। 

मुझे तो कोई चिंता नहीं होती थी। लड़की होने में क्या बुराई थी! मुझसे तो कभी उनका ग्राहक कह देता कि बाई जरा पानी ले आ, तो मैं ले आता। मगर उनको बहुत कष्ट होता, वे कहते कि बाई नहीं है। मेरे लड़के को तुम लड़की समझ रहे हो। तो लोग कहते, लेकिन इतने बड़े—बड़े बाल! तो उन्होंने मुझसे एक दिन कहा कि ये बाल काटो, कि दिन भर की झंझट है, और या फिर तुम दुकान पर आया मत करो।

घर—दुकान एक थे, तो जाने का कहीं कोई उपाय भी न था। और छुट्टी के दिन तो उनको बहुत मुश्किल हो जाती, वे कहते कि सुबह से सांझ तक मैं यह समझाऊं कि दूसरा काम करूं?  क्योंकि लोग पूछते हैं कि फिर इतने बड़े बाल क्यों? तो आप कटवा क्यों नहीं देते? तो तुम बाल कटवा डालो। मैंने उनसे कहा बाल तो नहीं कटेंगे। तो उन्होंने मुझे चपत मार दी। 

बस उस दिन मेरे उनके बीच एक बात निर्णीत हो गई, फैसला हो गया। मैं गया और मैंने सिर घुटवा डाला। जब मैं लौट कर आया, बिलकुल घुटमुंडा, चोटी भी नहीं।  उन्होंने कहा यह तूने क्या किया? मैंने कहा. मैंने बात जड़ से ही मिटा दी, अब दुबारा बाल नहीं बढ़ाऊंगा। उन्होंने कहा लेकिन इस तरह सिर घुटाया तब जाता है जब पिता मर जाते हैं। मैंने कहा जब आप मरेंगे तो मैं नहीं घुटाऊंगा। बात खत्म हो गई।

सो तुम देख रहे हो, वे मर गए, मैंने नहीं घुटाया। एक वायदा था वह निभाना पड़ा। वे भी समझ गए कि मुझसे सोच—समझ कर बात करनी चाहिए। ऐसा चांटा मारना आसान नहीं है! अब लोग उनसे पूछने लगे कि यह क्या हुआ? क्योंकि गांव, छोटा गांव, वहां सिर घुटाया ही तब जाता है जब पिता मर जाए। लोग कहने लगे, आप जिंदा हैं और यह आपके लड़के को क्या हुआ? 

अब मैं और वहीं बैठने लगा दुकान पर जाकर। उन्होंने मुझसे कहा कि मैं हाथ जोड़ता हूं। इससे तो बाल ही बेहतर थे, कम से कम मैं जिंदा तो था, अब ये मुझसे पूछते हैं कि आप क्या मर गए! यह लड़के ने बाल क्यों घुटाए? मगर उस दिन बात निर्णय हो गई, मेरे और उनके बीच हिसाब साफ हो गया। एक बात पक्की हो गई कि मेरे साथ और बच्चों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता। 

या तो इधर या उधर, या तो इस पार या उस पार। मैंने उनसे कहा, या तो बाल बड़े रहेंगे या बिलकुल नहीं रहेंगे। आप चुन लो उन्होंने कहा, जो तेरी मर्जी। अब यह मैं बात ही नहीं उठाऊंगा। मैंने कहा यही बात नहीं, आप और बातों के संबंध में भी साफ कर लो। जब मैं विश्वविद्यालय से वापस लौटा तो मित्र उनसे पूछने लगे कि बेटे का विवाह कब करोगे? तो उन्होंने कहा मैं नहीं पूछ सकता। क्योंकि अगर उसने एक दफे नहीं कह दिया तो बात खत्म हो गई, फिर हां का कोई उपाय न रह जाएगा। तो वे अपने मित्रों से पुछवाते थे।

 अपने मित्रों से कहते कि तुम पूछो, वह एक दफे हां भरे, कुछ हां की थोड़ी झलक भी मिले उसकी बात में, तो फिर मैं पूछूं। क्योंकि मेरा उससे निपटारा एक दफे अगर हो गया, नहीं अगर हो गई तो बात खत्म हो गई। सो आप देखते हैं. न उन्होंने मुझसे पूछा, तो परिणाम यह हुआ कि अविवाहित रहना पड़ा। उन्होंने पूछा ही नहीं।

