जिस दिवाली में मीडिया को साल भर की कमाई होती है, वही मीडिया हिंदू विरोध में पूरे साल लगा रहता है!



Vikash Preetam
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इन दिनों अखबार अपने भारी भरकम स्वरुप में आ रहे हैं। प्रथम दृष्टया तो यूं लगता है जैसे खबरों की बाढ़ नियमित अंक और संस्करण में समा नहीं पा रही है इसलिए ये ढेर सारी पूरक प्रतियाँ हैं अंगरेजी में कहें तो ‘सप्लीमेंटरीज’ छप रहे हैं। जैसा हम अपने छात्र जीवन में देखते थे कि परीक्षाओं में औसत छात्र तो एक ही उत्तर पुस्तिका में अपनी साल भर की पढाई का सार उतार देते थे वहीँ कुछ ‘विरले’ ऐसे भी भी होते थे जो मूल उत्तर पुस्तिका के साथ तमाम पूरक उत्तर पुस्तिकाएं नत्थी करके उन बेचारे औसत छात्रों का मनोबल गिराने का काम करते थे।

बहरहाल इन वजनी अखबार पढने वालों को यह भी भ्रम हो सकता है कि त्यौहार के इस मौसम में अखबार मालिक हमें खबरों और रद्दी का उपहार दे रहे हैं लेकिन असल कारण पर हम कभी सोचेंगे नहीं और हमें सोचने भी नहीं दिया जाएगा। बात दरअसल यह है कि हिंदुस्तान का सबसे लोकप्रिय, भव्य और धूमधाम से मनाया जाने वाला त्यौहार दीपावली इन अखबारों को विज्ञापन के माध्यम से इतना व्यापार देते हैं कि अखबार मालिकों की साल भर की मंदी और तमाम घाटों की भरपाई इस सीजन में हो जाती है। दीपावली का पर्व है ही ऐसा जब पूरी दुनिया रोशनी में नहाये भारत को विस्मित होकर निहारती है। यही ताकत है हमारे हिंदुत्व, उसकी मान्यताओं और उससे जुडी शिक्षाओं की।

दीपावली के पर्व में हम अपनी ही नहीं समूचे मानव समाज की खुशहाली और तरक्की की प्रार्थना करते हैं। अंधेरी रात में हमारे द्वारा जलाया गया एक दिया केवल हमें ही रोशनी नहीं दिखाता बल्कि हर कोने में व्याप्त अन्धकार को खत्म करता है। सच मायने में उत्सवधर्मिता और उससे जुडी खुशियाँ क्या होती हैं हम इस दीपोल्लास में देख सकते हैं।

खुशियों का यह सैलाब बिना किसी निरीह और मासूम की बलि लिए आता है। इसमें रक्त की नदियाँ नहीं बहाई जातीं, मातम नहीं मनाये जाते। फिर भी सेकुलरों की हिमायती अधिकाँश मीडिया और अखबारी घराने अपनी तुच्छ मानसिकता और षड्यंत्रों से बाज नहीं आते । वे दीपावली की खुशियों और इसके आयोजन को प्रदूषण, पर्यावरण, फिजूलखर्ची और यहाँ तक कि मानवता के संकट से जोड़ देते हैं । उनको लगता है कि बस एक दिन ये दिवाली मनाना बंद हो जाए तो दुनिया में सारी समस्याएं खत्म हो जायेंगी। ऐसे लोगों को त्यौहार विशेष पर सरेआम कटने वाले लाखों जानवर और पेड़ दिखाई नहीं देते हैं और हैरत की बात यह है कि इन मूढमति लोगों के विचारों और आह्वानों को हिन्दुओं के पैसे से फलने-फूलने वाले अख़बार ही सबसे ज्यादा प्रचारित-प्रसारित करते हैं।

यह हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है कि आज देश में बुद्धिजीवी, चिन्तक और विचारक होने के लिए हिंदुस्तान और उनकी मान्यताओं के प्रति दुर्भावना और बैर रखना एक अनिवार्य शर्त बन गया है। उसका एक कारण तो यह भी है अगर देश में ऐसे विचारों के खरीददार और एजेंट न भी मिलें तब भी विदेशों में ऐसे बहुत से संगठन और सरकारें हैं जो हिन्दुओं को बदनाम करने की दुकानें चलाते हैं और वही इन बुद्धिजीवियों के कुविचारों को अनुमोदित कर पुरुस्कृत करने का काम करते हैं जिन्हें बाद में इस देश में भुनाया जाता है। लेकिन जैसा कि सदियों से होता आया है हमने अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद हिन्दू धर्म को खंडित और कमजोर करने वाली ताकतों को अपनी चेतना और एकता से पराजित किया है । इसलिए आगे भी ये छल और दुष्चक्र कारगर नहीं होंगे। हमें अपने धर्म और सनातनी परम्पराओं पर गर्व हैं और जिनको हिन्दू होने पर लज्जा आती हो वे अपनी कुंठा के समन्दर में गोते लगाने के लिए स्वतंत्र हैं।

जैसा कि आप जानते हैं आज ही के दिन कार्तिक मास की त्रयोदशी को भगवान् धन्वन्तरी का जन्म हुआ था जिसे हम धनतेरस के रूप में मनाते हैं। भगवान धन्वन्तरी देवताओं के चिकित्सक भी हैं । उनसे प्रार्थना है कि वे हम सबको उत्तम स्वास्थ्य और सौभाग्य प्रदान करें। इसी कामना के साथ आप सबको धनतेरस पर्व की बहुत बहुत शुभकामनाएं ..

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