फिल्म समीक्षा: कहने का मन करता है ‘विजयी भव कंगना’



Vipul Rege
Vipul Rege

सदाशिव ने षड्यंत्र से गंगाधर राव और मणिकर्णिका के पुत्र दामोदर को ज़हर दे दिया है। दामोदर की मौत के कुछ समय बाद गंगाधर राव की भी मृत्यु हो जाती है। पति के अंतिम संस्कार के बाद आशा के विपरीत मणिकर्णिका काशी जाकर विधवा का जीवन बिताने से इंकार कर देती है। सास आपत्ति लेती है तो वह कहती है ‘जब बेटी उठ खड़ी होती है, तभी जीत बड़ी होती है।’ कंगना रनौत की ‘मणिकर्णिका : द क्वीन ऑफ़ झाँसी’  कटार की माफिक दिल को चीर कर रख देती है । अतीत का एक वातायन खुलता है। इस वातायन से वह जांबाज़ मर्दानी बाहर आती है, जिसने डेढ़ सदी पहले ब्रिटिश साम्राज्य को दहलाकर रख दिया था। 

‘खूब लड़ी मर्दानी थी वो, झाँसी वाली रानी थी वो’। स्वतंत्रता के बाद की तीन पीढ़ियों ने ये वाक्य सुनकर अपने शरीर में झुरझुरी महसूस की थी। जब किताबों में पढ़ाया जाता ‘वह अंग्रेज़ों को गाजर-मूली’ की तरह काटकर आगे बढ़ती रही।’ तो मन उस दृश्य की कल्पना करने लगता था। हमारी पीढ़ी ने मणिकर्णिका को किताबों से ही जाना था। शुक्रवार को जब मणिकर्णिका डेढ़ सदी का फ़ासला मिटाकर परदे पर अवतरित हुई तो युवा दर्शकों को भी उस ‘झुरझुरी’ का अनुभव हुआ, जो हमें उनकी कहानियां पढ़कर महसूस होती थी। ढाई घंटे की ये सुंदर यात्रा दर्शक को उस सुनहरे कालखंड में ले जाती है, जिसका अध्याय भारतीय वीरों ने अपने रक्त से लिखा था।

फिल्म को दो निर्देशकों ने मिलकर बनाया है। पहला भाग राधाकृष्ण जगरलामौदी ने निर्देशित किया है। विवाद होने के बाद उन्होंने फिल्म छोड़ दी तो कंगना रनौत ने निर्देशन की बागडोर संभाली। दो निर्देशक होने के बावजूद कहीं भी ‘जर्क’ नज़र नहीं आता। ऐसा नहीं लगता कि फिल्म दो निर्देशकों ने बनाई है। जब आपके पास स्टार इमेज वाले के. विजयेंद्र प्रसाद का सरस स्क्रीनप्ले हो तो निर्देशन में बहुत सहायता मिलती है। बाहुबली की तरह यहाँ भी वे खरे उतरते हैं। यदि मैं कहूं कि ये फिल्म एक तगड़े स्क्रीनप्ले और कंगना के जादुई परफॉर्मेंस के कारण सफल होगी, तो गलत नहीं होगा। कंगना ने निर्देशन की जिम्मेदारी खूबसूरती से निभाई है।

फिल्म के कई चैप्टर प्रभावित करते हैं। जैसे ब्रिटिशों से दुधारू पशुओं को छुड़ाने वाला सीक्वेंस, लड़ने से पहले मणिकर्णिका का रणनीतिक कौशल दिखाना, मणिकर्णिका का झाँसी के लोगों में विश्वास पैदा करना। कंगना रनौत की कैरेक्टर बिल्डिंग सटीक ढंग से की गई है। दृश्य दर दृश्य रानी का साहसी व्यक्तित्व दर्शक के सामने खुलता चला जाता है। निर्देशक बदलने के बाद भी फिल्म पर कंगना का पूरा नियंत्रण बना रहता है। रामेश्वर भगत और सूरज जगताप की अचूक एडिटिंग के चलते कहानी सरसता से आगे बढ़ती है।

दर्शकों की प्रतिक्रिया और कुछ समीक्षकों का कहना है कि पहला हॉफ कुछ धीमा है। आख़िरकार निर्देशक एक स्वतंत्रता सेनानी की बॉयोग्राफी बना रहा है तो उसे मूल वास्तविक कहानी के हिसाब से ही चलना होगा। निर्देशक पहले हॉफ में परिस्थितियों का निर्माण करते हैं ताकि एक शानदार क्लाइमैक्स तक पहुँच सके। ये बात ठीक है कि पहले भाग के धीमा होने से दर्शक कुछ विचलित होता है लेकिन दूसरे हॉफ में उसकी शिकायत दूर हो जाती है। निर्देशक ने सबसे बेहतर एक्शन क्लाइमैक्स के लिए बचाकर रखे थे और ऐसा लगता है वह निर्णय सही था। ये फिल्म एक ऐसी नदी के समान है, जो उद्गम पर बहुत मंथर गति से बहती है और अंत में एक फुफकारते जल प्रपात में परिवर्तित हो जाती है।

