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फेसबुक डाउन हुआ था या फिर कुछ और ही कारण था

कल फेसबुक पर अचानक से ही कई वीडियो को कवर किया जाने लगा, और लखीमपुर खीरी के भी असली वीडियो को, जो वास्तविक स्थिति बता सकते थे, उन्हें कवर किया जाने लगा, जैसे संदीप देव जी की पोस्ट के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने कथित किसानों पर प्रश्न उठाए थे! ऐसा क्यों हो रहा था? क्या कारण था इसके पीछे? क्या कुछ छवि बनाने का प्रयास था या फिर क्या?

उन्होंने तथ्य प्रस्तुत किए थे:

1) आज #Lakhimpur में चार भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या।

2) 26 जनवरी को देश का झंडा लाल किला से उतारा

3) आंदोलन में शामिल महिला का दुष्कर्म किया।

4) आंदोलन भड़काने के लिए अपने ही एक साथी को जिंदा जलाया।

तब भी ये किसान हैं?

@PMOIndia @narendramodi ji घाव को लंबे समय तक रखने से गैंगरीन होता है!

कल फेसबुक के शेयर भी जून के बाद सबसे निचले स्तर पर आए और शाम होते होते फेसबुक, व्हाट्सएप और इन्स्टा डाउन हो गया। कुछ चल ही नहीं रहा था।

सुबह होते होते भारत में भी यह खबर आई कि फेसबुक की पूर्व कर्मचारी ने कुछ ऐसा कहा था जिससे फेसबुक की टीम शायद डर गयी थी और कुछ शायद तकनीकी खराबी आई। कुछ लोगों ने दावा किया कि फेसबुक सर्वर हैंग हो गया है तो किसी ने कहा कि हैक हो गया है, डोमेन सेल पर चला गया है। दावे चलते रहे। मगर एक खबर थी, जिसे देखना बहुत रोचक था। फेसबुक की एक पूर्व कर्मचारी और भ्रष्टाचार रोधी कार्यकर्ता फ्रांसेस होगेन (Frances Haugen) ने परसों एक साक्षात्कार में फेसबुक की हिंसा को रोकने वाली कथित नीति को तार तार करते हुए कहा कि फेसबुक के पास ऐसी कोई नीति नहीं है क्योंकि फेसबुक के लिए अपना फायदा ही मायने रखता है।

उन्होंने कहा कि फेसबुक यह चाहता है कि ज्यादा से ज्यादा लोग किसी पोस्ट पर आएं, इंगेज हों और फिर वह उन विज्ञापनों पर क्लिक करें और फिर उसके पास पैसा आए। उसके लिए अपना पैसा ही सबसे ज्यादा जरूरी है।

फ्रांसेस ने साफ़ कहा कि फेसबुक के साथ काम करते हुए उन्होंने यह अनुभव किया कि “इस बात पर हमेशा ही फेसबुक अपना पलड़ा भारी रखता है कि क्या जनता के हित हैं और क्या फेसबुक के हित हैं।

फ्रांसेस फेसबुक की पूर्व कर्मचारी हैं और उन्होंने फेसबुक में रहते हुए कई स्वतंत्र शोध भी किए, जो शायद उनके काम का हिस्सा नहीं थे, परन्तु उन्हें कामकरने की शैली और शर्तों में असहजता और असमानता दिखाई दी, तो उन्होंने यह किया। उन्होंने नौकरी छोड़ने के बाद फेसबुक के खिलाफ फेडरल लॉ एन्फोर्समेंट में शिकायत दर्ज कराई जिसमें लिखा था कि फेसबुक के खुद के शोध के आंकड़े दिखाते हैं, कि यह घृणा, गलत सूचना और राजनीतिक असंतोष को बढ़ावा देता है, मगर कंपनी जिसे जानती है, उसे ही उसने छिपाया। 

एक शिकायत में यह भी आरोप है कि फेसबुक का इन्स्टाग्राम किशोर लड़कियों को नुकसान पहुंचा रहा है। फ्रांसेस ने मई में फेसबुक छोड़ा है। फ्रांसेस होगेन 37 वर्षीय डेटा वैज्ञानिक हैं। और उन्होंने कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में डिग्री ले रखी है और साथ ही उन्होंने बिजनेस में भी हारवर्ड से मास्टर की डिग्री ली है। इससे पहले वह गूगल और पिंटरेस्ट के साथ भी काम कर चुकी हैं।

