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मूवी रिव्यू:’ब्रीद – इन टू द शेडोज’ कमाल कर रही है

‘मल्टीपल पर्सनालिटी डिसऑर्डर’ पर हॉलीवुड और बॉलीवुड में कई प्रभावकारी फिल्मों का निर्माण हो चुका है और ये विषय अब नए निर्माताओं को भी लुभा रहा है। एक ही व्यक्ति में दो व्यक्तित्व रहते हैं और दोनों को ही पता नहीं होता कि उनके भीतर दूसरा कोई अदृश्य सा मौजूद है। लेकिन यहाँ एक कैरेक्टर ‘J’ अविनाश के बारे में सब जानता है, परन्तु अविनाश उससे आखिर तक अनजान रहता है। उसे इस बात का पता आखिर में चलता है। इस विषय पर फिल्मों की प्रस्तुति ‘हॉरर’ की अनुभूति भी देती है। अभिषेक बच्चन अरसे बाद लौटे हैं। उनकी वेब सीरीज ‘ब्रीद : इन टू द शेडोज’ कमाल कर रही है। अभिषेक बच्चन और अमित साध की जोड़ी सही मायने में ‘डार्क हॉर्स’ साबित हुई है। ऐसे घोड़े जिनसे कोई उम्मीद नहीं थी, वे ओटीटी के मंच को अपनी टापों तले रौंद रहे हैं। 

दिल्ली में रहने वाले एक मनोचिकित्सक अविनाश सभरवाल की छह साल की बेटी सिया को एक पार्टी के दौरान किडनैप कर लिया गया है। पुलिस उसे खोज नहीं पाती। सिया को शुगर की बीमारी है और उसे इंजेक्शन लेने की विवशता है। तीन माह बाद अविनाश को अज्ञात अपहरणकर्ता का मैसेज मिलता है।

मांग की जाती है कि अविनाश को एक सरदार को मारना है। शर्त ये है कि उस बूढ़े सिख को गुस्सा आना चाहिए। अविनाश के पास अपहरणकर्ता की बात मानने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। एक हत्या के बाद वह दूसरी हत्या की शर्त रख देता है। इस बीच इन्वेस्टिगेशन की कमान एक तेज़ तर्रार पुलिस अधिकारी कबीर सावंत के हाथ आ जाती है। ये कहानी बहुत से मोड़ों से गुज़रकर एक रोचक अंत पर समाप्त होती है। 

ये बात कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि अब तक आई वेब सीरीज की लंबी सूची में इस फिल्म को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाना चाहिए। सच कहूं तो स्टार कॉस्ट के कारण मुझे इस फिल्म से कोई ज़्यादा उम्मीद नहीं थी लेकिन जब इसे देखा तो पाया कि कलाकारों ने उम्मीद से बढ़कर अभिनय किया है। अभिषेक बच्चन के लिए ये फिल्म उनके कमबैक का कैरियर बन सकती है। वे आसानी से वापसी कर सकते हैं।

अभिषेक चौंकाते हैं। अविनाश सभरवाल का किरदार जटिलताओं से भरा था और अभिषेक ने इसे सुंदर और सहज ढंग से निभाया है। अब तक तो मान लिया गया था कि बच्चन पुत्र की विदाई हो चुकी है लेकिन इस फिल्म के बाद लगता है कि वे एक और जानदार पारी खेल सकते हैं। उनका अभिनय पहले की तुलना में परिपक्व हुआ है।

अमित साध को इससे पहले ‘सुल्तान’ में नोटिस किया गया था। वे एक सितारा बनने की दिशा में संघर्ष कर रहे हैं। निश्चय ही कबीर सावंत का किरदार उनके संघर्ष को ख़त्म करने में मददगार साबित होगा। एक गुस्सैल इंस्पेक्टर के किरदार में अमित साध ने जान डाल दी है।