जब आप फिल्म देखकर घर जाते हैं तो डबडबाई आँखों में सिर्फ कंगना रनौत की तस्वीर बचती है। मणिकर्णिका को उन्होंने अपने भीतर जिया है। पति की मौत से पहले और बाद में उनके अभिनय के वेरिएशंस देखने के काबिल हैं। रानी के अंतर्द्व्न्द को उन्होंने बखूबी परदे पर उतारा है। कंगना का सबसे अच्छे संवाद मिले, इस कारण उनका किरदार खूबसूरती के साथ उभरकर आता है। यहाँ निर्देशक से कुछ गलतियां भी हुई हैं। जैसे कुछ कलाकार मिस्कास्टिंग का शिकार बन गए हैं।

सदाशिव के किरदार में मोहम्मद जीशान अय्यूब को क्यों लिया गया । वे ओवर एक्सपोज हो चुके हैं इसलिए एक पीरियड फिल्म का किरदार उन्हें नहीं देना चाहिए था। वे कद काठी से किसी भी तरह राज परिवार के नहीं लगते। ओवर एक्टिंग में उन्होंने अपना किरदार बिगाड़ लिया। तात्या टोपे का किरदार उभारा नहीं गया इसलिए अतुल कुलकर्णी के पास अधिक संभावनाएं नहीं थी। अंकिता लोखंडे भी विशेष प्रभाव नहीं छोड़ सकी हैं। इसके विपरीत सुरेश ओबेराय, डैनी डेंजोग्पा और कुलभूषण खरबंदा बेहतर रहे हैं।

फिल्म के कुछ संवाद सुनने में आनंद प्राप्त होता है। जैसे ‘ वो राज करने के लिए लड़ रहे हैं, हम नाज़ करने के लिए लड़ रहे हैं।’  ‘गोर्डन साहब ये भारत है, जो सब छोड़कर खड़ा है, वही बड़ा है।’ जो अपनी ही मां को बेच डाले, तो माँ तुझे हम कैसे संभाले।’  ‘हम लड़ेंगे ताकि आने वाली पीढ़ियां आजादी का उत्सव मनाए, अटक से कटक तक सम्पूर्ण भारत।’ फिल्म की गति बनाए रखने और रोमांच बरक़रार रखने में प्रसून जोशी के गीतों और संवादों का रचनात्मक योगदान है। उनके बिना ये फिल्म संभव नहीं हो सकती थी।

मणिकर्णिका : द क्वीन ऑफ़ झाँसी अपने वायदे के मुताबिक वैसा ही डिलीवर करती है, जैसे उसके निर्माताओं ने दावा किया था। सत्तावन की क्रान्ति की सबसे साहसी वीरांगना पुरे ओज के साथ परदे पर अवतरित होती है। आज इस फिल्म की अग्निपरीक्षा का दिन है। पहले दिन दर्शकों की कम उपस्थिति के बावजूद इंडिया स्पीक्स आश्वस्त है कि मणिकर्णिका बॉक्स ऑफिस पर सरपट दौड़ेगी। फिल्म देखकर जब हम बाहर निकलते हैं तो कहने को मन करता है ‘विजयी भव कंगना’।

URL: Kangana Ranaut’s much-awaited film Manikarnika: The Queen Of Jhansi has hit the theatres today.

Keywords: movie review, Manikarnika : The Queen of Jhansi, Kangna Ranaut, Prasoon Joshi, Release


More Posts from The Author





राष्ट्रवादी पत्रकारिता को सपोर्ट करें !

जिस तेजी से वामपंथी पत्रकारों ने विदेशी व संदिग्ध फंडिंग के जरिए अंग्रेजी-हिंदी में वेब का जाल खड़ा किया है, और बेहद तेजी से झूठ फैलाते जा रहे हैं, उससे मुकाबला करना इतने छोटे-से संसाधन में मुश्किल हो रहा है । देश तोड़ने की साजिशों को बेनकाब और ध्वस्त करने के लिए अपना योगदान दें ! धन्यवाद !
*मात्र Rs. 500/- या अधिक डोनेशन से सपोर्ट करें ! आपके सहयोग के बिना हम इस लड़ाई को जीत नहीं सकते !

About the Author

Vipul Rege
Vipul Rege
पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।