तो फिर उन्होंने यह क्यों किया और कहा है। इस विषय में उनका कहना है कि उनकी एक दोस्त इसी प्रकार गलत सूचना का शिकार हो गयी थी, इसलिए वह फेसबुक के साथ जुड़ीं थी।  उनका कहना है कि आज फेसबुक आज जिस तरह से कंटेंट उठा रहा है, उसका आधार यह है कि कैसे लोग ज्यादा जुड़ें या लोगों का रीएक्शन कैसा होगा है। और फेसबुक का खुद का शोध बताता है कि जो कंटेंट अधिक घृणा से भरा होता है और जो विभाजित करने वाला होता है, उससे लोग ज्यादा गुस्सा होते हैं या फिर भावुक होते या फिर उत्तेजित हो जाते हैं।

और फिर उन्होंने कहा कि फेसबुक ने यह अनुभव किया है कि अगर वह नियमों को सुरक्षित बना देंगे, तो लोग कम साईट पर आएँगे और फिर कम विज्ञापन आएँगे।

फ्रांसेस का कहना है वर्ष 2020 के चुनाव से पहले जरूर इस बात का खतरा समझा गया था, मगर चुनावों के बाद ही एल्गोरिदम हटा दिया गया, और कहा गया कि उसे कई लोगों में बाँट दिया है, पर ऐसा नहीं किया गया था, और उसके बाद कैपिटल हिल वाली हिंसा हुई।

मगर सबसे महत्वपूर्ण बात जो फ्रांसेस ने कही वह, भारत के सन्दर्भ में ध्यान देने योग्य हैं। जब उनसे पुछा गया कि यूरोपीय राजनीतिक दल फेसबुक से कह रहे हैं कि जिस प्रकार से उन्होंने अपने नियम बनाए हैं, वह हमारे उन तरीकों बदल रहे हैं, जिस तरीके से हम अपना देश चला रहे थे।

तो उन्होंने कहा कि हाँ, यह सही है, फेसबुक हमें वह पोजीशन लेने पर विवश कर रहा है, जो हम नहीं पसंद करते है, अर्थात हम यह जानते हैं कि हमारे समाज के लिए यह ठीक नहीं है, फिर भी अगर हम यह पोजीशन नहीं लेंगे तो हम सोशल मीडिया के मार्केट प्लेस में जीत नहीं पाएंगे।

और यह सारा खेल फेसबुक के इन्स्टाग्राम एप पर भी पहुँच चुका है।         

उन्होंने यह भी बताया कि फेसबुक का इन्स्टाग्राम एप, फेसबुक के अपने शोध के अनुसार लड़कियों के लिए हानिकारक है। उन्होंने कहा कि लडकियां बहुत जल्दी ही इन्स्टाग्राम की आदी हो जाती हैं। और वह जैसा कंटेंट इस्तेमाल करती हैं, उसके अनुसार ही डिप्रेस होती जाती हैं और फिर वह एप को और प्रयोग करती हैं और फेसबुक का अपना शोध कहता है कि वह अपने शरीर से नफरत करने लगती है और एप की ही आदी हो जाती हैं। फेसबुक का अपना शोध कहता है कि वह लड़कियों के लिए नुकसान दायक नहीं होती है बल्कि साथ ही यह सोशल मीडिया का सबसे बुरा रूप है।

फेसबुक ने पिछले सप्ताह ही छोटे बच्चों के लिए एक इन्स्टाग्राम बनाने की योजना को टाल दिया है।

जो कुछ भी फ्रांसेस ने कहा है वह कुछ अलग नहीं है क्योंकि भारत में भी हमें किशोर लड़कियों में यह आत्मघाती एवं अपने अस्तित्व से ही घृणा करने वाली प्रवृत्ति दिखती है और इन्स्टाग्राम पर ही इन वोक लिब्रल्स के खाते हैं, जो इन बच्चियों को झूठी आज़ादी के जाल में फंसाते हैं और कम उम्र की लडकियां इन्स्टा के चक्कर में न जाने कितनी मुसीबत में फंसती हैं। यह सब फेसबुक को पता है, पर उसने कोई ऐसा कदम नहीं उठाया है, जो इस जहर को कम करे। भारत में तो एक और प्रकार का जहर इन्स्टाग्राम के माध्यम से इन लड़कियों के दिलों में भरा जाता है।। हरे टिड्डों द्वारा उन्हें फंसाया जाता है और सफ़ेद जहर वालों को भी यहीं पर अपने ग्राहक बनते हैं