यहां हम उनके और अभिषेक के बीच अदाकारी का रोचक मुकाबला देख पाते हैं। अभिषेक बच्चन के किरदार को उनका किरदार जबरदस्त टक्कर देता है। निर्देशक ने दोनों को बराबरी का रोल देकर रोचकता बढ़ा दी है। इन दोनों कलाकारों के अलावा बाकी सभी ने बेहतर किया है लेकिन अमित और अभिषेक पूरी फिल्म के आधार स्तम्भ बनकर उभरते हैं।

फिल्म के निर्देशक मयंक शर्मा और अभिजीत देशपांडे हैं। वेब प्लेटफॉर्म का एक लाभ तो ये हुआ है कि फिल्म इंडस्ट्री को नए प्रतिभावान निर्देशक मिल रहे हैं। इन दोनों ने इस ‘साइको थ्रिलर’ को जीवंत बनाकर पेश किया है। बारह किश्तों की ये फिल्म इनके स्मूथ निर्देशन के कारण देखने लायक हो गई है। एक जटिल स्क्रीनप्ले पर काम करना ही निर्देशक के लिए वास्तविक चुनौती होती है। लंबी होने के बावजूद ये बोर नहीं करती।

ऐसे विषय के कथानक फैलाकर ही प्रस्तुत किये जाते हैं और कुछ निर्देशकों का अपना एक स्टाइल होता है। इसका बैकग्राउंड स्कोर बहुत शानदार है, जो इस साइको थ्रिलर पर पूरी तरह सूट करता है। फिल्म के स्मूद स्क्रीनप्ले के लिए भवानी अय्यर और विक्रम तुली को भी श्रेय दिया जाना चाहिए। उनकी बनाई नींव पर  मयंक शर्मा और अभिजीत देशपांडे ने सुंदर रचना का निर्माण किया।

जब ये फिल्म आईएमडीबी पर आठ से अधिक की शानदार रेटिंग लेकर सुंदर प्रदर्शन कर रही थी, तब अभिषेक बच्चन को कोरोना पॉजिटिव होने की ख़बरें आ रही थी। तकनीक के इस दौर में सेल्फ आइसोलेट होते हुए भी वे अपने अभिनय को मिल रही प्रशंसाओं को पढ़ और देख सकते हैं।

उनके पिता अमिताभ भी कोरोना पीड़ित हैं। बहुत दिनों बाद ऐसा अवसर आया जब अमिताभ के बंगले ‘जलसा’ में अभिषेक की नई फिल्म का जलसा मनाया जाए। लेकिन बच्चन परिवार के लिए ये ख़ुशी और ग़म का मिलाजुला अवसर है। उनके तीनों बंगले सील हैं लेकिन इस बात की ख़ुशी है कि वे और अभिषेक बच्चन सांस ले सकते हैं। उनकी फिल्म का शीर्षक भी यही है ‘ब्रीद’।

नोट : ये फिल्म वयस्क दर्शकों के लिए हैं। इसके कुछ दृश्य कम आयु के दर्शकों के देखे जाने योग्य नहीं है। इसलिए बच्चों के साथ ये फिल्म न देखें।

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Vipul Rege

Vipul Rege

पत्रकार/ लेखक/ फिल्म समीक्षक पिछले पंद्रह साल से पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में सक्रिय। दैनिक भास्कर, नईदुनिया, पत्रिका, स्वदेश में बतौर पत्रकार सेवाएं दी। सामाजिक सरोकार के अभियानों को अंजाम दिया। पर्यावरण और पानी के लिए रचनात्मक कार्य किए। सन 2007 से फिल्म समीक्षक के रूप में भी सेवाएं दी है। वर्तमान में पुस्तक लेखन, फिल्म समीक्षक और सोशल मीडिया लेखक के रूप में सक्रिय हैं।

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1 Comment

  1. Avatar Varun says:

    ये सिरीज़ मुझे ज़्यादा अच्छी लगी। अभिषेक बच्चन और अमित साध ने बधिया काम किया है। निथ्या मेंनन और बाक़ी सबने अपना काम बधिया तरीक़े से निभाया है।कहना चाहूँगा की अभिषेक एक बहुत अच्छे कलाकार है और इस सिरीज़ में उनकी जितनी तारीफ़ करो वह कम है।

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