मित्र उनके पूछते थे, मैं उनसे कहता कि उनको खुद कहो कि पूछें। यह बात मेरे और उनके बीच तय होनी है, तुम्हारा इसमें कुछ लेना—देना नहीं है, तुम बीच में मत पड़ो। सो न उन्होंने कभी पूछा, न झंझट उठी। सरल थे, बहुत सरल थे। और सरलता चीजों को समग्रता से ले लेती है। एक ही छोटी सी घटना ने, वह चांटा मारने ने एक बात उन्हें साफ कर दी कि मेरे साथ साधारण बच्चों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता। 

मुझे डांटना—डपटना भी हो तो सोच लेना पड़ेगा। मुझसे यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा करो वैसा करो। तो फिर वे अगर मुझसे कभी कुछ कहते भी तो कहते, ऐसा मेरा सुझाव है, कर सको तो करना, नहीं कर सको तो मत करना। मैं कोई आशा नहीं दे रहा हूं। फिर उन्होंने मुझे कोई आज्ञा नहीं दी।

मेरे उनके बीच जो संबंध बनता चला गया, वह साधारण पिता और बेटे का संबंध नहीं रहा। वह बहुत जल्दी खत्म हो गया— साधारण बेटे और पिता का संबंध। शरीर का संबंध बहुत जल्दी समाप्त हो गया, आत्मा का संबंध निर्मित होता चला गया। सरल थे बहुत। लोग उनसे कहते थे कि इतने लोग संन्यास ले लिए— मेरी मां ने भी संन्यास ले लिया— आप क्यों संन्यास नहीं लेते? वे कहते, मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं। जिस दिन यह सहज भाव उठेगा उसी क्षण ले लूंगा। और सुबह छह बजे एक दिन लक्ष्मी भागी हुई आई। वे यहीं ठहरे थे, लक्ष्मी के कमरे में ही रुके थे, पीछे जो कमरा है मुझसे उसमें ही रुके हुए थे।

 छह बजे लक्ष्मी भागी आई, उसने कहा कि वे कहते हैं— संन्यास, इसी क्षण, अभी! क्योंकि वे तीन बजे से रोज ध्यान करने बैठ जाते थे। और उस दिन अंतर्भाव उठा। तो सुबह ठीक छह बजे संन्यास लिया। बहुत मैंने उन्हें रोका कि मेरे पैर मत छुए। कुछ भी हो, मैं आखिर बेटा हूं। पर उन्होंने कहा, वह बात ही मत उठाओ। जब मैं संन्यस्त हो गया तो मैं शिष्य हो गया। अब बेटे और बाप की बात खत्म हो गई।

फिर उन्होंने मुझे पैर नहीं छूने दिए उस दिन के बाद। वे मेरे पैर छूते थे। शायद ही किसी पिता ने इतनी हिम्मत की हो— इतनी सरलता, इतनी सहजता! फिर वे मुझसे पूछ कर जीते थे छोटी—छोटी बात में भी— ऐसा करूं या न करूं? और जो मैंने उनसे कह दिया वैसा ही उन्होंने किया, उससे अन्यथा नहीं। और इसीलिए यह अपूर्व घटना घट सकी, अन्यथा जन्मों—जन्म लग जाते हैं। मैंने अगर उनको कहा कि ध्यान करना है, ऐसा करना है, तो बस फिर उन्होंने दुबारा नहीं पूछा। 

फिर वैसा ही करते रहे। फिर यह भी मुझसे नहीं पूछा कि अभी तक कुछ हुआ नहीं, कब होगा कब नहीं होगा, ऐसा ही करता रहूं जिंदगी भर? दस साल तक उन्होंने ध्यान किया लेकिन एक बार मुझसे यह नहीं कहा कि अभी तक कुछ हुआ क्यों नहीं! ऐसी उनकी श्रद्धा और आस्था थी। एक बार मुझे नहीं कहा कि इसमें कुछ अड़चन हो रही है, कुछ और विधि तो नहीं है, इसमें कुछ सुधार तो नहीं करने हैं, कुछ अन्यथा प्रकार का ध्यान तो नहीं करना है! 