फ्रांसेस की राजनीतिक बातों पर गौर किया जाए तो यह भारत में भी देखने को मिलता है कि राजनीति को प्रभावित करने का प्रयास ही नहीं हो रहा है बल्कि किया जा रहा है। वाम समर्थक पेज और ग्रुप्स की फैलाई गई हिंसा पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती है और जब सत्यता बताने का प्रयास किया जाता है तो संदीप देव की पोस्ट के जैसे उसे कवर कर दिया जाता है।

क्या कल किसी कारणवश ही फेसबुक का सर्वर डाउन हुआ, जिससे काफी कुछ कवर अर्थात छिपाया जा सके? क्योंकि अब फेसबुक राजनीतिक दल ही बन गया है, वह सरकारों को गिराने में भूमिका निभाने लगा है। वह समाचारों को नियंत्रित करने लगा है जैसा उसने ऑस्ट्रेलिया में किया था और सरकार से तनातनी हुई थी। अंतत: सरकार के सामने फेसबुक झुका था।

भारत में भी नागरिकता आन्दोलन में फेसबुक की सक्रिय भूमिका को कौन भूल सकता है? एक एक गतिविधि, आन्दोलन की सारी भड़काऊ गतिविधियों, सारे भड़काऊ भाषण फेसबुक ने चलने दिए, और सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने में एवं हिन्दुओं के विरुद्ध युद्द हरे समूह को एक प्रकार का युद्ध छेड़ दिया था.

ब्राहमणों के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट और टिप्पणियाँ भी फेसबुक का नियमित हिस्सा है और कठुआ काण्ड में फेसबुक में हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाने में फेसबुक की भूमिका को कौन भूल सकता है? चिंगारी को आग लगाने में महारथ फेसबुक को हासिल है, ऐसा फ्रांसेस की बातों से भी पता चला. सीएए के खिलाफ, जो भारत की संसद का अधिकार था, कि वह अपने नागरिकों के लिए लागू कर सकती है, उसके खिलाफ फेसबुक पर जो अभियान चला, वह कितना एकतरफा था, इस बात से पता चलता है कि जब हम ग्रुप तलाशते हैं, तो सबसे अधिक सीएए का विरोध करने वाले ही ग्रुप्स दिखते हैं.

बीच बीच में जरूर समर्थन करने वाले समूह थे, परन्तु बहुत कम!

हाँ, यह भी सही है कि फेसबुक के कारण ही कई ऐसे वीडियो भी सामने आए, जिनसे सच्चाई भी पता चली. सोशल मीडिया जहां वरदान है तो वहीं एजेंडा चलाने के लिए उपयुक्त टूल भी, जिसका अशांति फ़ैलाने वाले फायदा उठाते हैं, अत: सोशल मीडिया इतना शक्तिशाली न हो जाए कि वह देश की संप्रभुता के लिए ही खतरा बन जाए और सरकारों के चयन में हस्तक्षेप देने लगे एवं नीति निर्धारक तत्व बन जाए!

हालांकि कुछ लोग इस बात से आपत्ति व्यक्त कर रहे हैं कि फ्रांसेस का उद्देश्य क्या है? क्योंकि फ्रांसेस के अनुसार वह कंपनी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहती हैं, बस चाहती हैं कि फेसबुक की नियंत्रित करने की शक्ति सही हो जाए?

यह साक्षात्कार की मंशा पर तो प्रश्नचिन्ह लगा सकता है, और यह भी हो सकता है कि फ्रांसेस का अपना कोई स्वार्थ हो, पर भारत की इस सरकार और फेसबुक के बीच सम्बन्ध देखने से उसकी बातें सही प्रतीत होती है!

तो कल अचानक से ही ऐसा क्या हुआ कि फेसबुक, इन्स्टा और व्हाट्सएप सब डाउन हो गए?

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Sonali Misra

सोनाली मिश्रा स्वतंत्र अनुवादक एवं कहानीकार हैं। उनका एक कहानी संग्रह डेसडीमोना मरती नहीं काफी चर्चित रहा है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति कलाम पर लिखी गयी पुस्तक द पीपल्स प्रेसिडेंट का हिंदी अनुवाद किया है। साथ ही साथ वे कविताओं के अनुवाद पर भी काम कर रही हैं। सोनाली मिश्रा विभिन्न वेबसाइट्स एवं समाचार पत्रों के लिए स्त्री विषयक समस्याओं पर भी विभिन्न लेख लिखती हैं। आपने आगरा विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में परास्नातक किया है और इस समय इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय से कविता के अनुवाद पर शोध कर रही हैं। सोनाली की कहानियाँ दैनिक जागरण, जनसत्ता, कथादेश, परिकथा, निकट आदि पत्रपत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।

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