इसको कहते हैं, छोड़ देना— समर्पण! इसलिए एक महत घटना घट सकी। मैं चिंतित था कि कहीं वे बिना बुद्धत्व को प्राप्त हुए विदा न हो जाएं। क्योंकि उन जैसा व्यक्ति अगर बिना बुद्धत्व को प्राप्त किए विदा हो जाए तो फिर तुम्हारे संबंध में मुझे बहुत आशा कम हो जाती। लेकिन वे तुम सबके लिए आशा का दीप बन गए।

पूछा तुमने योग प्रीतम
‘ऐसा लगा भगवान स्वयं भक्त हो उठा
वे भक्ति में निमग्न एक नृत्य—गीत थे।’

और भी मित्रों ने पूछा है कि वे किस मार्ग से बुद्धत्व को उपलब्ध हुए— ध्यान से या भक्ति से? क्योंकि करते तो वे ध्यान थे लेकिन रस उन्हें कीर्तन में था। तो ध्यान से या कीर्तन से?

उनके लिए कीर्तन मार्ग नहीं था, सिर्फ अभिव्यक्ति थी। वह जो उन्हें ध्यान में मिलता था उसे कीर्तन में लुटाते थे। कीर्तन से वे बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं हुए। बुद्धत्व को उपलब्ध तो वे ध्यान से ही हुए। लेकिन ध्यान में जो मिले, उसे बाटो कैसे? ध्यान , बोल नहीं सकता, भक्ति बोल सकती है, डोल सकती है  इसलिए ज्ञानी को भी, ध्यानी को भी एक दिन अगर प्रकट करना हो तो भक्ति के सिवाय और कोई उपाय नहीं रह जाता। 

भक्ति की वह गरिमा है। ध्यान तो रेगिस्तान जैसा है। भक्ति उपवन है। उसमें खूब फूल खिलते हैं और कोयल कूक देती है और पपीहा पी—कहा, पी—कहा पुकारता है। मार्ग तो उनका ध्यान था, उपलब्ध तो वे ध्यान से ही हुए। लेकिन जैसे—जैसे ध्यान की गहराई बढ़ी, उनकी अड़चन बढ़ी कि वह जो भीतर इकट्ठा होने लगा, अब उसे क्या करें क्या न करें? मुझसे उन्होंने पूछा, क्या करूं? अब भीतर इतना इकट्ठा होता है, इसे कैसे बांटू?

तो मैंने उन्हें कहा कि कीर्तन करें। उन्होंने यह भी सवाल न उठाया कि कीर्तन और ध्यान तो दो अलग मार्ग हैं। श्रद्धा सवाल उठाती ही नहीं।  उन्होंने यह भी नहीं पूछा कि पहले ध्यान कहा, अब कीर्तन? उन्होंने कभी मुझसे पूछा नहीं। मैंने कहा कि अब इसको कीर्तन में लुटाएं, तो उन्होंने कीर्तन शुरू कर दिया।  कीर्तन उनकी अभिव्यक्ति थी। ध्यान से जो पा रहे थे वे, ध्यान में जो फूल खिल रहे थे, कीर्तन में उनकी सुगंध उठ रही थी।

तुम ठीक कहते हो
‘वे भक्ति में निमग्न एक नृत्य—गीत थे
या मोद भरे छलकते हसीन मौन थे।’

उनके गीत उनके मौन से जन्म रहे थे। मौन भीतर घना हो रहा था, गीत बाहर प्रकट हो रहे थे। जब वृक्ष पर फूल आते हैं तो ऊपर फूल दिखाई पड़ते हैं, जड़ें नीचे जमीन में गहरी गई होती हैं। 

ऐसे ही ध्यान में गहरे जाओ तो तुम्हारे जीवन में भी बहुत फूल खिलेंगे— रंग—रंग के, अलग— अलग ढंग के, अलग—अलग गंध के
‘वे जोड़ ही गए हैं महोत्सव में बहुत कुछ

मैं कैसे कहूं स्वामी देवतीर्थ भारती कौन थे!’

तुम नहीं कह सकोगे, मैं भी नहीं कह सकता हूं, कोई भी नहीं कह सकता है। कहने का कोई उपाय नहीं है। श्रद्धा थे! 

आस्था थे! ध्यान थे! भक्ति थे! 
और इन सबके जोड़ का नाम भगवान है।

ओशो
मन ही पूजा मन ही धूप 02

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